tawang to zemithang journey vlog
दोस्तों, कैसे हैं आप सभी? इस आर्टिकल में हम आपको बताएंगे Tawang से Zemithang गांव के बारे में, Zemithang India-China border पर बसा एक छोटा और खूबसूरत गांव है. Tawang से दो रास्ते आपको इस गांव तक लेकर जाते हैं… एक के लिए आपको लगभग 70 किलोमीटर की दूरी तय करनी होती है और दूसरी के लिए लगभग 100 किलोमीटर…
हमने शॉर्टकट वाला रास्ता चुना… इस रास्ते पर आपको Sangetsar Lake, Piti So Lake, Taktsang Gompal, Arunachal की सबसे ऊंचाई वाली जगह पर स्थित बेकरी (Arunachal Highest Bakery), तीसरी उदासी गुरुद्वारा (Gurudwara Teesri Udasi)… और रास्ते में कमाल के Waterfalls पड़ते हैं… कई बार ये रास्ता आपको मानो यूरोप जैसा अहसास करा देता है और हां, ये यात्रा हमने की तवांग से किराए पर ली हुई स्कूटी से जिसे हमने 900 प्रति दिन के हिसाब से लिया था हालांकि मैंने इसी स्कूटी से लगभग 300 किलोमीटर की यात्रा की लेकिन मैं फिर भी आपको रिकमेंड नहीं करूंगा कि आप ऐसा करें…
Zemithang तक के पास आपको इस रास्ते पर कोई नहीं मिलेगा और हां Zemithang से 30 किलोमीटर पहले से ये रास्ते हेयरपिन बैंड में बदल जाता है और वहां से शुरू होता है असली चैलेंज…
इस आर्टिकल में हम आपको बताएंगे Zemithang की यात्रा के बारे में विस्तार से…. हमने तवांग से Zemithang की यात्रा कैसे की… Zemithang तक की यात्रा में हमारा खर्चा कितना हुआ और कितना फ्यूल लगा हमारी स्कूटी को चलाने में…? Zemithang पहुंचने में हमें क्या क्या मुश्किलें झेलनी पड़ी… इस यात्रा में अच्छा क्या क्या हुआ और क्या ऐसा हुआ जिसकी हमें उम्मीद बिल्कुल नहीं थी…
Tawang से 10 किलोमीटर ही आगे बढ़े थे कि रास्ते में दिखाई दी एक खूबसूरत लेक. इस झील का कोई नाम तो नहीं दिया था… लेकिन कोयला फिल्म के तनहाई तनहाई गाने में Nuranang Waterfall और Sangetsar Lake के साथ इस लेक को भी दिखाया गया है…
इस झील के बाद हमारा अगला पड़ाव था लामा शबजे… क्या आप जानते हैं तवांग की पहाड़ियों के बीच एक ऐसा पवित्र स्थान भी है, जहाँ छठे दलाई लामा, ग्यालवा त्संगयांग ग्यात्सो (Gyalwa Tsangyang Gyatso) ने तिब्बत की यात्रा के दौरान अपने चरणों के निशान छोड़े थे। इस स्थान को लामा शबजे (Lama Shabjey) के नाम से जाना जाता है।
कहा जाता है कि जब छठे दलाई लामा तिब्बत की ओर जा रहे थे, तब उन्होंने यहां विश्राम किया और उनके पवित्र पदचिह्न इस धरती पर अंकित हो गए। यही कारण है कि आज यह स्थान लाखों बौद्ध श्रद्धालुओं और विशेष रूप से मोनपा समुदाय के लिए गहरी आस्था का केंद्र माना जाता है।
दिलचस्प बात यह है कि छठे दलाई लामा का जन्म भी तवांग के पास स्थित उर्गेलिंग गांव में हुआ था…
