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Best Tourist Places to Visit in Orchha : मध्य प्रदेश के ओरछा में घूमने की पूरी जानकारी

Best Tourist Places to Visit in Orchha : Madhya Pradesh के Bundelkhand क्षेत्र में बसा है Orchha… Orchha की हमारी यात्रा शुरू हुई The Lotus Hotel से… ये होटल Jhansi से Tikamgarh जाने वाले रास्ते पर पड़ता है. Madhya Pradesh सरकार ने Bundelkhand में स्थित Tikamgarh के क्षेत्र के कुछ हिस्से को अलग करके एक और जिला बनाया है जिसे अब Niwari District के नाम से जाना जाता है. निवाड़ी मध्य प्रदेश का सबसे छोटा जिला है और इसी निवाड़ी जिले में स्थित है ओरछा. ओरछा नगर की स्थापना 1531 ईस्वी में बुंदेला राजपूत शासक रुद्र प्रताप सिंह ने की थी. ओरछा, बुंदेलखंड क्षेत्र में स्थित एक पूर्व रियासत की राजधानी थी, जिसमें मध्य और उत्तर भारत के कुछ हिस्से शामिल थे।

ओरछा नगर बेतवा नदी के तट पर बसा हुआ है, ये नगर ग्वालियर से 126 किलोमीटर, टीकमगढ़ से 89 किलोमीटर और उत्तर प्रदेश के झांसी से 18 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है.

बुंदेला सरदार रुद्र प्रताप सिंह ने इस शहर की नींव रखी थी. वे ओरछा के पहले राजा बने और उन्होंने ओरछा किले का निर्माण भी कराया. चतुर्भुज मंदिर का निर्माण ओरछा की रानी गणेश कुँवरी ने करवाया था, जबकि राज मंदिर का निर्माण राजा मधुकर शाह ने 1554 से 1591 के अपने शासनकाल में कराया था, अक्टूबर 1635 में मुगल युवराज औरंगज़ेब के नेतृत्व में आई शाही मुगल सेना ने ओरछा पर अधिकार कर लिया था.

बेतवा नदी के किनारे बसे छोटा-से शहर, ओरछा की कहानी किसी बड़े साम्राज्य से कम नहीं है. बुंदेला राजा रुद्र प्रताप सिंह ने इसकी नींव रखी। कहा जाता है कि यहाँ की शांति और नदी का किनारा उन्हें इतना पसंद आया कि यहीं उन्होंने अपनी राजधानी बसा दी।

समय बदला, मुग़ल आए… लेकिन ओरछा ने कभी अपनी पहचान नहीं खोई। बुंदेला राजा वीर सिंह देव ने मुग़ल बादशाह जहांगीर के स्वागत में वो महल बनवाया, जिसे आज हम जहांगीर महल के नाम से जानते हैं।

और सबसे दिलचस्प बात— ओरछा में भगवान राम को देवता नहीं, राजा माना जाता है। यही वजह है कि राम राजा मंदिर में आज भी उन्हें गार्ड ऑफ ऑनर दिया जाता है।

आज ओरछा कोई राजधानी नहीं, लेकिन इसके किले, मंदिर और घाट अब भी उसकी शाही कहानी कहते हैं… आइए चलते हैं ओरछा की कमाल की यात्रा पर और जानते हैं कि ओरछा में घूमने के लिए कौन कौन सी महत्वपूर्ण जगहें हैं और ओरछा में आप कैसे पहुंच सकते हैं… आइए इस सफर की शुरुआत करते हैं…

दोस्तों, ओरछा आज भी ये किसी गांव जैसा लगता है, वहीं शांति और सहजता… लेकिन टूरिस्ट्स की बढ़ चुकी भीड़ इस छोटे से नगर की कहानी बयां कर देती है. ओरछा की अपनी यात्रा पर हम सबसे पहले पहुंचे चतुर्भुज मंदिर… चतुर्भुज मंदिर, मध्य प्रदेश के ऐतिहासिक नगर ओरछा में स्थित एक अत्यंत भव्य और प्रसिद्ध मंदिर है। इसका निर्माण 16वीं शताब्दी में ओरछा की रानी गणेश कुँवर ने भगवान राम के लिए कराया था। रानी रामभक्ति में अत्यंत आस्था रखती थीं और उनका उद्देश्य अयोध्या से भगवान राम की प्रतिमा लाकर इसी मंदिर में स्थापित करना था। किंवदंती के अनुसार, प्रतिमा को अस्थायी रूप से रानी महल में रखा गया, लेकिन बाद में भगवान राम ने वहीं विराजमान होने की इच्छा जताई, जिसके कारण प्रतिमा को चतुर्भुज मंदिर में स्थापित नहीं किया गया। यही स्थान आगे चलकर राम राजा मंदिर के नाम से प्रसिद्ध हुआ, जहाँ भगवान राम की पूजा राजा के रूप में की जाती है।

