Dwarkadhish Temple : द्वारकाधीश मंदिर किस नदी के किनारे स्थित है?
Dwarkadhish Temple : द्वारकाधीश मंदिर गुजरात राज्य के द्वारका नगर में स्थित है और यह पवित्र गोमती नदी के तट पर बना हुआ है. गोमती नदी यहां अरब सागर में आकर मिलती है. यही संगम स्थल द्वारकाधीश मंदिर की भव्यता और आध्यात्मिकता को और बढ़ा देता है. हिंदू धर्म में यह स्थान चार धाम में से एक माना जाता है और विशेषकर वैष्णव परंपरा में इसका महत्त्व अपार है.
द्वारकाधीश मंदिर जिसे जगत्त्राण मंदिर या द्वारकाधीश ज्योतिर्लिंग भी कहा जाता है, भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित है. श्रीकृष्ण ने महाभारत युद्ध के बाद हस्तिनापुर से दूर समुद्र किनारे इस नगरी की स्थापना की थी. यहीं वे अपने राज्य के राजा बने और इसी कारण से उन्हें “द्वारकाधीश” यानी “द्वारका के स्वामी” कहा जाने लगा. मंदिर की ऊचाई लगभग 150 फीट है. इसमें 56 सीढ़ियां हैं जो सीधे गोमती घाट तक जाती हैं. मंदिर का शिखर दूर से ही अरब सागर के किनारे दिखाई देता है. इसे चार धाम में शामिल किया गया है: बद्रीनाथ (उत्तर), पुरी (पूर्व), रामेश्वरम (दक्षिण), और द्वारका (पश्चिम).
द्वारकाधीश मंदिर गोमती नदी के किनारे स्थित है. गोमती नदी का उल्लेख वेदों और पुराणों में मिलता है. इसे गंगा की बहन कहा गया है. मान्यता है कि गोमती नदी का जल पापों को धो देता है. यहां गोमती नदी अरब सागर से मिलती है, जिससे यह स्थान संगम स्थल बन जाता है. भक्त मंदिर में दर्शन करने से पहले गोमती स्नान और घाट पर पूजा करते हैं. गोमती के तट पर बने मंदिर के कारण यहां की पवित्रता कई गुना बढ़ जाती है.
द्वारका की स्थापना
महाभारत के अनुसार, जब भगवान श्रीकृष्ण ने मथुरा छोड़ी तो उन्होंने समुद्र के किनारे इस नगरी की स्थापना की. समुद्र ने उन्हें 12 योजन भूमि दी, और उसी पर द्वारका का निर्माण हुआ.
समुद्र में डूबी द्वारका
कहा जाता है कि श्रीकृष्ण के स्वर्गारोहण के बाद द्वारका नगरी समुद्र में विलीन हो गई थी. आज भी द्वारका के तट पर समुद्र में डूबी प्राचीन नगरी के अवशेष पाए जाते हैं.
गोमती संगम का महत्व
गोमती संगम स्थल को वही स्थान माना जाता है, जहां से भगवान कृष्ण ने अपनी लीलाएं कीं. यही कारण है कि गोमती तट पर स्थित द्वारकाधीश मंदिर का धार्मिक महत्व अपार है.
गुजरात का द्वारका नगर सदियों पुराना इतिहास समेटे हुए है और इसका उल्लेख महाभारत में द्वारका राज्य के रूप में मिलता है. गोमती नदी के तट पर स्थित यह नगर पौराणिक कथाओं में भगवान कृष्ण की राजधानी के रूप में वर्णित है.
पुरातात्विक प्रमाण जैसे – लिपि युक्त पत्थर का टुकड़ा, पत्थरों को जोड़ने के लिए डॉवेल (लोहे की कील जैसी तकनीक) का प्रयोग, और यहां मिले लंगरों (anchors) का अध्ययन यह संकेत देते हैं कि यह बंदरगाह स्थल वास्तव में ऐतिहासिक काल का है. जलमग्न संरचनाओं का कुछ हिस्सा मध्यकालीन काल का माना जाता है. संभवतः तटीय क्षरण (coastal erosion) ही उस प्राचीन बंदरगाह के विनाश का कारण बना.
15वीं शताब्दी में द्वारका का राजा वाढेल राजपूत भीम था, जो स्थानीय वाघेर समुद्री डाकुओं (Vagher pirates) पर भी शासन करता था. उसी समय मौलाना महमूद समरकंदी समुद्री यात्रा कर रहे थे, लेकिन एक तूफान के कारण उनका जहाज द्वारका के तट पर आ गया. वहां वाघेर डाकुओं ने जहाज पर हमला कर दिया, लूटपाट की और महिलाओं को बंदी बना लिया. महमूद समरकंदी और उनके पुत्रों को बहते हुए छोड़ दिया गया.