अब हम आ गए थे तवांग से 15 किलोमीटर दूर… और यहां हमें दिखाई दी पीटी त्सो लेक… Tawang की वादियों में ये एक ऐसी झील भी है, जो हर मौसम में अपना अलग रूप दिखाती है… P.T. Tso Lake को पंगकांग तेंग त्सो (Pankang Teng Tso) या पेंगा तेंग त्सो (Penga Teng Tso) के नाम से भी जाना जाता है…
बुमला पास या संगेत्सर (माधुरी) लेक जाने वाले अधिकांश पर्यटक यहां कुछ देर रुककर इसकी खूबसूरती का आनंद जरूर लेते हैं… चारों ओर बर्फ से ढके पहाड़, देवदार और रोडोडेंड्रोन के जंगल, और बिल्कुल शांत नीला पानी—यह नज़ारा किसी पोस्टकार्ड जैसा लगता है… गर्मियों में झील के आसपास रंग-बिरंगे फूल खिल उठते हैं, जबकि सर्दियों में पूरी झील बर्फ की मोटी चादर ओढ़ लेती है…
Tawang में 100 से ज्यादा नैचरल लेक्स हैं, लेकिन P.T. Tso अपनी नैचरल ब्यूटी के कारण सबसे लोकप्रिय झीलों में गिनी जाती है…
झील से आगे बढ़े तो ऐसा लगा कि मानों कोई रास्ते पर था ही नहीं… शायद हम थोड़ा पहले निकल गए थे इसलिए हमें कोई टूरिस्ट व्हीकल नहीं दिख रहा था…
यहीं से कुछ आगे है Gribtsang Tso (Nagula Lake) … और वहां से वाई जंक्शन की दूरी है तीन किलोमीटर… वाई जंक्शन से ही एक रास्ता बुमला पास के लिए निकलता है… अगर आप बुमला पास जाना चाहते हैं तो उसके लिए आपको एडवांस में परमिट लेना होता है…
दोस्तों, इस गुरुद्वारे से आगे आर्मी के जवान मिले… उनसे पूछा तो उन्होंने बताया कि ये रास्ता आगे बहुत परेशान कर देगा… आगे कई किलोमीटर रास्ता खराब और बुरी हालत में है… उन्होंने हमें दूसरे रास्ते के बारे में बताया जो लगभग 100 किलोमीटर का है लेकिन आसान है… हालांकि अब 30 किलोमीटर आगे आ जाने के बाद पीछे जाने का सवाल ही नहीं था… आर्मी के जवानों से मुलाकात के बाद हमें कुछ ही दूर दिखाई दी अरुणाचल में सबसे ऊंचाई वाली जगह पर स्थित बेकरी…
सुबह सुबह Tawang से जल्दी निकल गए थे इसलिए बैग में रखे बिस्किट से कुछ देर काम चलता रहा… लेकिन अरुणाचल में सबसे ऊंचाई वाली जगह पर बनी बेकरी देखकर भूख और बढ़ गई… इस बेकरी को ऑपरेट आर्मी करती है… यहां बाहर और अंदर का ऐंबियंस आपको रुकने पर मजबूर कर देगा… तवांग की ठंडी वादियों में, समुद्र तल से लगभग 10,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित Arunachal की Highest Bakery सिर्फ एक बेकरी नहीं, बल्कि यात्रियों के लिए एक यादगार ठिकाना है। यहां गर्मागर्म कॉफी की चुस्की, ताज़ा बेक किए गए केक और हिमालय के शानदार नज़ारे—तीनों का अनोखा संगम देखने को मिलता है।
Tawang घूमने आने वाले अधिकांश पर्यटक यहां रुककर कॉफी, पेस्ट्री, ब्राउनी, पिज़्ज़ा, सैंडविच का मजा लेते हैं। ठंडी हवाओं के बीच ओवन से निकलती ताज़ा बेकरी की खुशबू इस जगह को और भी खास बना देती है…
इस बेकरी की सबसे बड़ी खासियत इसकी लोकेशन है… यहां बैठकर दूर-दूर तक फैली Tawang की पहाड़ियां, रंग-बिरंगे प्रेयर फ्लैग्स और शांत वातावरण ऐसा अनुभव कराते हैं, जिसे शब्दों में बयां करना मुश्किल है। यही वजह है कि यह जगह सिर्फ खाने-पीने के लिए नहीं, बल्कि कुछ पल सुकून से बिताने के लिए भी मशहूर है।
