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Singapore Diary 3: सिंगापोर में दो ही तरह का मौसम होता है. या तो गर्मी या फिर बारिश। उन दिनों भी वहां का तापमान लगभग 34 -35 डिग्री के आसपास चल रहा था। वहां भी भारत की तरह होटल का चेक इन टाइम दोपहर दो बजे का था जबकि हम वहां लगभग 11.30 बजे ही पहुँच गए। होटल की लॉबी में देखा तो कुछ भारतीय और विदेशी कमरे के इंतज़ार में सोफों पर पसरे पड़े थे।
आशा के अनुरूप हमें भी कमरे के लिए इंतज़ार करने को कहा गया। अब क्या करे? तो रिसेप्शन से सुझाव मिला कि पास ही में लिटल इंडिया है, वहां घूम आइए। हमारे पास कोई और ऑप्शन भी तो नहीं था। लिटल इंडिया वाकई में पास ही था। भूख लगी थी तो सोचा कि कुछ खा लिया जाए।
थोड़ी ही दूरी पर एक कुछ भारतीय रेस्त्रां नज़र आये। एक शाकाहारी रेस्त्रां में मेन्यू पूछा तो बोला जी ‘कीमा’ मिलता है। मैंने हैरान होकर पूछा तो रेस्त्रां मालिक हँसते हुए बोला कि ये शाकाहारी कीमा है। पर उस सब्ज़ी की शक्ल ही अच्छी नहीं थी तो मैं आगे बढ़ गयी। थोड़ी दूरी पर ‘आनंद भवन’ नाम का शाकाहारी दक्षिण भारतीय रेस्त्रां मिला।
मन को सुकून मिला कि चलो खाने के लिए ज्यादा भटकना नहीं पड़ा। रेस्त्रां में सेल्फ सर्विस थी। मेरे पति ने आदतन मेरे लिए आर्डर दिया कि ‘एक’ मसाला डोसा। मैंने हँसते हुए उन्हें टोका कि ये विदेश है, यहाँ ‘एक’ मसाला डोसा नहीं, ‘वन’ मसाला डोसा कहिये। वो बहुत ही साधारण सा नॉन एसी रेस्त्रां था फिर भी हम चार लोगों का खाने का बिल हज़ार रूपये था। कारण; वहां की मुद्रा महँगी थी।
एक सिंगापोर डॉलर लगभग 50 रूपये के बराबर था। खाना खा कर बाहर निकले। थोड़ा आगे बढे तो देखा लिटल इंडिया वाकई में लिटल इंडिया ही था। वहां पंजाबी सूट से लेकर दक्षिण भारतीय साड़ियाँ मिल रही थी। किसी दुकान पर दक्षिण भारतीय संगीत बज रहा था तो एक पंजाबी रेस्त्रां में तो यो यो हनी सिंह भी सुनाई दे रहा था। एक बात वहां बड़ी दिलचस्प थी।
वहां ढेर सारी ज़ेवरों की दुकाने थी। मुझे लगा कि इस तरह ज़ेवर खुले में रखे है तो नकली ज़ेवर ही होंगे। पर बड़े खूबसूरत ज़ेवर थे बिलकुल असली ज़ेवरों जैसे। उत्सुकतावश वहां एक दुकानदार से एक छोटी सी नाक की लॉन्ग का रेट पूछा तो उन्होंने सोने के भाव से कैलकुलेट करके लगभग 240 डॉलर यानी 12000 रूपये बताया। तब पता चला कि ये सब असली हीरे और सोने के ज़ेवर थे।
वहां भी भारत की तरह पटरी बाजार लगा था जिसमे खूब भीड़ भी थी लेकिन मज़ाल है कि कही कोई जाम लग जाए या भीड़ में किसी की जेब कट जाए या फिर महिलाओं के साथ किसी तरह की बदतमीज़ी हो जाये। वहां ज्यादातर लडकियां शॉर्ट्स और कट स्लीव्स की और खुले गले की टी शर्ट्स में थी जबकि स्त्रियों ने ज्यादातर वन पीस मिड्डी पहनी हुई थी। लड़के भी हाफ पेंट और टी शर्ट में थे।
वहां माहौल बहुत खुला था। किसी की आँखों में किसी महिला के लिए कोई वाहियात या गलत ख्याल नहीं था। एक बात और थी, वहां कोई भी बच्चा माता पिता की गोदी में नहीं था। सभी गोदी के बच्चे अपनी प्रैम में थे। एक और बात नोटिस करने लायक थी। वहां लोग साइकिल बड़े आराम से चला रहे थे और जो लोग महँगी गाड़ियां चला रहे थे उनमे भी कही अपनी गाडी का दिखावा नहीं था।
ऐसा लगता था मानो कि वहां के लोग बहुत ही पर्यावरण प्रेमी थे। सबके पास महंगी कारों के साथ साथ साइकिल भी थी और कार का इस्तेमाल वे अपनी ज़रूरत के लिए ही करते थे नाकि दिखावे के लिए। रास्ते भर इसी तरह की अनोखी चीज़े देखते देखते हम अपने होटल वापिस आ गए।
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