Ghaziabad History and Facts
Ghaziabad History and Facts : गाज़ियाबाद की कहानी शुरू होती है दिल्ली की दहलीज़ पर बसे उस शहर से, जिसने समय के हर दौर को अपने भीतर समेटा है। यह शहर 1857 की क्रांति की गूंज भी सुन चुका है और स्वतंत्र भारत की औद्योगिक धड़कन भी बन चुका है। गंगा-यमुना के दोआब में बसा गाज़ियाबाद इतिहास, संघर्ष, उद्योग, शिक्षा और आधुनिक विकास की परतों से होकर गुज़रा है। लेकिन आज सवाल यह है कि यह शहर अपनी पहचान कहाँ ढूँढ रहा है—अतीत की विरासत में या भविष्य की चमकती संभावनाओं में? यही खोज हमारी इस यात्रा का आधार बनेगी…
लोनी क्षेत्र और आसपास की धरती गाज़ियाबाद की मूल पहचान से जुड़ी धरती है. ये वो पट्टी है जहां हजारों वर्ष पहले भी मानव बस्तियां और सभ्यता थी. मोहन नगर के पास हिंदन नदी के किनारे केसेरी टीलों (Kaseri mound) में खुदाई से पता चला है कि यहाँ 2500 ई.पू. से सभ्यता विकसित थी. यहां बहने वाली हिंदन नदी गाज़ियाबाद की सबसे पुरानी और प्राकृतिक जीवन रेखा रही है. ये नदी सहारनपुर की शिवालिक पहाड़ियों से निकलती है और लगभग 400 किलोमीटर का सफ़र तय कर नोएडा Sector-150 के पास यमुना नदी से मिल जाती है. सहारनपुर ज़िले से निकलकर ये नदी मुज़फ्फरनगर, मेरठ, बागपत, गाज़ियाबाद और गौतमबुद्ध नगर से गुजरती है.
प्राचीन समय से ही नदी के किनारे गांव, खेती और घाटों का विकास हुआ. महाभारत काल से जुड़ी कई लोक-कथाओं में इस नदी का नाम हरनदी या हरनंदी के रूप में मिलता है. गाजियाबाद के इसी इलाके से होकर गुज़रते, एक प्राचीन सड़क मार्ग ने भी इसे दुनिया के मानचित्र पर स्थापित किया. इस सड़क को आज हम Grand Trunk Road या GT Road के नाम से जानते हैं. इस सड़क ने गाजियाबाद को important trade corridor और रास्ता बनाया. दिल्ली, मेरठ, लाहौर, कोलकाता के बीच आवाजाही इस मार्ग से होती थी. ग़ाज़ियाबाद की पूर्वी सीमा पर स्थित कोट (Kot) नामक गांव का संबंध चौथी सदी में समुद्रगुप्त के बारे में जाने-माने इतिहास से जुड़ा हुआ है. कहा जाता है कि समुद्रगुप्त ने ‘कोट कुलजम’ (Kot Kuljam) को पराजित किया और यहीं पर उन्होंने अश्वमेध यज्ञ किया.
इस भूगोल और इतिहास के बीच गाज़ियाबाद की आध्यात्मिक पहचान को गढ़ा दूधेश्वर नाथ महादेव मंदिर ने, जो शहर के अस्तित्व से भी ज्यादा पुराना है. लोककथाओं के अनुसार यहां स्वयंभू शिवलिंग प्रकट हुआ था और गौ माता प्रतिदिन अपने थन से दूध इस शिवलिंग पर अर्पित करती थीं। इसी कारण इसका नाम पड़ा दूधेश्वर नाथ. गाज़ीउद्दीन बेग ने 1740 ई. में जब गाज़ियाबाद बसाया, उससे पहले ही ये मंदिर लोगों की आस्था का केंद्र था. शहर की बढ़ती आबादी और व्यापारिक पहचान के साथ-साथ ये मंदिर गाज़ियाबाद की धार्मिक और सांस्कृतिक धड़कन बनकर उसकी मूल पहचान को और मजबूत करता रहा.