बाद में महमूद समरकंदी ने यह मामला सुल्तान महमूद के दरबार में (मुस्तफाबाद में) पहुंचाया. इस पर सुल्तान ने द्वारका पर आक्रमण करने का निश्चय किया और 1473 ईस्वी में सेना लेकर द्वारका की ओर कूच किया. राजा भीम और उसके राजपूत द्वारका से भागकर बेट द्वारका के किले में चले गए. इस अवसर का लाभ उठाकर सुल्तान महमूद बेगड़ा ने द्वारका पर कब्ज़ा किया, नगर को लूटा, भवनों को ध्वस्त किया और द्वारकाधीश मंदिर व उसकी मूर्ति को नष्ट कर दिया. हालांकि रंगराजन के अनुसार, जिन्होंने गुजराती विद्वान जयंतिलाल ठाकेर का एक लेख उद्धृत किया है, वाघेरों ने मंदिर की रक्षा के लिए अपनी पूरी शक्ति झोंक दी थी. वर्तमान में स्थापित द्वारकाधीश की मूर्ति का प्रतिष्ठापन अनिरुद्धाश्रम शंकराचार्य द्वारा 1559 ईस्वी में किया गया.
गोमती नदी के बिना द्वारका अधूरी है. मंदिर की सीढ़ियां सीधे नदी तट तक जाती हैं. मान्यता है कि गोमती जल से स्नान कर मंदिर में दर्शन करने से पुण्य कई गुना बढ़ जाता है.यहां गोमती गंगा का रूप धारण करती है और समुद्र में मिलकर “मोक्षदायिनी” बन जाती है.
गोमती नदी भारत की पवित्र नदियों में से एक है, जिसका धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व अत्यंत गहरा है. यह सरयू नदी की एक प्रमुख सहायक नदी है और उत्तर प्रदेश के मध्य एवं पूर्वी हिस्से से होकर बहती है. इसका उद्गम स्थल उत्तराखंड के पवई गांव (पिलखुआ ताल, फूलहार झील के पास) में माना जाता है. कुल मिलाकर यह नदी लगभग 940 किलोमीटर की यात्रा तय करके गाजीपुर जिले के निकट गंगा नदी में मिल जाती है.
पौराणिक महत्व || Mythological significance
गोमती नदी का उल्लेख स्कंद पुराण, भागवत पुराण और महाभारत जैसे ग्रंथों में मिलता है. मान्यता है कि यह नदी भगवान विष्णु के चरणों से प्रकट हुई थी, इसलिए इसे पवित्र माना जाता है. द्वारका नगरी में स्थित गोमती नदी को भगवान श्रीकृष्ण से विशेष रूप से जोड़ा जाता है.ऐसा विश्वास है कि इस नदी में स्नान करने से सभी पाप धुल जाते हैं और मोक्ष की प्राप्ति होती है. द्वारका के गोमती तट पर स्थित द्वारकाधीश मंदिर, रुक्मिणी मंदिर और नागेश्वर ज्योतिर्लिंग जैसे धार्मिक स्थल इस नदी के महत्व को और बढ़ाते हैं.
ऐतिहासिक महत्व || Historical significance
इतिहासकारों का मानना है कि गोमती नदी घाटी के किनारे हजारों वर्षों से सभ्यताए बसी हुई थीं. लखनऊ, सुल्तानपुर, जौनपुर और गाजीपुर जैसे प्राचीन नगर इसी नदी के किनारे फले-फूले. मध्यकालीन शासकों ने भी इस नदी को जीवनरेखा माना. लखनऊ शहर को “गोमती तट की नगरी” कहा जाता है, जहाँ नवाबों ने अनेक इमारतें और बाग-बगीचे बसाए.
गोमती नदी को “त्रिवेणी संगम” का हिस्सा भी माना जाता है क्योंकि यह गंगा और यमुना से जुड़ी पौराणिक कथाओं में वर्णित है.
जौनपुर शहर में गोमती नदी पर बने शाही पुल और अन्य स्मारक इस नदी की ऐतिहासिक धरोहर को दर्शाते हैं.
द्वारका में गोमती तट को “गोमती घाट” कहा जाता है और यहाँ से श्रद्धालु बेट द्वारका के लिए नौका यात्रा करते हैं.
वर्तमान स्थिति
आज गोमती नदी केवल धार्मिक ही नहीं बल्कि कृषि और जीवनयापन के लिए भी महत्वपूर्ण है। हालांकि, प्रदूषण और अतिक्रमण की वजह से इसकी स्वच्छता पर खतरा बढ़ा है। सरकार और स्थानीय संगठन लगातार इसके संरक्षण के प्रयास कर रहे हैं।
गोमती नदी केवल एक जलधारा नहीं बल्कि भारत की आस्था, इतिहास और संस्कृति का जीता-जागता प्रतीक है चाहे लखनऊ की पहचान हो या द्वारका की पवित्रता—यह नदी हमेशा से लोगों की श्रद्धा और जीवन का हिस्सा रही है.
