Jagannath Rath Yatra का क्या है इतिहास ? मौसी के घर क्यों जाते हैं भगवान Jagannath ?

Jagannath Rath Yatra उत्सव भगवान जगन्नाथ (भगवान कृष्ण), उनकी बहन देवी सुभद्रा और उनके बड़े भाई भगवान बलभद्र या बलराम को समर्पित है। जगन्नाथ रथ यात्रा व्यापक रूप से मनाई जाती है, और भारत के सबसे बड़े त्यौहारों में से एक है, जहां लाखों भक्त रथ यात्रा के जुलूसों में भाग लेते हैं और भगवान जगन्नाथ का आशीर्वाद लेते हैं।

Jagannath Rath Yatra का महत्व:  Jagannath दो शब्दों से मिलकर बना है। जग का अर्थ है ब्रह्मांड और नाथ का अर्थ है भगवान यानी ‘Lord of Universe’ वास्तव में भगवान जगन्नाथ को भगवान विष्णु के अवतारों में से एक माना जाता है। ऐसी धारणा है कि जुलूस के दौरान रथों को खींचना भगवान की शुद्ध भक्ति से जुड़ा होने का एक तरीका है। और यह उन पापों को भी नष्ट कर देता है जो शायद जानबूझकर या अनजाने में किए गए हैं।  चार धाम में से एक धाम जगन्नाथ मंदिर को माना गया है। यात्रा के बारे में स्कंद पुराण, नारद पुराण, पद्म पुराण, बह्म पुराण में भी लिखा हुआ है। इसीलिए ये यात्रा हिन्दू धर्म में काफी खास हैं।

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क्यों निकाली जाती है Jagannath Rath Yatra– भगवान Jagannath की रथ यात्रा को लेकर कई तरह की मान्यताएं और इतिहास का वर्णन किया जाता है। बताया जाता हैं कि एक दिन भगवान जगन्नाथ की बहन सुभद्रा ने नगर देखने की चाह रखते हुए उनसे द्वारका के दर्शन कराने की प्रार्थना की थी। जिसके बाद भगवान जगन्नाथ ने अपनी बहन को रथ में बैठाकर उसे नगर का भ्रमण करवाया।

ऐसी मान्यता है कि एक बार, भगवान कृष्ण की आठ पत्नियां, मां रोहिणी से कृष्ण और गोपी से जुड़ी हुई दिव्य कथाएं सुनना चाहती थीं। लेकिन मां कहानी सुनाने को तैयार नहीं थी। एक लंबे अनुरोध के बाद, वह मान गई लेकिन इस शर्त पर कि सुभद्रा दरवाजे की रखवाली करेगी, ताकि उस कथा को कोई दूसरा ना सुन सके। लेकिन जब रोहिणी मां कहानी सुना रही थी । तभी श्री कृष्ण और बलराम अचानक घर की ओर आते दिखाई दिए। सुभद्रा ने उचित कारण बता कर द्वार पर ही रोक लिया। लेकिन श्रीकृष्ण और राधा की रासलीला की वार्ता श्रीकृष्ण और बलराम दोनो को ही सुनाई दी। उसको सुनने से श्रीकृष्ण और बलराम के अंग अंग में अद्भुत प्रेम रस का उद्भव होने लगा। साथ ही सुभद्रा भी क्षुब्ध होने लगीं।

तीनों की ही ऐसी अवस्था हो गई कि पूरे ध्यान से देखने पर भी किसी के भी हाथ-पैर आदि स्पष्ट नहीं दिख रहे थे। सुदर्शन चक्र भी पिघल गया था। उसने लंबा-सा आकार ग्रहण कर लिया। यह माता राधिका के महाभाव का गौरवपूर्ण दृश्य था। उसी समय नारद भगवान भी पहुंच गए। उन्होंने भगवान कृष्ण से प्रार्थना की कि हे भगवान आप चारों के जिस महाभाव में लीन मूर्तिस्थ रूप के मैंने दर्शन किए हैं, वह सामान्य जनों के दर्शन हेतु पृथ्वी पर सदैव सुशोभित रहे। महाप्रभु ने तथास्तु कह दिया। और भगवान कृष्ण, सुभद्रा और बलराम ने पुरी के जगन्नाथ मंदिर में निवास किया।