जिले में डासना क्षेत्र का निर्माण सलारसी (Salarsi) नाम के राजपूत राजा ने किया था, जो महमूद ग़ज़नी के दौर का था. कहा जाता है कि वो कुष्ठ रोग से मुक्ति पाने के लिए गंगा स्नान के लिए आया, इस स्थान को पसंद कर वहाँ बसा और किला बनवाया. डासना नाम का संबंध किले की नींव खोदते समय किसी व्यक्ति के सांप के काटने की घटना से जुड़ा हुआ माना जाता है.
तो दोस्तों लोनी, हिंडन, GT Road और दूधेश्वर नाथ मंदिर के कॉम्बिनेशन ने गाज़ियाबाद शहर की शुरुआती पहचान के तैयार करने में अहम भूमिका निभाई, और इन्हीं की वजह से आज जिले में हम geography, trade और settlement का intersection देख पाते हैं.
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1740 के आसपास, मुग़ल बादशाह मुहम्मद शाह के वज़ीर ग़ाज़ी-उद-दीन (Firoz Jung II) ने दिल्ली के नज्दीक एक व्यवस्थित कस्बे की नींव रखी और उसका नाम अपने नाम पर ग़ाज़ीउद्दीन नगर रखा. ये बस्ती GT Road और हिंडन नदी के बीच strategically developed थी, इसका मकसद था व्यापार, सुरक्षा और प्रशासनिक संतुलन को बनाए रखना.
सरदार ग़ाज़ीउद्दीन ने इस क्षेत्र में कारवां सराय, सराय-ए-ग़ाज़ीउद्दीन और एक मदरसा बनवाया. इस सराय के कारण आसपास की बस्तियों को ग़ाज़ीउद्दीननगर कहा जाने लगा. 19वीं सदी में ब्रिटिश काल के दौरान ये जगह एक कस्बे की तरह विकसित होने लगी. ब्रिटिश अफ़सरों और स्थानीय व्यापारियों को ग़ाज़ीउद्दीननगर नाम लंबा और कठिन लगता था. उन्होंने इसे छोटा और आसान करके गाज़ियाबाद कहना शुरू किया. आबाद शब्द का अर्थ है बसावट या बस्ती, यानी ग़ाज़ी की बसाई हुई जगह.
इस नाम को गढ़ने में रेलवे ने बड़ा योगदान दिया. जब साल 1864 में गाजियाबाद रेलवे स्टेशन बना और Grand Trunk Road का महत्व बढ़ा, तब स्टेशन और नक्शों में जगह का नाम गाज़ियाबाद दर्ज किया गया. धीरे-धीरे सरकारी रिकॉर्ड, नक्शों और दस्तावेज़ों में यही नाम स्थाई हो गया.
गाज़ियाबाद को बाद में गेटवे ऑफ़ यूपी भी कहा जाने लगा क्योंकि ये दिल्ली से प्रवेश करने पर उत्तर प्रदेश का पहला बड़ा शहर है. आज ग़ाज़ीउद्दीननगर नाम सिर्फ इतिहास और कुछ पुराने दस्तावेज़ों में मिलता है, और गाज़ियाबाद नाम ही इस शहर की आधुनिक पहचान बन गया है.
गाजियाबाद शुरुआत में एक क़िलेनुमा सराय थी, जहां, इस जगह से होकर गुजरने वाले मुसाफिर ठहरते थे. इस सराय को सुरक्षा और नियंत्रण के लिए चारों दिशाओं में दरवाजों (गेट्स) से घेरा गया था.
शहर की पहली योजना में चार मुख्य गेट शामिल थे, डासना गेट, सिहानी गेट, दिल्ली गेट और नया गेट. ये दरवाजे रात में बंद कर दिए जाते थे. इन दरवाजों में से दिल्ली या नया गेट में से एक का नाम बदलकर उसे जवाहर गेट कर दिया गया. आज़ के समय सिर्फ दो दरवाजों का ही अस्तित्व बचा हुआ है.