अगर आप Tawang की यात्रा पर हैं, तो Arunachal’s Highest Bakery में एक कप गर्म कॉफी और ताज़ा बेक किया हुआ केक जरूर आज़माइए। हिमालय की ठंडी फिज़ा में यह छोटा-सा स्वाद आपकी यात्रा की सबसे मीठी यादों में शामिल हो सकता है…इस बेकरी से संगेत्सर लेक की दूरी साढ़े सात किलोमीटर है…हमें जैसे ही दूर से संगेत्सर लेक का पानी दिखाई दिया.. आधी थकान दूर हो गई थी… एक ब्रिज के नीचे से संगेत्सर लेक से पहले ही Waterfall बैह रहा था… कुछ देर यहां रुककर फोटो खिंचवाई…
क्या आपने कभी ऐसी झील देखी है, जिसके पानी के बीच आज भी सूखे पेड़ों के तने खड़े हों? तवांग की संगेत्सर लेक (Sangetsar Lake), जिसे दुनिया माधुरी लेक (Madhuri Lake) के नाम से भी जानती है, ऐसी ही एक अनोखी और रहस्यमयी झील है।
Tawang शहर से लगभग 35–40 किलोमीटर दूर और समुद्र तल से करीब 3,700 मीटर (12,100 फीट) की ऊंचाई पर स्थित यह झील प्राकृतिक रूप से नहीं बनी थी। साल 1950 में आए एक भीषण भूकंप के कारण पहाड़ का एक हिस्सा खिसक गया, जिससे एक घाटी का जलस्रोत अवरुद्ध हो गया और देखते ही देखते यहां एक विशाल झील बन गई। उस समय जो पेड़ यहां मौजूद थे, वे पानी में डूब गए और आज भी उनके सूखे तने झील के बीच खड़े दिखाई देते हैं। यही दृश्य इस झील को दुनिया की सबसे अनोखी झीलों में शामिल करता है।
इस झील को “माधुरी लेक” नाम 1997 में रिलीज़ हुई फिल्म कोयला की शूटिंग के बाद मिला। फिल्म के एक गीत की शूटिंग यहां अभिनेत्री माधुरी दीक्षित पर फिल्माई गई थी। इसके बाद पर्यटक इस झील को प्यार से माधुरी लेक कहने लगे, हालांकि इसका आधिकारिक नाम आज भी संगेत्सर लेक ही है।
झील के चारों ओर बर्फ से ढके पहाड़, रंग-बिरंगे प्रेयर फ्लैग्स और शांत वातावरण इसे एक अद्भुत आध्यात्मिक और प्राकृतिक अनुभव बनाते हैं। सर्दियों में जब आसपास का इलाका बर्फ से ढक जाता है, तो इसकी खूबसूरती कई गुना बढ़ जाती है
यहां इस जगह होने वाले फूल और वनस्पतियों की जानकारी दी हुई है… आप इनके बारे में जानकर और यहां आकर एक नई ताजगी का अनुभव करेंगे…
संगेत्सर लेक पर हम लगभग डेढ़ घंटा रुके… यहां के बाद हम जैसे ही आगे बढ़े, मानो एक नई दुनिया शुरू हो गई थी… अब तक रास्ते में संगेत्सर लेक घूमने वाले टूरिस्ट्स की गाड़ियां हमें दिखी थी लेकिन यहां के बाद रास्ते पर सिर्फ हम ही थे… संगेत्सर लेक के बाद जो एक अहम जगह आई, वो थी ताक्तसंग गोम्पा…
संगेत्सर लेक से आगे बढ़ते ही पहाड़ों के बीच एक शांत और बेहद पवित्र स्थान आता है—ताक्तसंग गोम्पा (Taktsang Gompa)… समुद्र तल से लगभग 3300 मीटर की ऊंचाई पर स्थित ये प्राचीन बौद्ध मठ तवांग क्षेत्र के सबसे महत्वपूर्ण आध्यात्मिक स्थलों में से एक माना जाता है…