चतुर्भुज मंदिर अपनी अनोखी वास्तुकला के लिए विशेष रूप से जाना जाता है। यह मंदिर मंदिर और किले की मिश्रित शैली में निर्मित है और इसके चार ऊँचे शिखर दूर से ही दिखाई देते हैं। इसकी ऊँचाई लगभग 105 मीटर मानी जाती है, जिससे यह अपने समय के सबसे ऊँचे मंदिरों में गिना जाता था। मंदिर की संरचना में विशाल खुले हॉल, ऊँची छतें, मजबूत स्तंभ और गर्भगृह तक पहुँचने के लिए ऊँची सीढ़ियाँ शामिल हैं। आज यह मंदिर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के संरक्षण में है और ओरछा की धार्मिक, सांस्कृतिक और स्थापत्य विरासत का महत्वपूर्ण प्रतीक माना जाता है।

मंदिर में दर्शन से पहले हमने फूल मालाएं लीं…और प्रसाद भी लिया… यहां के मिल्क केक के तो क्या ही कहने… कमाल का स्वाद है इसका… मंदिर में दर्शन से पहले हमने यहां तुलसी की माला भी खरीदी… कारीगर यहां हाथ की महीन कला से इसे तैयार कर रहे थे. मंदिर के अंदर हमें मिले गाइड ध्रुव ठाकुर… उन्होंने ढाई सौ रुपए में हमें पूरा मंदिर न सिर्फ घुमाया बल्कि ऐसी बारीक जानकारी भी दीं जो शायद बगैर इनके हम नहीं ले पाते…

चतुर्भुज मंदिर से पैदल दूरी पर स्थित है राजा राम मंदिर. ओरछा का राजा राम मंदिर भारत का एकमात्र ऐसा मंदिर है जहाँ भगवान श्रीराम की पूजा राजा के रूप में की जाती है। यह मंदिर मध्य प्रदेश के ऐतिहासिक नगर ओरछा में स्थित है और इसका मूल स्वरूप ओरछा का रानी महल था, जिसे बाद में मंदिर में परिवर्तित किया गया। 16वीं शताब्दी में ओरछा की रानी गणेश कुँवर अयोध्या से भगवान राम की बाल स्वरूप की प्रतिमा लाई थीं। मान्यता है कि प्रतिमा को अस्थायी रूप से इसी महल में रखा गया था, लेकिन भगवान राम ने यहीं स्थायी रूप से विराजमान होने की इच्छा प्रकट की, जिसके कारण उन्हें अन्यत्र स्थानांतरित नहीं किया गया और यही स्थान आगे चलकर राजा राम मंदिर कहलाया।

इस मंदिर की सबसे अनोखी विशेषता यह है कि यहाँ भगवान राम को राजा मानकर उनकी पूजा की जाती है। प्रतिदिन मंदिर में राजकीय परंपराओं के अनुसार पूजा होती है—पुलिस गार्ड की सलामी, राजसी ध्वज, और सरकारी प्रोटोकॉल के साथ आरती की जाती है। मंदिर में श्रीराम के साथ माता सीता, लक्ष्मण और हनुमान की प्रतिमाएँ भी स्थापित हैं। राजा राम मंदिर न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि यह ओरछा की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान का भी प्रतीक है, जहाँ भक्ति, शासन और परंपरा एक साथ दिखाई देती हैं।

राजा राम मंदिर में दर्शन पूजन के बाद हमने बाहर एक स्टॉल पर पूरी सब्जी खाई और चल दिए शहर की एक और ऐतिहासिक इमारत को देखने. ये इमारत थी ओरछा का किला और इसी परिसर में स्थित जहांगीर महल.