1857 के First War of Independence यानी Sepoy Mutiny के दौरान, हिंडन नदी ने एक अहम भूमिका निभाई. मेरठ में विद्रोह भड़कने के बाद सैनिकों की टुकड़ी दिल्ली की तरफ बढ़ने लगे, लेकिन हिंडन नदी का पार होना उपलब्ध मार्ग नहीं था—यहां पुल, घाट और नदी-किनारे रणनीतिक बाधाएं थीं।
दोनों पक्षों—ब्रिटिश और भारतीय सैनिकों—के बीच कई लड़ाईयां हुए। ये लड़ाइयाँ छोटी लग सकती हैं लेकिन इनका असर दिल्ली पर बहुत हुआ. यहां दो बड़े युद्ध हुए थे, जिन्हें ही आम तौर पर Battle of Hindon कहा जाता है.
1857 का विद्रोह मेरठ में 10 मई को शुरू हुआ था. मेरठ से निकले बाग़ी सिपाही दिल्ली की ओर बढ़े और बहादुर शाह ज़फ़र को बादशाह घोषित किया. अंग्रेज़ों ने इस रास्ते पर (दिल्ली पहुँचने से पहले) ग़ाज़ियाबाद के पास हिंडन नदी पर बागियों को रोकने की योजना बनाई. पहला युद्ध – 30 मई 1857 को हुआ. हिंडन नदी के पुल पर ये युद्ध हुआ. दूसरा युद्ध – 31 मई 1857 को हुआ. लड़ाई बेहद उग्र हुई, कई घंटे चली. अंग्रेज दिल्ली मेरठ मार्ग को बचाने में कामयाब रहे थे. इतिहासकारों के अनुसार, हिंडन युद्ध में 23rd Native Infantry और 60th Rifles के सैनिकों के साथ कुछ अंग्रेज़ अफ़सर भी मारे गए. इनमें से कुछ की कब्र आज हिंडन विहार इलाके में मौजूद है और ASI द्वारा संरक्षित है.
गाज़ियाबाद शहर को बनाने में यहां के गाजियाबाद जंक्शन रेलवे स्टेशन का भी बड़ा योगदान है. आज ये स्टेशन शहर के बस अड्डे, दिल्ली मेट्रो के शहीद स्थल (न्यू बस अड्डा) मेट्रो स्टेशन और RRTS स्टेशन से कनेक्टेड है, लेकिन इस स्टेशन की शुरुआत पहले स्वतंत्रता संग्राम के कुछ ही वर्षों बाद हो चुकी थी.
1866 वो साल है, जब यहां से पहली बार हावड़ा–दिल्ली लाइन पर ट्रेनें चलनी शुरू हुईं थी. इसके बाद 1864 में दिल्ली–मेरठ लाइन और 1870 में अमृतसर–अंबाला–सहारनपुर–गाज़ियाबाद लाइन बनी, जिससे आज के पाकिस्तान के मुल्तान से दिल्ली तक रेल संपर्क स्थापित हुआ था. साल 1900 में गाज़ियाबाद–मुरादाबाद लाइन भी शुरू हुई। धीरे-धीरे ये स्टेशन दिल्ली और उत्तर भारत के बीच रेल यातायात का एक प्रमुख केंद्र बन गया.
1970 के बाद इस स्टेशन की ज्यादातर लाइनों का विद्युतीकरण हुआ. Britishers के लिए strategic control और fast troop movement ज़रूरी था. Trade और revenue के लिए मध्यम से लेकर भारी माल—अनाज, कपास, गुड़ आदि का सुरक्षित और तेज़ transportation चाहिए था. Civil administration को दिल्ली से दूर उत्तर-पश्चिमी और पूर्वी भारत पर control बनाए रखना था. इसीलिए रेलवे को अंग्रेजों ने तेजी से डैवलप किया और इस स्टेशन को भी तैयार किया.
गाज़ियाबाद के उद्योगों की जड़ें ब्रिटिश काल से जुड़ी हैं। 1857 की क्रांति के बाद अंग्रेजों ने इस क्षेत्र को एक कैन्टोनमेंट और वाणिज्यिक ज़ोन के रूप में विकसित किया।
1855 में, ब्रिटिश व्यापारी एडवर्ड डायर (Edward Dyer) ने कसौली (हिमाचल प्रदेश) में ब्रेवरी की स्थापना की थी. बाद में इसका विस्तार गाज़ियाबाद क्षेत्र तक हुआ.
