Machkund Temple Dholpur: मचकुंड को क्यों कहते हैं भारत के सभी तीर्थ स्थलों का भांजा? क्या है इसका इतिहास, जानिए
Machkund Temple Dholpur: मचकुंड भारत के सभी तीर्थ स्थलों के भतीजे के रूप में प्रसिद्ध है. इसे तीर्थराज मचकुंड भी कहा जाता है. तीर्थराज का अर्थ है सभी तीर्थों का राजा. विभिन्न तिथियों के मंदिरों की एक श्रृंखला से घिरा एक बड़ा और शांतिपूर्ण कुंड / तालाब / झील है. एक बड़े पवित्र तालाब के चारों ओर घिरे 108 मंदिरों की श्रृंखला का नाम है तीर्थराज मुचुकुन्द भगवान श्रीराम से उन्नीस पीढ़ी पहले, 24वें सूर्यवंशी राजा मुचुकंद के नाम से पहचाना जाता है.
तीर्थराज मचकुण्ड देश में प्रमुख धार्मिक स्थलों में विशेष महत्व है. यहां 108 प्राचीन मंदिरों की श्रृंखला, पवित्र सरोवर के चारों ओर एक किलोमीटर परिक्रमा मार्ग, हर अमावस्या पर संपूर्ण तीर्थ की परिक्रमा, हर पूर्णिमा पर कुंड की पूजा-आरती, सन् 1612 में बना शेर शिकार गुरुद्वारा मुख्य आकर्षण का केन्द्र है. हर वर्ष ऋषि पंचमी व बलदेव छठ को लक्खी मेला लगता है.
मेले में लाखों की तादाद में श्रद्धालु आते हैं. शादियों की मौरछड़ी व कलंगी का विसर्जन भी करते है. माना जाता है कि यहां स्नान करने से चर्म रोग सम्बन्धी समस्त बीमारी से छुटकारा मिलता है. तीर्थराज मुचुकुण्द का मुख्य आकर्षण चार मन्दिरों में है.
जानकारों के अनुसार त्रेता युग में महाराजा मान्धाता के तीन पुत्र हुए, अमरीष, पुरू और मचुकुंड. युद्ध नीति में निपुण होने से देवासुर संग्राम में इंद्र ने महाराज मचकुंड को अपना सेनापति बनाया युद्ध में विजय श्री मिलने के बाद महाराज मचकुंड ने विश्राम की इच्छा प्रकट की. देवताओं ने वरदान दिया कि जो तुम्हारे विश्राम में खलल डालेगा, वह तुम्हारी नेत्र ज्योति से वहीं भस्म हो जायेगा. देवताओं से वरदान लेकर महाराज मचकुंड श्यामाष्चल पर्वत (जहां अब मौनी सिद्ध बाबा की गुफा है) की एक गुफा में आकर सो गए.
इधर जब जरासंध ने कृष्ण से बदला लेने के लिए मथुरा पर 18वीं बार चढ़ाई की तो कालियावन भी युद्ध में जरासंध का सहयोगी बनकर आया. कालियावन महर्षि गाग्र्य का पुत्र व म्लेक्ष्छ देश का राजा था. वह कंस का भी परम मित्र था. भगवान शंकर से उसे युद्ध में अजय का वरदान भी मिला था. शंकर ने वरदान को पूरा करने के लिए कृष्ण रण क्षेत्र छोड़कर भागे. तभी कृष्ण को रणछोड़ भी कहा जाता है. कृष्ण को भागता देख कालियावन ने उनका पीछा किया. मथुरा से करीब सवा सौ किमी दूर तक आकर श्यामाश्चल पर्वत की गुफा में आ गये, यहां मचकुंड महाराज सो रहे थे.
कृष्ण ने अपनी पीताम्बरी मचकुंड के ऊपर डाल दी और खुद एक चट्टान के पीछे छिप गए. कालियावन भी पीछा करते करते उसी गुफा में आ गया. दंभ में डूबे कालियावन ने सो रहे मचकुंड को कृष्ण समझकर ललकारा. मचकुंड जगे और उनकी नेत्र की ज्वाला से कालियावन वहीं भस्म हो गया. यहां भगवान कृष्ण ने मचकुंड जी को विष्णुरूप के दर्शन दिए.
मचकुंड दर्शनों से अभिभूत होकर बोले-हे भगवान! तापत्रय से अभिभूत होकर सर्वदा इस संसार चक्र में भ्रमण करते हुए मुझे कभी शांति नहीं मिली. देवलोक का बुलावा आया तो वहां भी देवताओं को मेरी सहायता की आवश्कता हुई. स्वर्ग लोक में भी शांति प्राप्त नहीं हुई.
यज्ञ में सभी देवी-दवताओ व तीर्थों को बुलाया गया. इसी दिन कृष्ण से आज्ञा लेकर महाराज मचकुंड गंधमादन पर्वत पर तपस्या के लिए प्रस्थान कर गए. वह यज्ञ स्थल आज पवित्र सरोवर के रूप में हमें इस पौराणिक कथा का बखान कर रहा है. सभी तीर्थो का नेह जुड़ जाने से इसे तीर्थों का भांजा भी कहा जाता है. हर वर्ष ऋषि पंचमी व बलदेव छठ को जहां लक्खी मेला लगता है. मेले में लाखों की तादाद में श्रद्धालु आते हैं. शादियों की मौरछड़ी व कलंगी का विसर्जन भी जहां करते है. माना जाता है कि यहां स्न्नान करने से चर्म रोग संबन्धी समस्त पीड़ाओं से छुटकारा मिलता है.
मचकुंड धाम धौलपुर शहर के पास लगभग 4 किमी की दूरी पर स्थित है. मचकुंड धाम तक पहुंचने के लिए ऑटो-रिक्शा और कैब जैसे स्थानीय परिवहन आसानी से उपलब्ध हैं. मचकुंड पहुंचना बहुत आसान है क्योंकि यह तीर्थ स्थल के लिए एक समर्पित सड़क के जरिए से धौलपुर शहर से अच्छी तरह से जुड़ा हुआ है. और, धौलपुर अन्य पड़ोसी शहरों से रेल और सड़क परिवहन के माध्यम से अच्छी तरह से जुड़ा हुआ है.
दिल्ली से मचकुंड की यात्रा दूरी लगभग 300 किलोमीटर है.
मथुरा से मचकुंड की यात्रा दूरी लगभग 130 किलोमीटर है.
आगरा से मचकुंड की यात्रा दूरी लगभग 62 किलोमीटर है.
मुरैना से मचकुंड की यात्रा दूरी लगभग 31 किलोमीटर है.
भिंड से मचकुंड की यात्रा दूरी लगभग 135 किलोमीटर है.
ग्वालियर से माचकुंड की यात्रा दूरी लगभग 70 किलोमीटर है.
झांसी से मचकुंड की यात्रा दूरी लगभग 170 किलोमीटर है.
ओरछा से मचकुंड की यात्रा दूरी लगभग 200 किलोमीटर है.
शिवपुरी से मचकुंड की दूरी लगभग 190 किलोमीटर है.
बीना से मचकुंड की यात्रा दूरी लगभग 350 किलोमीटर है.
भोपाल से मचकुंड की यात्रा दूरी लगभग 500 किलोमीटर है.
इंदौर से मचकुंड की यात्रा दूरी लगभग 600 किलोमीटर है.
उज्जैन से मचकुंड की यात्रा दूरी लगभग 550 किलोमीटर है.
जबलपुर से मचकुंड की यात्रा दूरी लगभग 540 किलोमीटर है.
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