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गौरीकुंड ( Gaurikund ) मंदाकिनी नदी ( Mandakini River ) के तट पर स्थित है और इसे आध्यात्मिकता और मोक्ष का प्रवेश द्वार माना जाता है. ये असीम सुंदरता, लुभावने नजारें और अपार भक्ति का स्थान है, ये सभी कुछ इस एक ही स्थान में समाया हुआ है. समुद्र तल से लगभग 2,000 मीटर की ऊंचाई पर स्थित इस स्थान को भक्तों द्वारा अत्यधिक माना जाता है, जो इस स्थान को केदारनाथ मंदिर के लिए ट्रेक के लिए एक आधार शिविर मानते हैं. इसके अलावा गौरीकुंड मंदिर ( Gaurikund Mandir ) और गौरी झील भी यहां के महत्वपूर्ण स्थान हैं जो इस स्थान के लिए प्रसिद्ध हैं.
साल 2013 में विनाशकारी बाढ़ ने केदारनाथ को हिलाकर रख दिया था. 14 किलोमीटर की पैदल दूरी के रामबारा के माध्यम से गौरीकुंड ( Gaurikund ) से केदारनाथ ( Kedarnath ) तक का मूल ट्रैकिंग मार्ग पूरी तरह से धुल गया था. हालांकि, इस दुखद घटना के बाद नेहरू इंस्टीट्यूट ऑफ माउंटेनियरिंग के प्रयासों की वजह से ट्रेक रूट में काफी सुधार हुआ है और ये अब पूरी तरह से सुरक्षित है. आज, गौरीकुंड ( Gaurikund ) में धर्मशालाओं, होटल और गेस्ट हाउस के रूप में काफी तरह के रहने के विकल्प मिलते हैं.
आपको बता दें कि ट्रेकिंग यहां पर होने वाली मुख्य गतिविधि है. पूरा क्षेत्र पवित्रता और आध्यात्मिकता से गूंजता है, इतना ही नहीं यहां पर आकर आप हिमालय की सुंदरता और भव्यता को भूल जाएंगे. मार्च से नवंबर को छोड़कर ये क्षेत्र लगभग हमेशा एक बर्फ के कंबल से ढका रहता है, जो कि इस गंतव्य की भव्यता को और बढ़ा देता है.
गौरीकुंड ( Gaurikund ) का नाम भगवान शिव की पत्नी देवी पार्वती के नाम पर रखा गया है. लोकप्रिय मिथकों और किस्सों के अनुसार, गौरीकुंड वो स्थान है जहां देवी पार्वती ने तपस्या की थी, जिसमें भगवान शिव को जीतने के लिए तप और योग साधना शामिल थी. ये व्यापक रूप से माना जाता है कि भगवान शिव ने इस स्थान पर पार्वती से शादी करने के लिए स्वीकार किया और शादी त्रिरुगी नारायण में हुई थी जो कि गौरीकुंड के पास में ही स्थित है.
गौरीकुंड ( Gaurikund ) भगवान गणेश से भी संबंधित है और उन्होंने अपने हाथी के सिर को कैसे प्राप्त किया इसकी कहानी से भी जुड़ा हुआ है. ऐसा माना जाता है कि स्नान करने के दौरान पार्वती ने गणेश को अपने शरीर पर साबुन का झाग लगाया और उन्हें प्रवेश द्वार पर अपने रक्षक के रूप में रखा था. जब भगवान शिव वहां पर पहुंचे और गणेश द्वारा उन्हें रोका गया, तो वो गुस्से में आ गए और लड़के के सिर को काट दिया. पार्वती के इस आग्रह पर कि बच्चे को वापस लाया जाए, शिव ने एक भटकते हुए हाथी का सिर लिया और उसे गणेश के शरीर पर रख दिया था.
ये क्षेत्र नीचे से बहती वासुकी गंगा के साथ खुबसूरत हरियाली भी प्रदान करता है. हरे-भरे जंगलों के बीच में स्थित ये स्थान अपने मनोरम दृश्यों के लिए मशहूर हैं.
मशहूर 2 जगह
1. गौरीकुंड मंदिर ( Gaurikund Mandir ) – इस मंदिर में देवी पार्वती की मूर्ति है, जहां पर भक्त अपनी प्रार्थना करते हैं। केदारनाथ के रास्ते में लोग इस पवित्र धार्मिक स्थल की यात्रा करने के लिए यहां रुकने का मन बनाते हैं।
2. गौरी कुंड ( Gauri Kund ) – जिसे गौरी झील, पार्वती सरोवर या कम्पास की झील के रूप में भी जाना जाता है, ये वो झील है जहां पर देवी पार्वती ने भगवान गणेश की प्राणों के लिए प्रतिष्ठा की थी। हिंदू इस झील को एक पवित्र स्थान मानते हैं और यहां पर एक स्नान करते हैं। दुख की बात है कि साल 2013 की बाढ़ के बाद कुंड के स्थान पर केवल पानी की एक छोटी सी धारा बह रही है।
कब जाएं गौरीकुंड ( Best Time to Visit Gaurikund )
गौरीकुंड जाने के लिए सबसे अच्छा समय मार्च से नवंबर के बीच का है। इस वक्त यहां से बर्फ हच रही होती है और प्रकृति अपने पूरे निखार पर होती है। इसी वक्त पर आसानी से यात्रा की जाती है और केदारनाथ मंदिर के कपाट भी इसी वक्त पर खुलते हैं।
कैसे पहुंचे गौरीकुंड ( How to Reach Gaurikund )
गौरीकुंड पहुंचने के लिए आपको अगर हवाई मार्ग का इस्तेमाल करना है तो सबसे पास देहरादून का हवाई अड्डा पड़ता है जो कि 224 किलोमीटर की दूरी पर है। यहां से आप टैक्सी या बस के जरिये जा सकते हैं। वहीं गौरीकुंड से रेलवे स्टेशन ऋषिकेश का सबसे पास पड़ेगा जो कि 200 किलोमीटर की दूरी पर है। यहां से भी आपको आसानी से बसें मिल जाएंगी। गौरीकुंड अच्छी तरह से उत्तराखंड की अलग अलग जगहों से जुड़ा हुआ है।
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