एडवर्ड डायर वही व्यक्ति थे जो कुख्यात जनरल रेगिनाल्ड एडवर्ड हैरी डायर (Reginald Edward Harry Dyer) के पिता थे। यह जनरल वही था जिसने 1919 में अमृतसर के जलियांवाला बाग नरसंहार में सैकड़ों निर्दोष भारतीयों पर गोलियां चलवाई थीं।
इस वजह से “डायर” नाम भारत में नफ़रत और उपनिवेशवाद के प्रतीक के रूप में देखा जाने लगा।
आज़ादी के बाद 1949 में, भारतीय उद्योगपति सर नरेंद्र नाथ मोहन ने इस कंपनी को अधिग्रहित किया। इसके बाद कंपनी का नाम बदलकर मोहन मीकिन ब्रेवरीज़ लिमिटेड (Mohan Meakin Breweries Ltd.) रखा गया। अब ये सिर्फ शराब तक सीमित नहीं रही, बल्कि बिस्किट, जूस, पेय पदार्थ, और इंजीनियरिंग से जुड़ी कई इकाइयों तक विस्तार हुआ.
इस तरह, जिस कंपनी की शुरुआत ब्रिटिश उपनिवेशवाद की छाया में डायर परिवार ने की थी, आज़ादी के बाद उसी कंपनी को नरेंद्र नाथ मोहन ने भारतीय पहचान दी और यह स्वतंत्र भारत के औद्योगिक विकास का हिस्सा बन गई. मोहन नगर में आज भी मौजूद इस कंपनी के सामने मोहन नगर मंदिर भी है. जिले का शायद ही कोई शख्स हो जिसके यादों में ये मंदिर न हो.
1947 में स्वतंत्रता मिलने के बाद गाज़ियाबाद तेज़ी से औद्योगिक विकास की ओर बढ़ा। कई बड़ी कंपनियाँ यहाँ आईं और Industrial Belt) बनी.
मोदी ग्रुप (Modinagar) ने आज़ादी के बाद इस ग्रुप ने कपड़ा उद्योग, चीनी मिल, टायर फैक्ट्री और शैक्षिक संस्थान स्थापित किए।
स्टील और इंजीनियरिंग गुड्स उद्योग – 1950–60 के दशक में गाज़ियाबाद का नाम स्टील, गियर्स, शाफ्ट्स और ट्यूब्स बनाने वाले उद्योगों से जुड़ गया.
फार्मा उद्योग – 1970 के दशक में यहाँ फार्मास्यूटिकल्स और मेडिकल उपकरणों का उत्पादन बढ़ने लगा।
ऑटोमोबाइल और स्पेयर पार्ट्स उद्योग – 1980–90 के दशक में गाज़ियाबाद दिल्ली-एनसीआर की सबसे बड़ी ऑटोमोबाइल कंपोनेंट्स मैन्युफैक्चरिंग हब बन गया।
फ़र्नीचर, फ़ैशन और होम फ़र्निशिंग उद्योग – उदारीकरण के बाद यहाँ घरेलू और निर्यात केंद्रित उद्योगों ने जगह बनाई.
आज गाज़ियाबाद में लगभग 27,000 फैक्ट्रियाँ हैं, जिनमें 1200 लघु, 149 मध्यम और 45 बड़े उद्योग शामिल हैं। यहां के प्रमुख औद्योगिक क्षेत्र हैं मेरठ रोड इंडस्ट्रियल एरिया, बुलंदशहर रोड इंडस्ट्रियल एरिया, डासना इंडस्ट्रियल एरिया, लोनी इंडस्ट्रियल एरिया, मोदीनगर इंडस्ट्रियल बेल्ट, लोहे का मंडी (स्टील मार्केट), साहिबाबाद साइट फोर.
आज सरकारी क्षेत्र की कंपनियां भी यहां हैं जिनमें BEL और CEL जैसे नाम प्रमुख हैं. BEL Radar, Communication Equipment बनाती है, तो CEL Solar PV modules, railway signaling devices.
