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Nitish Kumar political journey : छात्र आंदोलन से मुख्यमंत्री तक,नीतीश कुमार की कहानी

Nitish Kumar political journey : बिहार की राजनीति में 1990 के दशक के मध्य से एक मजबूत पहचान बनाने वाले Nitish Kumar मार्च 2026 में मुख्यमंत्री के रूप में अपने दसवें कार्यकाल को समाप्त करने जा रहे हैं। लंबे समय तक राज्य की राजनीति के केंद्र में रहे नीतीश कुमार ने गठबंधनों और विकास योजनाओं के जरिए बिहार की राजनीतिक दिशा को प्रभावित किया।

छात्र आंदोलन से राजनीति में शुरुआत || Beginning in politics through student movement

नीतीश कुमार ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत 1974 में लोकनायक Jayaprakash Narayan के “संपूर्ण क्रांति” आंदोलन से की थी। इसके बाद 1985 में वे पहली बार नालंदा जिले के हरनौत विधानसभा क्षेत्र से विधायक चुने गए।

1989 में वे पहली बार लोकसभा पहुंचे और बाद में 1990 में प्रधानमंत्री V. P. Singh की सरकार में राज्य मंत्री बने।

लालू प्रसाद से अलग राह || A path separate from Lalu Prasad

1990 के दशक की शुरुआत में नीतीश कुमार ने Lalu Prasad Yadav को मुख्यमंत्री बनाने में अहम भूमिका निभाई थी। लेकिन बाद में दोनों नेताओं के बीच राजनीतिक मतभेद बढ़ गए।

1994 में उन्होंने समाजवादी नेता George Fernandes के साथ मिलकर समता पार्टी बनाई। इसी दौर में पटना के गांधी मैदान में कुर्मी समाज की बड़ी ‘कुर्मी चेतना महारैली’ आयोजित की गई, जिसने उनकी सामाजिक और राजनीतिक पकड़ को मजबूत किया।

केंद्र की राजनीति और रेल मंत्री का कार्यकाल || Central politics and the tenure of the Rail Minister

1996 में समता पार्टी ने भाजपा के साथ गठबंधन किया। इसके बाद 1998 से 2004 तक नीतीश कुमार प्रधानमंत्री Atal Bihari Vajpayee की सरकार में रेल मंत्री रहे। इस दौरान उन्होंने रेलवे में कई सुधारों की शुरुआत की।

मुख्यमंत्री बनने का सफर || The journey to becoming Chief Minister

मार्च 2000 में वे पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री बने, लेकिन विधानसभा में बहुमत साबित न कर पाने के कारण उन्हें सिर्फ सात दिन बाद ही इस्तीफा देना पड़ा।

इसके बाद नवंबर 2005 में वे फिर मुख्यमंत्री बने और लंबे समय तक सत्ता में बने रहे। 2005 से 2026 के बीच उन्होंने कई बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली और कुल मिलाकर दस कार्यकाल पूरे किए।

हालांकि 2014 से 2015 के बीच लगभग नौ महीने के लिए Jitan Ram Manjhi बिहार के मुख्यमंत्री रहे।

विकास और सुशासन की छवि || Image of development and good governance

मुख्यमंत्री के रूप में नीतीश कुमार ने “सुशासन” और “समावेशी विकास” को अपनी राजनीति का आधार बनाया। उन्होंने सड़कों, सरकारी भवनों और कानून-व्यवस्था में सुधार पर जोर दिया।

लड़कियों के लिए साइकिल योजना और सरकारी नौकरियों में महिलाओं को 35 प्रतिशत आरक्षण जैसे फैसलों ने उन्हें अलग पहचान दिलाई।

2010 में तीसरी बार मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने अपने एजेंडे को “गवर्नेंस, गवर्नेंस और गवर्नेंस” बताया, जिसके कारण उन्हें “सुशासन बाबू” का नाम मिला।

गठबंधनों की राजनीति || Politics of alliances

हालांकि नीतीश कुमार की राजनीति में कई बार गठबंधन बदलने को लेकर भी चर्चा होती रही। उन्होंने मुख्यमंत्री पद पर बने रहने के लिए दो बार भाजपा से अलग होकर विपक्षी दलों के साथ महागठबंधन बनाया और बाद में फिर भाजपा के साथ भी आए।

राज्यसभा की ओर बढ़ते कदम || Steps towards the Rajya Sabha

Rajya Sabha भारत की संसद का उच्च सदन है। लोकसभा के विपरीत इसके सदस्यों का चुनाव सीधे जनता द्वारा नहीं बल्कि राज्य विधानसभाओं के निर्वाचित प्रतिनिधियों और संसद के सदस्यों के जरिए अप्रत्यक्ष रूप से होता है।

बिहार से राज्यसभा की पांच सीटें जल्द खाली होने वाली हैं। मुख्यमंत्री Nitish Kumar के गठबंधन के नेताओं का कहना है कि राज्य विधानसभा में उनके पास पर्याप्त समर्थन है, जिससे इन सीटों में से कई पर जीत हासिल की जा सकती है।

यदि नीतीश कुमार राज्यसभा के लिए चुने जाते हैं, तो परिणामों की आधिकारिक घोषणा के बाद वे मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे सकते हैं।

हालांकि जेडीयू के एक नेता के अनुसार, वे तुरंत इस्तीफा देने के बजाय थोड़ा इंतजार भी कर सकते हैं, क्योंकि वर्तमान राज्यसभा सदस्यों का कार्यकाल अप्रैल में समाप्त हो रहा है।

राजनीतिक हलकों में यह भी माना जा रहा है कि उनकी सेहत से जुड़ी चिंताओं ने इस फैसले को प्रभावित किया है। पार्टी और सत्तारूढ़ गठबंधन के कुछ नेताओं का कहना है कि मुख्यमंत्री पद छोड़ने को लेकर अंदरूनी चर्चा काफी समय से चल रही थी।

बिहार के अगले मुख्यमंत्री को लेकर अनिश्चितता || Uncertainty about the next Chief Minister of Bihar

नीतीश कुमार के इस फैसले से बिहार में नए मुख्यमंत्री की संभावना बन गई है। उनका उत्तराधिकारी उनकी पार्टी Janata Dal (United) से भी हो सकता है या फिर गठबंधन की बड़ी सहयोगी पार्टी Bharatiya Janata Party से भी।

कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह स्थिति भाजपा के लिए राज्य में पहली बार मुख्यमंत्री पद हासिल करने का अवसर बन सकती है।

हालांकि भाजपा लंबे समय से बिहार की राजनीति में मजबूत ताकत रही है, लेकिन अब तक उसने स्वतंत्र रूप से राज्य सरकार का नेतृत्व नहीं किया है। अधिकतर समय वह गठबंधन सरकार का हिस्सा रही है।

भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता RP Singh ने कहा कि अगर मुख्यमंत्री पद खाली होता है, तो पार्टी का संसदीय नेतृत्व जल्द ही अपने उम्मीदवार को लेकर फैसला करेगा।

फिलहाल स्थिति स्पष्ट नहीं है और अगले मुख्यमंत्री को लेकर कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है।

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