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार 8वीं शताब्दी में गुरु पद्मसंभव (गुरु रिनपोछे) ने यहां ध्यान और साधना की थी… कहा जाता है कि वे बाघिन (Tigress) की पीठ पर सवार होकर इस स्थान पर पहुंचे थे… इसी वजह से इसका नाम ताक्तसंग पड़ा, जिसका अर्थ है बाघ का बसेरा…
ये स्थल चट्टानों के अंदर ऊंचाई पर है और अक्सर सभी लोग वहां नहीं जा सकते हैं इसलिए रास्ते पर ही एक गोम्पा है, आप इस गोम्पा को भी विजिट कर सकते हैं…
संगेत्सर लेक से आगे 5 किलोमीटर बाद यही गोम्पा रास्ते में पड़ता है… ऊंचे पहाड़, रंग-बिरंगे प्रेयर फ्लैग्स और चारों ओर पसरी गहरी शांति इस जगह को बेहद खास बना देते हैं… यहां पहुंचकर ऐसा महसूस होता है जैसे आप दुनिया की भागदौड़ से बहुत दूर किसी आध्यात्मिक संसार में आ गए हों…
इसके बाद खूबसूरती को आंखों में समेटते हुए हम बढ़ते रहे… हमारा साथ दे रही थी हमारी स्कूटी… कई जगह तो स्थानीय लोग हमें ऐसे देख रहे थे मानों इस रास्ते पर पहली बार कोई टूरिस्ट गुजर रहा हो…
रास्ते में एक शांत सड़क पर जब वॉटरफॉल देखा तो खुद ब खुद वहां रुक गए…
इसके बाद हम एक जगह और रुके जहां पहाड़ों का नज़ारा बदला बदला सा था…
दोस्तों, आज तक किसी भी यात्रा में मैंने दूर तक फैली पहाड़ों की चोटियां इस तरह नहीं देखी थी, जैसे जिमिथांग के रास्ते में देखीं… हमें इसी रास्ते में एक जगह बंकर जैसे स्ट्रक्चर्स दिखाई दिए…
अगर आप Tawang की यात्रा पर हैं, तो रास्ते में आपको बड़े-बड़े बालों वाला एक विशाल जानवर जरूर दिखाई देगा। यह है याक, जिसे हिमालय का “Ship of the Mountains” यानी पहाड़ों का जहाज़ भी कहा जाता है।
याक लगभग 3,000 से 6,000 मीटर की ऊंचाई वाले बर्फीले इलाकों में आसानी से रह सकता है। इसके लंबे और घने बाल, मजबूत शरीर और बड़े फेफड़े इसे बेहद कम तापमान और ऑक्सीजन की कमी वाले वातावरण में भी जीवित रहने में मदद करते हैं। जहां इंसानों को सांस लेने में परेशानी होती है, वहीं याक आराम से पहाड़ों पर चल-फिर सकता है।
अरुणाचल प्रदेश के मोनपा समुदाय के जीवन में याक का विशेष महत्व है। यह सिर्फ एक पशु नहीं, बल्कि उनकी आजीविका का आधार है। याक के दूध से मक्खन, पनीर और पारंपरिक बटर टी बनाई जाती है। इसके ऊन से गर्म कपड़े और कंबल तैयार किए जाते हैं, जबकि पहाड़ी रास्तों पर सामान ढोने के लिए भी याक का उपयोग किया जाता है।
Tawang आने वाले पर्यटकों के लिए याक आकर्षण का केंद्र होता है। कई स्थानों पर आप पारंपरिक सजावट किए हुए याक के साथ तस्वीरें खिंचवा सकते हैं और स्थानीय संस्कृति को करीब से महसूस कर सकते हैं।
हम आगे एक और जगह रुके ही थी कि तभी घंटों से बंद मोबाइल में एक मैसेज आया… चेक किया तो ये भूटान में एंट्री का Welcome SMS था… एक बार तो सकपका गए… दाएं बाएं देखा… कुछ समझ में आता इससे पहले नेटवर्क तुरंत ही गायब हो गया… हम जिस जगह थे, उससे कई किलोमीटर आगे बाईं ओर भूटान का इलाका था… और दाहिनी ओर था एलएसी… यानी भारत चीन की सीमा…