अब बात करते हैं गाज़ियाबाद के शिक्षा तंत्र की. इसकी कहानी उतनी ही रोचक है जितनी इसकी औद्योगिक यात्रा। 1975 में जिला बनने से पहले तक यहाँ शिक्षा का ढांचा मुख्यतः प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों तक सीमित था। उस दौर में एस.डी. इंटर कॉलेज, एन.आर. इंटर कॉलेज जैसे कुछ पुराने संस्थान ही कस्बे की शैक्षिक ज़रूरतों को पूरा करते थे, जबकि उच्च शिक्षा के इच्छुक छात्रों को मेरठ या दिल्ली विश्वविद्यालय की ओर रुख करना पड़ता था। लेकिन 1975 में ज़िले का दर्जा मिलने के बाद प्रशासनिक महत्व बढ़ा और धीरे-धीरे उच्च शिक्षा के लिए कॉलेजों की स्थापना शुरू हुई। मेरठ विश्वविद्यालय से संबद्ध कई डिग्री कॉलेज खुले, जिनमें महिला शिक्षा को बढ़ावा देने वाले संस्थान भी शामिल थे।
सही बदलाव 1990 के दशक में आया, जब भारत में उदारीकरण के बाद तकनीकी और प्रबंधन शिक्षा की माँग तेजी से बढ़ी। इसी दौर में गाज़ियाबाद में आईएमएस, आईटीएस, ए.के.जी.ई.सी., ए.बी.ई.एस. जैसे इंजीनियरिंग और मैनेजमेंट कॉलेज स्थापित हुए। इन संस्थानों ने छात्रों को न सिर्फ़ उच्च शिक्षा दी बल्कि NCR क्षेत्र की इंडस्ट्री और कॉर्पोरेट कंपनियों से सीधा जोड़ा। कैंपस प्लेसमेंट, रिसर्च लैब्स और इंटर्नशिप जैसी व्यवस्थाओं ने गाज़ियाबाद को धीरे-धीरे एक नॉलेज-इकोनॉमी के केंद्र में बदल दिया।
सन् 2000 के बाद से गाज़ियाबाद ने शिक्षा के क्षेत्र में और भी लंबी छलाँग लगाई। आज यहाँ हज़ारों स्कूल और सैकड़ों कॉलेज हैं। डीपीएस, अमिटी, रायन, खेतान जैसे स्कूल आधुनिक शिक्षा का माहौल तैयार कर रहे हैं तो वहीं निजी विश्वविद्यालयों और प्रोफेशनल कॉलेजों ने मेडिकल, डेंटल, लॉ और फार्मेसी जैसे क्षेत्रों में भी विकल्प खोले हैं। इस शिक्षा विस्तार ने गाज़ियाबाद को औद्योगिक शहर से आगे बढ़ाकर एक प्रमुख शैक्षिक नगर बना दिया। यहाँ अब न सिर्फ़ स्थानीय बल्कि देशभर से छात्र पढ़ाई करने आते हैं, और इसके परिणामस्वरूप शहर की अर्थव्यवस्था में भी बड़ा बदलाव आया है—बाज़ार, पुस्तकालय, कोचिंग सेंटर, कैफ़े और जॉब मार्केट सब पर शिक्षा उद्योग का असर दिखाई देता है।
कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि 1975 में जिला बनने के बाद से लेकर आज तक गाज़ियाबाद का शिक्षा ढांचा निरंतर विकसित होता रहा है। पहले यह कस्बाई शिक्षा तक सीमित था, फिर कॉलेजों और महिला शिक्षा ने इसे गति दी, और अंततः 1990 के बाद प्रोफेशनल और तकनीकी शिक्षा ने इसे NCR का एक अहम शिक्षा-हब बना दिया।
