Sindoor Khela:मां दुर्गा की विदाई पर क्यों खेलती हैं महिलाएं सिंदूर?
Sindoor Khela : दुर्गा पूजा का उत्सव पश्चिम बंगाल सहित पूरे देश में धूमधाम से मनाया जाता है। इस पर्व की खास परंपराओं में सिंदूर खेला (Sindoor Khela) का विशेष महत्व है। विजयादशमी के दिन मां दुर्गा की विदाई से पहले विवाहित महिलाएं उन्हें सिंदूर अर्पित करती हैं और फिर एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर सुख, सौभाग्य और खुशहाली की कामना करती हैं।
क्या है सिंदूर खेला की परंपरा || What is the tradition of sindoor khela?
सिंदूर खेला मुख्य रूप से पश्चिम बंगाल की दुर्गा पूजा से जुड़ी परंपरा है। इस दिन महिलाएं लाल और सफेद साड़ी पहनकर पूजा पंडालों में एकत्र होती हैं। सबसे पहले मां दुर्गा के माथे और चरणों में सिंदूर चढ़ाया जाता है। इसके बाद महिलाएं एक-दूसरे को सिंदूर लगाती हैं और मिठाई खिलाकर शुभकामनाएं देती हैं। ढाक की थाप और शंखनाद के बीच यह रस्म उत्सव के साथ भावुक विदाई का माहौल भी बनाती है।
मां दुर्गा की विदाई पर क्यों खेला जाता है सिंदूर || Why is sindoor played with during the farewell of Goddess Durga?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां दुर्गा दुर्गा पूजा के दौरान बेटी की तरह अपने मायके आती हैं और विजयादशमी पर अपने ससुराल यानी कैलाश लौटती हैं। जिस तरह बेटी की विदाई के समय उसे शुभकामनाएं दी जाती हैं, उसी भाव से महिलाएं मां दुर्गा को सिंदूर अर्पित कर उनकी विदाई करती हैं और सुख-समृद्धि की प्रार्थना करती हैं।
सिंदूर खेला का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व || The religious and cultural significance of Sindoor Khela
सिंदूर को सुहाग, सौभाग्य और मंगल का प्रतीक माना जाता है। यह परंपरा महिलाओं के बीच प्रेम, अपनापन और एकजुटता का संदेश भी देती है। एक-दूसरे को सिंदूर लगाना खुशियां साझा करने और रिश्तों को मजबूत बनाने का प्रतीक है। इस तरह सिंदूर खेला मां दुर्गा की विदाई के साथ दुर्गा पूजा के समापन को भी दर्शाता है।