मंदिर की पूर्व–पश्चिम लंबाई 29 मीटर और उत्तर–दक्षिण चौड़ाई 23 मीटर है। यह मंदिर चूना पत्थर से बना है और इसमें बेहद बारीक नक्काशी की गई है. यह पांच मंज़िला इमारत 72 स्तंभों पर खड़ी है (कुछ स्रोतों में इसे बलुआ पत्थर का मंदिर बताया गया है जिसमें 60 स्तंभ हैं). मंदिर में दो मुख्य द्वार हैं—प्रवेश द्वार जिसे मोक्ष द्वार (अर्थात् “मुक्ति का द्वार”) कहा जाता है और निकास द्वार जिसे स्वर्ग द्वार (अर्थात् “स्वर्ग का द्वार”) कहा जाता है. इस द्वार के बाहर 56 सीढ़ियां हैं जो गोमती नदी तक जाती हैं.
मंदिर का शिखर 78 मीटर (256 फीट) ऊंचा है. शिखर पर फहराया जाने वाला ध्वज सूर्य और चंद्रमा को दर्शाता है. मान्यता है कि जब तक पृथ्वी पर सूर्य और चंद्रमा रहेंगे, तब तक भगवान कृष्ण यहां विद्यमान रहेंगे. यह त्रिकोणीय ध्वज 50 फीट (15 मीटर) लंबा होता है और दिन में चार बार बदला जाता है. श्रद्धालु नया ध्वज चढ़ाने के लिए बड़ी राशि दान करते हैं। इस धनराशि को मंदिर की ट्रस्ट निधि में जोड़ा जाता है ताकि मंदिर के संचालन और रखरखाव का खर्च पूरा किया जा सके.
गोमती नदी के किनारे स्थित द्वारकाधीश मंदिर हिंदू धर्म का एक प्रमुख तीर्थस्थान है. यह स्थल प्राचीन द्वारका नगरी और महाभारतकालीन वैदिक युग के भगवान कृष्ण से जुड़ा हुआ है.
कुरुक्षेत्र (हरियाणा) का 48 कोस परिक्रमा, मथुरा (उत्तर प्रदेश) की ब्रज परिक्रमा और गुजरात में द्वारकाधीश मंदिर की द्वारका परिक्रमा (द्वारकाधीश यात्रा). चारधाम परंपरा की उत्पत्ति स्पष्ट नहीं है, लेकिन अद्वैत वेदांत के आचार्य आदि शंकराचार्य (686–717 ईस्वी) ने इसे स्थापित किया। उन्होंने भारत के चारों कोनों में चार मठ स्थापित किए और उनसे जुड़े मंदिर हैं. उत्तर में बद्रीनाथ मंदिर, पूर्व में पुरी का जगन्नाथ मंदिर,पश्चिम में द्वारकाधीश मंदिर,और दक्षिण में रामेश्वरम का रामनाथस्वामी मंदिर.
यद्यपि ये मंदिर विभिन्न पंथों (शैव और वैष्णव) से जुड़े हैं, फिर भी चारधाम यात्रा पूरे हिंदू समाज की आस्था का प्रतीक है. परंपरागत रूप से यह यात्रा पूर्व दिशा से, पुरी से प्रारंभ होती है और दक्षिणावर्त (घड़ी की दिशा में) चलती है, जैसा कि हिंदू मंदिरों की परिक्रमा में किया जाता है.
मंदिर सुबह 6:00 बजे से दोपहर 1:00 बजे तक और शाम 5:00 बजे से रात 9:30 बजे तक खुला रहता है. कृष्ण जन्माष्टमी उत्सव (गोकुलाष्टमी) का प्रारंभ 1473–1531 के बीच महापुरुष वल्लभाचार्य द्वारा किया गया था. एक किंवदंती के अनुसार, प्रसिद्ध राजपूत राजकुमारी और कृष्ण भक्त कवयित्री मीरा बाई ने इसी मंदिर में भगवान कृष्ण में विलीन हो गई थीं. यह मंदिर सप्तपुरी (भारत के सात पवित्र नगरों) में से एक है. यह द्वारका पीठ के निकट स्थित है, जो चार प्रमुख पीठों में से एक है, जिसकी स्थापना आदि शंकराचार्य ने की थी और जिन्होंने पूरे भारत में हिंदू धार्मिक मान्यताओं को एकीकृत करने का प्रयास किया .