गाज़ियाबाद ने बीते दो दशकों में परिवहन और शहरी ढांचे के क्षेत्र में तेज़ी से बदलाव देखा है। दिल्ली मेट्रो की ब्लू लाइन (वैशाली–कौशांबी) और रेड लाइन (शहीद स्थल/न्यू बस अड्डा तक) के विस्तार से शहर को राजधानी से सीधी और तेज़ कनेक्टिविटी मिली, जिसने लाखों यात्रियों की रोज़मर्रा की यात्रा को आसान बना दिया। इसी कड़ी में 2023 में भारत की पहली क्षेत्रीय तेज़ परिवहन प्रणाली (RRTS) का प्राथमिक कॉरिडोर साहिबाबाद से दुहाई तक शुरू हुआ, जिसने गाज़ियाबाद को एक “सुपर-कम्यूटर हब” के रूप में स्थापित कर दिया। यहाँ के स्टेशन—गाज़ियाबाद, गुलहर और दुहाई—अब हाई-स्पीड ट्रेनों के ज़रिए पूरे एनसीआर को जोड़ रहे हैं।
सड़क ढांचे में भी गाज़ियाबाद ने ऐतिहासिक प्रगति की है। दिल्ली–मेरठ एक्सप्रेसवे (NH-9) ने लंबी दूरी और शहर के भीतर की यात्रा को तेज़ और सुगम बना दिया, वहीं 10 किलोमीटर से लंबी हिंडन एलिवेटेड रोड ने राज नगर एक्सटेंशन से दिल्ली बॉर्डर तक का सफ़र बेहद आसान कर दिया। इन बेहतर रास्तों और कनेक्टिविटी ने गाज़ियाबाद में आधुनिक टाउनशिप संस्कृति को जन्म दिया। वेव सिटी, आदित्य वर्ल्ड सिटी, इंदिरापुरम, वैशाली और कौशांबी जैसी नई बस्तियाँ “लिव-वर्क-प्ले” मॉडल पर विकसित हुईं, जहाँ रहना, काम करना और मनोरंजन—सभी सुविधाएँ एक ही ढांचे में उपलब्ध हैं। इस तरह परिवहन और बुनियादी ढांचे की इन पहलों ने गाज़ियाबाद को पारंपरिक औद्योगिक शहर से निकालकर एक आधुनिक शहरी केंद्र में बदल दिया है।
— पुरानी bazaars (Delhi Gate hardware market, vegetable mandi near Jawahar Gate) आज भी local business pulse हैं।
— Swarn Jayanti Park, Hindon City Forest जैसे green lungs urban density में relief प्रदान करते हैं।
— Ghaziabad Municipal Corporation ने city को 5 zones में बांटा—City Zone, Kavi Nagar Zone, Vijay Nagar Zone, Mohan Nagar Zone, Vasundhara Zone—इससे civic services zone-wise organized रहती हैं।
— तीन तहसीलें—Ghaziabad, Modinagar, Loni—administrative structure की पहचान हैं।
गाज़ियाबाद में घूमने-फिरने के कई स्थान हैं, जिन्हें धार्मिक, ऐतिहासिक, प्राकृतिक और आधुनिक आकर्षणों के रूप में देखा जा सकता है।
धार्मिक स्थलों में दूधेश्वर नाथ महादेव मंदिर सबसे प्रसिद्ध है, जो हिंडन नदी के किनारे स्थित है और सावन के महीने तथा महाशिवरात्रि पर यहाँ श्रद्धालुओं की बड़ी भीड़ उमड़ती है। डासना देवी मंदिर भी यहाँ की आस्था का प्रमुख केंद्र है, मोहन नगर का देवी मंदिर भी यहां विशेष आकर्षण का केंद्र हैं.
ऐतिहासिक स्थलों की बात करें तो 1857 की क्रांति में गाज़ियाबाद की अहम भूमिका रही। हिंडन नदी किनारे अंग्रेज़ों और क्रांतिकारियों के बीच हुए युद्ध की यादें आज भी यहाँ की कब्रगाहों और स्मारकों में दर्ज हैं. पुराना गाज़ियाबाद क्षेत्र अपनी संकरी गलियों और पुराने मंदिरों-हवेलियों के लिए जाना जाता है। इसी तरह रामतेराम रोड पर स्थित इस्माइल खान की हवेली गाज़ियाबाद के मुस्लिम जमींदार इतिहास की झलक देती है.