बेतवा नदी के शांत प्रवाह के किनारे खड़ा ओरछा का किला ऐसा लगता है मानो आज भी अपने गौरवशाली अतीत की कहानी सुना रहा हो। 16वीं शताब्दी में बुंदेला शासकों द्वारा निर्मित यह किला केवल एक सैन्य दुर्ग नहीं था, बल्कि ओरछा रियासत की सत्ता, संस्कृति और कला का जीवंत केंद्र रहा। ऊँची-ऊँची प्राचीरें, मजबूत बुर्ज और भव्य प्रवेश द्वार इस बात की गवाही देते हैं कि यह स्थान कभी रणनीति और शासन का मुख्य आधार था। किले के भीतर प्रवेश करते ही इतिहास मानो जीवंत हो उठता है—यहाँ स्थित राजा महल, शीश महल, राय प्रवीण महल और अन्य इमारतें बुंदेला स्थापत्य की भव्यता और सौंदर्यबोध को दर्शाती हैं। दीवारों पर बने प्राचीन भित्तिचित्र, दरबारों के खुले आंगन और पत्थरों पर उकेरी गई नक्काशी उस समय के राजसी जीवन की झलक प्रस्तुत करती हैं।

इसी किले परिसर में स्थित जहांगीर महल ओरछा की शान और गौरव का सबसे प्रभावशाली प्रतीक माना जाता है। इस महल का निर्माण 17वीं शताब्दी की शुरुआत में बुंदेला राजा वीर सिंह देव ने मुगल सम्राट जहांगीर के स्वागत के लिए करवाया था। दिलचस्प बात यह है कि जहांगीर केवल एक बार ही ओरछा आए, लेकिन उनके सम्मान में बना यह महल आज भी इतिहास के पन्नों में अमर है। तीन मंज़िला यह महल बुंदेला और मुगल स्थापत्य शैलियों का अनोखा संगम है—ऊँचे बुर्ज, मेहराबदार प्रवेश द्वार, सुंदर झरोखे और संतुलित संरचना इसे देखने वाले को मंत्रमुग्ध कर देती है। महल की छत पर बनी भव्य छतरियाँ और भीतर के खुले आंगन इसे और भी आकर्षक बनाते हैं। यहां से बेतवा नदी और आसपास के मंदिरों का दृश्य ऐसा प्रतीत होता है जैसे इतिहास और प्रकृति एक-दूसरे से संवाद कर रहे हों।

ओरछा किले का भूल-भुलैया जैसा डिज़ाइन उसकी सबसे रोचक और रहस्यमयी विशेषताओं में से एक है। किले के भीतर चलते हुए ऐसा महसूस होता है मानो रास्ते जानबूझकर उलझाए गए हों—अचानक मुड़ती संकरी गलियाँ, एक-दूसरे से जुड़ी सीढ़ियाँ, छिपे हुए मार्ग और बिना सूचना के खुलते आंगन। यह डिज़ाइन केवल सौंदर्य के लिए नहीं, बल्कि सुरक्षा के उद्देश्य से बनाया गया था, ताकि शत्रु किले में प्रवेश करने के बाद भ्रमित हो जाए और आगे बढ़ना कठिन हो जाए। बुंदेला स्थापत्य में इस तरह की भूल-भुलैया रणनीतिक सोच का प्रतीक थी, जहाँ हर मोड़ पर निगरानी और हर रास्ते पर नियंत्रण संभव था। आज यही उलझा हुआ डिज़ाइन ओरछा किले को और भी दिलचस्प बनाता है, जहाँ पर्यटक इतिहास के साथ-साथ रोमांच का अनुभव भी करते हैं।

कुल मिलाकर, ओरछा का किला और जहांगीर महल केवल पत्थरों से बनी संरचनाएँ नहीं हैं, बल्कि वे बुंदेला शौर्य, मुगल प्रभाव और भारतीय स्थापत्य कला के संगम की जीवंत मिसाल हैं। यहाँ घूमते हुए ऐसा महसूस होता है मानो हर दीवार, हर सीढ़ी और हर आंगन अपने भीतर सैकड़ों वर्षों की कहानियाँ समेटे हुए है, जो आज भी आगंतुकों को अतीत की यात्रा पर ले जाती हैं।

