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Jagannath Rath Yatra 2022: जगन्नाथ रथ यात्रा का क्या है इतिहास? जानें शुभ मुहूर्त, महत्व भी

Jagannath rath yatra 2022- ओडिशा के जगन्नाथ पुरी में भव्य रथ यात्रा का हर साल आयोजन होता है. भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की रथ यात्रा के लिए देश और विदेश से श्रद्धालु इस दौरान पुरी पहुंचते हैं. कोविड 19 महामारी की वजह से ये यात्रा 2 साल से बंद थी. साल 2022 में इस यात्रा का आयोजन किया गया है. रथ यात्रा से पहले तीनों भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा ( Jagannath, Balabhadra and Subhadra) 15 दिन एकांतवास में रहते हैं. इसके बाद तीनों रथ पर सवार होकर अपनी मौसी के घर गुंडिचा मंदिर (Gundicha Temple) जाते हैं. इस दौरान तीनों अलग अलग रथ पर सवार होते हैं. इस बार रथ यात्रा 1 जुलाई से शुरू हुई है और इसका समापन 12 जुलाई को होगा. आइए जानते हैं कि रथ यात्रा क्यों निकाली जाती है और इसका इतिहास व महत्व क्या है?

रथ यात्रा 2022 तारीख

इस साल जगन्नाथ रथ यात्रा शुक्रवार, 1 जुलाई से शुरू हुई. आषाढ़ शुक्ल द्वितीया तिथि 30 जून को सुबह 10:49 बजे से शुरू होकर 1 जुलाई को दोपहर 01:09 बजे समाप्त हुई.

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इस वर्ष रथ यात्रा कब मनाई जा रही है?

उत्सव आमतौर पर आषाढ़ शुक्ल पक्ष द्वितीया (आषाढ़ के महीने में अमावस्या के बाद दूसरे दिन) पर मनाया जाता है.

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ओडिशा में रथ यात्रा उत्सव के समान, भारत और बांग्लादेश के अन्य हिस्सों में भी रथ यात्रा उत्सव आयोजित किए जाते हैं. हालांकि, पुरी में उत्सव के दौरान सबसे विहंगम दृश्य दिखाई देता है..

इतिहास और महत्व

ऐसा माना जाता है कि यह वर्ष का एकमात्र अवसर है जब ब्रह्मांड के स्वामी भगवान जगन्नाथ अपने भक्तों के लिए मंदिर से बाहर आते हैं. किंवदंती के अनुसार, इंद्रद्युम्न नाम के एक राजा मालवा प्रदेश में राज करते थे. एक दिन राजा को सपने में भगवान जगन्नाथ ने दर्शन दिया और कहा कि भगवान की मूर्ति की स्थापना करो. राजा ने इसके बाद कड़ी तपस्या की और फिर भगवान विष्णु ने उन्हें बताया कि वह पुरी के तट पर जायें, वहां उन्हें लकड़ी का लठ्ठा मिलेगा. उसी लकड़ी से वह मूर्ति निर्मित कराएं.

राजा ने ऐसा ही किया और उन्हें तट पर लकड़ी का लठ्ठा भी मिल गया. तब उनके सामने विष्णु और विश्वकर्मा, बढ़ई कारीगर और मूर्तिकार के रूप में अवतरित हुए. उन्होंने यह शर्त रखी, कि वे एक महीने में मूर्ति तैयार कर देंगे लेकिन तब तक वे एक कमरे में बंद रहेंगे और राजा या कोई दूसरा शख्स कमरे में नहीं आएगा.

जब कई दिनों तक कोई भी आवाज नहीं आयी, तो जिज्ञासावश राजा ने कमरे में झांकने की कोशिश की… इसी क्षण वह वृद्ध कारीगर बाहर आ गया और राजा से कहा कि अभी मूर्तियों के हाथ नहीं बने हैं. राजा के अफसोस जताने पर मूर्तिकार ने बताया कि यह सब ईश्वर की इच्छा से हुआ है. अब मूर्तियों को इसी रूप में स्थापित किया जाएगा और इसी रूप में उनकी पूजा की जाएगी. तब वही तीनों मूर्तियां जो कि भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की थीं, स्थापित की गईं.

हर साल, रथ यात्रा के दौरान, भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा मुख्य मंदिर में अपना नियमित निवास छोड़ देते हैं और गुंडिचा मंदिर जाते हैं, जो जगन्नाथ मंदिर से लगभग 3 किमी दूर है. फिर, वे वहां आठ दिन तक रहते हैं. यह भी माना जाता है कि रथ यात्रा के चौथे दिन भगवान जगन्नाथ की पत्नी देवी लक्ष्मी भगवान की तलाश में गुंडिचा मंदिर आती हैं.

आठ दिनों तक गुंडिचा मंदिर में रहने के बाद, देवता नौवें दिन अपने घर वापसी की यात्रा करते हैं, जिसे बहुदा यात्रा के रूप में जाना जाता है. यह दिन आषाढ़ मास की शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाता है.

रथ यात्रा की रस्म

रथ यात्रा से पहले, भगवान जगन्नाथ के भक्तों द्वारा उनके सुखद प्रवास के लिए गुंडिचा मंदिर की सफाई की जाती है. यात्रा के दिन, भगवान जगन्नाथ, उनके भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के लिए तीन अलग-अलग रथ तैयार किए जाते हैं. तीनों के रथों को गंतव्य तक पहुंचाने के लिए भारी भीड़ इसे खींचती है.

भगवान जगन्नाथ के रथ को नंदीघोष, भगवान बलभद्र के रथ को तलध्वज और देवी सुभद्रा के रथ को दर्पदलन कहा जाता है.रथ यात्रा के दिन सेवकों द्वारा देवताओं को रथों पर ले जाया जाता है, जिसे एक पारंपरिक जुलूस के रूप में जाना जाता है, जिसे पहाड़ी बीजे कहा जाता है.

इसके बाद पुरी के राजा, जो गजपति के नाम से जाने जाते हैं और भगवान जगन्नाथ के पहले सेवक हैं, रथों को शुद्ध करते हैं. इसे छेरा पहाड़ कहा जाता है, जिसके दौरान रथों की सफाई की जाती है. इस अनुष्ठान के बाद भक्तों द्वारा रथों को गुंडिचा मंदिर की ओर खींचा जाता है.

पुरी में रथ यात्रा 2022

पुरी में जगन्नाथ रथ यात्रा आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को मनाई जाती है.भगवान जगन्नाथ श्रीहरि को भगवान विष्णु के मुख्य अवतारों में से एक माना जाता है, और पुरी में रथ यात्रा सद्भाव, एकता और भाईचारे का प्रतीक है.

हर साल हजारों श्रद्धालु, तीर्थयात्री और पर्यटक रथ यात्रा में भाग लेने और रथ खींचकर अपने सौभाग्य को बढ़ाने के लिए ओडिशा के पुरी आते हैं. यह भी माना जाता है कि जो लोग रथ यात्रा में शामिल होते हैं उन्हें हर तरह की सुख-समृद्धि मिलती है. इस साल 1 जुलाई 2022 को भगवान जगन्नाथ की भव्य रथ यात्रा निकाली गई.

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