यहां आगे हमें बिजली के लिए लगाए गए खंबे नज़र आए… तब समझ आया कि गवर्नमेंट के लिए बॉर्डर एरिया में बेसिक एमेनिटीज़ पहुंचाना कितना मुश्किल रैहता होगा.. और यहां स्थानीय लोग किन हालातों में अपना गुजर बसर करते होंगे…
दोस्तों, रास्ते में अब वो जगह आई जिसने हमारी हालत खराब कर दी… नक्शे पर आप जिस हेयर पिन बैंड्स वाले रास्ते को देख रहे हैं वो लगभग 20 किलोमीटर का था और यहां रास्ते पर गिरी हुई चट्टानें, पेड़ और बजरी से हमारा सामना हुआ… इस रास्ते पर कोई दूसरी वहीकल तो क्या कोई इंसान भी नहीं दिखाई दिया… अगर किसी की गाड़ी यहां खराब हुई तो यात्रा राम भरोसे समझिए… यहां पर हमें आर्मी जवान की बात याद आई जिन्होंने कहा था कि आगे रास्ते बेहद खराब है… इसलिए हम वापसी में लुमला होकर आए… और वहां का रास्ता बेहद स्मूद है, रास्ते भर में गांव, मार्केट्स मिलते हैं.. हालांकि वहां से तवांग की कुल दूरी 100 किलोमीटर हो जाती है..
कैसा है Zemithang गांव?
इस डरा देने और थका देने वाली यात्रा के बाद हम पहुंचे जिमिथांग…
अरुणाचल प्रदेश के सबसे शांत और खूबसूरत सीमावर्ती गांवों में से एक है—जिमिथांग (Zemithang)। तवांग से लगभग 100 किलोमीटर दूर ये छोटा-सा गांव न्यामजंग चू (Nyamjang Chu) नदी के किनारे बसा है। चारों ओर ऊंचे पहाड़, घने जंगल और कल-कल बहती नदी इस जगह को किसी पोस्टकार्ड जैसा खूबसूरत बना देते हैं।
लेकिन जिमिथांग सिर्फ अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए ही नहीं, बल्कि अपने ऐतिहासिक और आध्यात्मिक महत्व के लिए भी जाना जाता है। साल 1959 में जब 14वें दलाई लामा तिब्बत से भारत आए थे, तो उन्होंने सबसे पहले भारतीय सीमा में इसी क्षेत्र से प्रवेश किया था। आज भी उस ऐतिहासिक यात्रा की यादें यहां जीवंत हैं और इसी कारण यह स्थान बौद्ध श्रद्धालुओं के लिए विशेष महत्व रखता है।
न्यामजंग चू नदी, जो तिब्बत से निकलकर तवांग घाटी में बहती है, जिमिथांग की जीवनरेखा मानी जाती है। इसके किनारे बसे खेत, पारंपरिक मोनपा घर और शांत वातावरण इस गांव को भीड़-भाड़ से दूर एक अनोखी पहचान देते हैं।
जिमिथांग में आपको गोर्सम चोर्टेन (Gorsam Chorten) जैसे ऐतिहासिक बौद्ध स्मारक भी देखने को मिलते हैं, जिसे अरुणाचल प्रदेश के सबसे बड़े चोर्टेनों में गिना जाता है। हर वर्ष यहां आयोजित गोर्सम कोरा उत्सव में भारत, भूटान और तिब्बत की सांस्कृतिक विरासत की झलक देखने को मिलती है।
अगले वीडियो में हम आपको दिखाएं जिमिथांग की खूबसूरती और वहां की अनोखी परंपराएं… और आपको लेकर चलेंगे Khinzemane जहां दलाई लामा ने अपनी छड़ी गाड़ी थी और वही छड़ी आज एक वृक्ष का रूप ले चुकी है…
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