ओरछा किले के रास्ते में हमें दिखाई दी एक रंजना जी. पर्यटकों की भीड़ और नगर के शोर शराबे के बीच ये तल्लीनता से गोंड आर्ट बनाने में जुटी हुई थीं. गोंड आर्ट सिर्फ चित्रकला नहीं, बल्कि जंगलों में बसती कहानियों की रंगीन भाषा है। मध्य भारत की गोंड जनजाति द्वारा विकसित यह ट्राइबल आर्ट प्रकृति, पशु-पक्षियों, पेड़ों और लोकदेवताओं से गहरे जुड़ी होती है। इसकी पहचान बारीक डॉट्स और लाइनों से भरे पैटर्न हैं, जो हर आकृति को जीवित-सा बना देते हैं। गोंड कलाकार मानते हैं कि प्रकृति की हर चीज़ में आत्मा होती है, इसलिए उनके चित्र बोलते हुए महसूस होते हैं। पहले यह कला घरों की दीवारों पर प्राकृतिक रंगों से बनाई जाती थी, और आज कैनवास पर दुनिया भर में सराही जा रही है—जहाँ हर चित्र एक लोककथा की तरह सामने आता है। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, तेलंगाना और ओडिशा के कुछ हिस्सों में रहने वाली गोंड जनजाति ने इस कला को पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित रखा है।

ओरछा में किले की यात्रा के बाद हम पहुंच गए कल्प वृक्ष को देखने… लाइफ में आज तक किसी कल्प वृक्ष को नहीं देखा था….

राजा राम की नगरी कही जाने वाली ओरछा की पवित्र भूमि पर सालों पुराना कल्प वृक्ष है, कहा जाता है कि अगर इसके नीचे खड़े हो कर आप मन ही मन कोई इच्छा करें तो वो जरूर पूरी होती है। इसकी इस विशेषता के कारण ही स्थानीय लोग इसे कल्प वृक्ष भी कहते हैं।

हमारी यात्रा का अगला पड़ाव था ओरछा की शाही छतरियां…

ओरछा की शाही छतरियाँ मध्य प्रदेश की बुंदेला विरासत की सबसे भावनात्मक और ऐतिहासिक प्रतीकों में गिनी जाती हैं। ये छतरियाँ बेतवा नदी के तट पर स्थित उन राजकीय स्मारकों का समूह हैं, जिन्हें बुंदेला वंश के राजाओं और उनके परिजनों की स्मृति में निर्मित किया गया था। राजपूत परंपरा के अनुसार, राजा की मृत्यु के बाद उसकी समाधि के स्थान पर छतरी बनवाई जाती थी, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ उसके शासन, पराक्रम और योगदान को स्मरण कर सकें। ओरछा की ये छतरियाँ 16वीं से 18वीं शताब्दी के बीच निर्मित मानी जाती हैं और बुंदेला इतिहास की जीवंत कड़ी हैं।

वास्तुकला की दृष्टि से ये छतरियाँ बुंदेला और मुगल शैली का सुंदर समन्वय प्रस्तुत करती हैं। ऊँचे चबूतरों पर खड़ी गोलाकार या अष्टकोणीय संरचनाएँ, पत्थर के सुदृढ़ स्तंभ, अलंकृत मेहराबें और विशाल गुंबद इन्हें विशिष्ट पहचान देते हैं। कुछ छतरियों में अंदर की दीवारों पर हल्की नक्काशी और धार्मिक प्रतीक भी दिखाई देते हैं। इनका खुला स्थापत्य इस प्रकार बनाया गया है कि नदी से आने वाली हवा और रोशनी भीतर तक पहुँच सके, जिससे वातावरण गंभीर, शांत और ध्यानमय बना रहता है।

ऐतिहासिक रूप से ये छतरियाँ केवल स्मारक नहीं थीं, बल्कि बुंदेला राजसत्ता की प्रतिष्ठा और निरंतरता का प्रतीक भी थीं। बेतवा नदी के किनारे इनका निर्माण इसलिए किया गया ताकि जल, जीवन और मृत्यु के बीच का संबंध स्पष्ट हो सके। माना जाता है कि यहाँ किए गए अंतिम संस्कार और स्मृति-स्थलों का उद्देश्य राजा की आत्मा की शांति और उसके यश को अमर बनाना था। आज जब सूर्यास्त के समय नदी के जल में इन छतरियों की परछाइयाँ पड़ती हैं, तब ओरछा का यह स्थल केवल एक पर्यटन स्थल नहीं रह जाता, बल्कि इतिहास, दर्शन और शौर्य की गहरी अनुभूति कराता है।