गाज़ियाबाद में दो “स्वर्ण जयंती पार्क” के नाम से पार्क मौजूद हैं। एक बड़ा पार्क राज नगर में है जिसे अक्सर लोग ही प्रमुख मानते हैं, लेकिन दूसरा इंदिरापुरम में भी स्थित है।
इंदिरापुरम का स्वर्ण जयंती पार्क क्षेत्रफल में छोटा है और इसे स्थानीय लोगों के लिए हरित-क्षेत्र और मनोरंजन स्थल के रूप में विकसित किया गया है। यह पार्क इंदिरापुरम की रिहायशी कॉलोनियों के बीच बसा हुआ है और सुबह-शाम टहलने, योग करने तथा बच्चों के खेलने के लिए उपयुक्त स्थान है। यहाँ पर जॉगिंग ट्रैक, बैठने की बेंचें और खुले मैदान हैं जहाँ आसपास के लोग अपनी दिनचर्या में ताज़गी पाने आते हैं। छुट्टियों और संध्याकाल में यहाँ परिवारों की अच्छी-खासी भीड़ रहती है।
जहाँ राज नगर का स्वर्ण जयंती पार्क पूरे शहर के लिए एक बड़ा लैंडमार्क और टूरिस्ट आकर्षण है, वहीं इंदिरापुरम वाला पार्क मुख्य रूप से कॉलोनी के निवासियों और स्थानीय लोगों के लिए “नेबरहुड ग्रीन स्पेस” के रूप में महत्व रखता है।
सिटी फॉरेस्ट (करहैड़ा रोड, हिंडन किनारे) भी एक प्रमुख आकर्षण है जहाँ घने वृक्षों के बीच सैर, साइक्लिंग और बर्ड वॉचिंग का अनुभव लिया जा सकता है।
आधुनिक गाज़ियाबाद में राज नगर एक्सटेंशन, वैशाली, इंदिरापुरम और कौशांबी जैसी नई टाउनशिप हैं। यहाँ हाई-राइज़ अपार्टमेंट्स, मॉल्स, मल्टी-कुज़ीन रेस्टोरेंट्स और कैफे मौजूद हैं। पेसिफिक मॉल, महागुन मेट्रो मॉल और शिप्रा मॉल शॉपिंग और मनोरंजन के लिए लोकप्रिय हैं। इंदिरापुरम आज का नया फूड और नाइटलाइफ़ हब बन चुका है, जहाँ युवा और परिवार समय बिताने आते हैं।
गाज़ियाबाद की कहानी जितनी गौरवशाली अतीत से जुड़ी है, उतनी ही अधूरी इसके वर्तमान में दिखती है। यह शहर कभी औद्योगिक शक्ति और ऐतिहासिक घटनाओं के लिए जाना जाता था, लेकिन समय के साथ यह न तो अपनी विरासत को पूरी तरह सहेज पाया और न ही आधुनिकता की दौड़ में खुद को आगे ले जा सका। जब गुरुग्राम और नोएडा जैसी जगहें अंतरराष्ट्रीय मानचित्र पर अपनी छाप छोड़ रही हैं, तब गाज़ियाबाद योजनाओं और दूरदर्शिता की कमी के कारण पिछड़ता दिखाई देता है। यहाँ के जनप्रतिनिधि और नीतिनिर्माता यदि सच में शहर को उसकी असली पहचान दिलाना चाहते हैं, तो उन्हें अतीत और भविष्य के बीच पुल बनाना होगा। वरना यह शहर सिर्फ दिल्ली की सरहद पर बसा एक ठिकाना बनकर रह जाएगा, जिसकी पहचान हमेशा “हो सकता था” और “होना चाहिए था” जैसे अधूरे वाक्यों में कैद रह जाएगी।
गाज़ियाबाद की इस यात्रा में हमने देखा कि किस तरह यह शहर इतिहास की लड़ाइयों से लेकर औद्योगिक विकास, शिक्षा और आधुनिक ढाँचों तक पहुँचा। लेकिन इस पूरे सफ़र के बावजूद गाज़ियाबाद कहीं न कहीं अपनी असली पहचान तलाश रहा है। गुरुग्राम और नोएडा जैसे पड़ोसी शहर तेज़ी से आधुनिक भारत की तस्वीर बन चुके हैं, जबकि गाज़ियाबाद अब भी अतीत और भविष्य के बीच खड़ा दिखाई देता है। सवाल यही है कि क्या यह शहर अपनी विरासत को सहेजते हुए नए सपनों को आकार दे पाएगा, या फिर यह महज़ दिल्ली के साए में दबकर रह जाएगा। यही प्रश्न हमारे इस वृत्तचित्र का अंतिम पड़ाव है, और आने वाला समय ही इसका उत्तर देगा।
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