द्वारकाधीश मंदिर, जिसे जगत मंदिर भी कहा जाता है, गुजरात के देवभूमि द्वारका जिले में स्थित है. यह मंदिर भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित है और चारधाम यात्रा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है. हर साल लाखों श्रद्धालु और पर्यटक यहां दर्शन के लिए आते हैं. अगर आप भी इस पवित्र धाम की यात्रा करने की योजना बना रहे हैं, तो आपके मन में यह सवाल जरूर होगा कि द्वारकाधीश मंदिर कैसे पहुँचा जाए? आइए जानते हैं यात्रा के सभी साधनों के बारे में विस्तार से.
हवाई मार्ग से द्वारकाधीश मंदिर कैसे पहुंचे ||How to reach Dwarkadhish Temple by air
द्वारकाधीश मंदिर तक पहुंचने का सबसे नज़दीकी हवाई अड्डा जामनगर एयरपोर्ट है, जो द्वारका से लगभग 137 किलोमीटर दूर स्थित है. भारत के प्रमुख शहरों जैसे दिल्ली, मुंबई, अहमदाबाद और बैंगलोर से जामनगर के लिए सीधी उड़ानें उपलब्ध हैं. एयरपोर्ट से आप टैक्सी या बस लेकर 3 से 4 घंटे में द्वारका पहुंच सकते हैं.
रेल मार्ग से द्वारकाधीश मंदिर कैसे पहुंचे ||How to reach Dwarkadhish Temple by train
रेलवे मार्ग से यात्रा करने वालों के लिए द्वारका रेलवे स्टेशन सबसे सुविधाजनक है. यह स्टेशन मुंबई, दिल्ली, अहमदाबाद, राजकोट और सूरत जैसे शहरों से सीधी ट्रेनों द्वारा जुड़ा हुआ है.स्टेशन से द्वारकाधीश मंदिर मात्र 2-3 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है, जहाँ आप आसानी से ऑटो या टैक्सी से पहुंच सकते हैं.
सड़क मार्ग से द्वारकाधीश मंदिर कैसे पहुंचे || How to reach Dwarkadhish Temple by road
सड़क मार्ग से भी द्वारका पहुंचना बहुत आसान है. गुजरात राज्य परिवहन की बसें और प्राइवेट वॉल्वो बसें अहमदाबाद, राजकोट, जामनगर, सूरत और वडोदरा जैसे शहरों से नियमित रूप से द्वारका के लिए चलती हैं. अहमदाबाद से द्वारका की दूरी लगभग 440 किलोमीटर है, जिसे कार या बस से 8-9 घंटे में तय किया जा सकता है.
राजकोट से दूरी लगभग 225 किलोमीटर है, जिसे 5-6 घंटे में कवर किया जा सकता है.
जामनगर से दूरी 137 किलोमीटर है, जिसे 3-4 घंटे में पूरा किया जा सकता है.
लोकल ट्रांसपोर्ट || local transport
द्वारका पहुंचने के बाद, स्थानीय स्तर पर ऑटो रिक्शा, टैक्सी और साइकिल रिक्शा आसानी से मिल जाते हैं. शहर छोटा होने के कारण मंदिर और आसपास के दर्शनीय स्थल (जैसे गोमती घाट, रुक्मिणी देवी मंदिर, नागेश्वर ज्योतिर्लिंग और बेट द्वारका) देखने के लिए एक दिन का टूर भी किया जा सकता है.
द्वारकाधीश मंदिर जाने का सबसे अच्छा समय अक्टूबर से मार्च तक माना जाता है. इस दौरान मौसम सुहावना होता है और दर्शन व यात्रा दोनों आरामदायक रहती हैं. अगर आप जन्माष्टमी या बड़ी उत्सव तिथियों पर यहां आते हैं, तो भीड़ अधिक रहती है, इसलिए होटल और यात्रा की बुकिंग पहले से कर लें. मंदिर में प्रवेश के समय ड्रेस कोड का ध्यान रखें और मोबाइल/कैमरा जैसी वस्तुएं अंदर न ले जाएं.
द्वारकाधीश मंदिर तक पहुंचने के लिए हवाई मार्ग, रेल मार्ग और सड़क मार्ग—तीनों ऑप्शन उपलब्ध हैं. आप अपने बजट और सुविधा के अनुसार कोई भी ऑप्शन चुन सकते हैं. यहां की यात्रा केवल धार्मिक ही नहीं बल्कि सांस्कृतिक और ऐतिहासिक अनुभवों से भी भरपूर है.
मंदिर की भव्यता, गोमती नदी का पवित्र संगम, श्रीकृष्ण की लीलाएं और पुराणों की कथाएँ मिलकर इसे न केवल हिंदू धर्म का तीर्थस्थल बनाती हैं, बल्कि इसे भारत की सांस्कृतिक धरोहर का अद्वितीय हिस्सा भी बनाती हैं.
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