शाम होने वाली थी और हम पहुंच गए थे अपनी यात्रा के आखिरी पड़ाव कंचन घाट पर… कंचन घाट पर ही बना है बोट क्लब और यहां आप बेतवा नदी में बोट राइड का मजा ले पाते हैं… बात करें बेतवा नदी की, तो ये मध्य भारत की एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक नदी है, जो न केवल प्राकृतिक दृष्टि से बल्कि सांस्कृतिक और धार्मिक रूप से भी विशेष स्थान रखती है। इसका उद्गम मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के पास स्थित विंध्याचल पर्वतमाला से माना जाता है। बेतवा नदी मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश से होकर बहती हुई अंततः यमुना नदी में मिल जाती है, जिससे यह गंगा-यमुना नदी तंत्र का एक अहम हिस्सा बनती है।

कंचन घाट पर होने वाली बोट राइड का किराया अलग अलग है. मोटर बोट के लिए 100 रुपए पर पर्सन, राफ्टिंग बोट के लिए 200 रुपए, कायकिंग के लिए 400 रुपए, और रिवर राफ्टिंग के लिए 2850 रुपए चुकाने होते हैं. ओरछा में बेतवा नदी में रिवर राफ्टिंग और नौका विहार बड़ी संख्या में साहसी लोगों को आकर्षित करता है और मध्य प्रदेश में एक शीर्ष राफ्टिंग गंतव्य भी है. मॉनसून के दौरान राफ्टिंग बंद हो जाती है…

दोस्तों, आइए जानते हैं कि आप ओरछा कैसे पहुंच सकते हैं…. बात करें हवाई मार्ग की तो ओरछा का अपना हवाई अड्डा नहीं है। यहां का सबसे नज़दीकी एयरपोर्ट ग्वालियर में स्थित राजमाता विजयाराजे सिंधिया एयरपोर्ट है, जो ओरछा से लगभग 130 किमी दूर स्थित है. दिल्ली, मुंबई, भोपाल जैसे बड़े शहरों से ग्वालियर के लिए नियमित फ्लाइट्स मिल जाती हैं. ग्वालियर एयरपोर्ट से ओरछा तक टैक्सी या कैब द्वारा 3 से 3.5 घंटे में पहुँचा जा सकता है.

दूसरा विकल्प: खजुराहो एयरपोर्ट है, जो लगभग 170 किमी दूर है।

रेल मार्ग से ओरछा कैसे पहुंच सकते हैं?

ओरछा का सबसे नज़दीकी रेलवे स्टेशन झांसी जंक्शन है, जो ओरछा से केवल 20 किमी की दूरी पर स्थित है।

झांसी देश के प्रमुख रेलवे जंक्शनों में से एक है। दिल्ली, मुंबई, भोपाल, आगरा, लखनऊ, चेन्नई जैसे शहरों से झांसी के लिए सीधी ट्रेनें उपलब्ध हैं।

झांसी स्टेशन से ओरछा पहुँचने के लिए:

टैक्सी

ऑटो

लोकल कैब की सेवाएं ली जा सकती हैं.

रेल मार्ग ओरछा पहुँचने का सबसे सुविधाजनक और लोकप्रिय तरीका माना जाता है।

सड़क मार्ग से भी आप ओरछा पहुंच सकते हैं.

झांसी से ओरछा – लगभग 18 किमी

ग्वालियर से ओरछा – लगभग 125 किमी

भोपाल से ओरछा – लगभग 350 किमी

दिल्ली से सड़क मार्ग के जरिए ओरछा कनेक्टेड है.

राज्य परिवहन की बसें और निजी बसें झांसी तक आसानी से मिल जाती हैं। झांसी से ओरछा के लिए लोकल टैक्सी और ऑटो हर समय उपलब्ध रहते हैं।

ओरछा की यात्रा इतिहास, आस्था और रोमांच का एक अनोखा संगम है। यहाँ के किले, मंदिर, छतरियाँ और घाट आज भी बुंदेला गौरव की कहानी कहते हैं। बेतवा नदी की लहरों के साथ बहता हुआ ओरछा, मन को शांति और रोमांच दोनों देता है। ओरछा सिर्फ घूमने की जगह नहीं, बल्कि महसूस करने का एक जीवंत अनुभव है। आपको हमारी ये पेशकश कैसी लगी, जरूर बताएं… मिलेंगे अगली बार एक नए वीडियो में… घूमते रहें और पढ़ते – देखते रहें ट्रैवल जुनून…

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