भगवान जगन्नाथ का कैसा होता है रथ ?: पुरी का Jagannath मंदिर भारत के चार पवित्र धामों में से एक है।  यहां पर भगवान श्रीकृष्ण, जगन्नाथ के रूप में विराजित है। साथ ही यहां उनके बड़े भाई बलराम और उनकी बहन देवी सुभद्रा की पूजा की जाती है। पुरी रथयात्रा के लिए बलराम, श्रीकृष्ण और देवी सुभद्रा के लिए तीन अलग-अलग रथ बनाए जाते हैं। रथयात्रा में सबसे आगे बलरामजी का रथ, उसके बाद बीच में देवी सुभद्रा का रथ और सबसे पीछे भगवान जगन्नाथ श्रीकृष्ण का रथ होता है।

भगवान जगन्नाथ के रथ में 16 पहिए लगे होते हैं भाई बलराम के रथ में 14 और बहन सुभद्रा के रथ में 12 पहिए लगे होते हैं। भगवान जगन्नाथ, बलरामजी और देवी सुभद्रा जी के रथों को अलग- अलग नाम भी दिया गया है। बलरामजी के रथ को ‘तालध्वज’ कहते हैं, जिसका रंग लाल और हरा होता है। देवी सुभद्रा के रथ को ‘दर्पदलन’ या ‘पद्म रथ’ कहा जाता है, जो काले या नीले और लाल रंग का होता है, जबकि भगवान जगन्नाथ के रथ को ‘नंदीघोष’ या ‘गरुड़ध्वज’ कहते हैं। इसका रंग लाल और पीला होता है।

क्या होता है रथ यात्रा में? : भगवान Jagannath के रथ के सामने सोने के हत्थे वाले झाड़ू को लगाकर रथ यात्रा को आरंभ किया जाता है। उसके बाद पारंपरिक वाद्य यंत्रों की थाप के बीच तीन विशाल रथों को सैंकड़ों लोग खींचते हैं। मान्यता है कि रथ खींचने वाले लोगों के सभी दुख दूर हो जाते हैं और उन्हें मोक्ष प्राप्ति होता है। नगर भ्रमण करते हुए शाम को ये तीनों रथ गुंडिचा मंदिर पहुंच जाते हैं। अगले दिन भगवान रथ से उतर कर मंदिर में प्रवेश करते हैं, और सात दिन वहीं रहते हैं।

मौसी के घर आते हैं भगवान: गुंडिचा मंदिर को भगवान Jagannath की मौसी का घर माना जाता है। रथ यात्रा के दौरान साल में एक बार भगवान जगन्नाथ अपने भाई-बहनों के साथ जगन्नाथ मंदिर से इसी गुंडिचा मंदिर में रहने के लिए आते हैं। अपनी मौसी के घर में भगवान एक हफ्ते तक ठहरते हैं, जहां उनका खूब आदर-सत्कार होता है। उन्हें कई प्रकार के स्वादिष्ट पकवानों और फल-फूलों का भोग लगाया जाता है। जिसकी वजह से भगवान बीमार हो जाते हैं। जिसके बाद उन्हें पथ्य का भोग लगाया जाता है और वह जल्दी‍ ठीक हो जाते हैं।

गुंडिचा मंदिर में इन नौ दिनों में भगवान जगन्नाथ के दर्शन को आड़प-दर्शन कहा जाता है। जगन्नाथ जी के प्रसाद को महाप्रसाद माना जाता है। इन दिनों विशेष रूप से नारियल, लाई, गजामूंग और मालपुए का प्रसाद मिलता है। फिर दिन पूरे होने के बाद भगवान जगन्नाथ अपने घर यानी कि जगन्नाथ मंदिर वापस चले जाते हैं। इस पर्व को अटूट, श्रद्धा और भक्ति भाव के साथ मनाया जाता है। पुरी के अलावा भी देश के अलग-अलग शहरों में भी भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा निकाली जाती है।

Sandeep Jain

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