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Singapore Diary – 9 : क्रूज के सफर ने ‘टाइटैनिक’ की याद दिला दी

Singapore Cruise Tour Holiday : क्रूज पर जाते ही हवाई ज़हाज़ की तरह क्रूज के अधिकारिओं ने सभी का अभिवादन किया और हमें रूम तक जाने के लिए निर्देशित किया। क्रूज पर कुल 12 डेक (फ्लोर) थे और मेरा कमरा सातवें डेक पर था।

कमरा बहुत ही सुन्दर था। कमरे में एक बहुत बड़ी खिड़की थी जिससे सामने खूबसूरत समुन्द्र दिखता था। सेटल होने के थोड़ी देर बाद सभी को उद्घोषणा द्वारा नियत स्थान पर बुलाया गया और क्रूज़ स्टाफ द्वारा आपातकालीन परिस्थितियों का सामना करने का तरीका समझाया गया ।

पूरा का पूरा क्रूज सेंट्रली एसी था। वहां हर डेक पर ढेरों कमरे थे। ऊपर नीचे जाने के लिए खूबसूरत लिफ्ट थी। डायनिंग हॉल्स थे, कसीनो था, बहुत बड़ा एक्टिविटी हॉल था, स्विमिंग पूल थे, बबल बाथ था, बार था, बास्केट बॉल कोर्ट और, और भी बहुत कुछ था। क्रूज क्या था, ऐसा लगता था कि जैसे एक पूरा शहर पानी पर चल रहा हो।

हर कमरे में दो आइटीनरी रखी थी जिसमे अगले डेढ़ दिनों तक होने वाली गतिविधियों की पूरी जानकारी लिखी थी। हम शाकाहारियों के लिए खाने का इंतज़ाम नौंवे डेक पर मेरिनर्स नाम के रेस्त्रां में था। खाना बहुत ही स्वादिष्ट बना हुआ था।

 

सिंगापोर में आने के बाद आज बढ़िया भारतीय भोजन मिला था। मेरे कमरे के बाहर बहुत बड़ी बालकनी थी, जहाँ खड़े होकर समुन्द्र का नज़ारा देखना मुझे बहुत भा रहा था। रात के समय जगमगाता हुआ सिंगापोर बहुत ही सुन्दर लग रहा था।

उस दिन मुझे नींद कहाँ आनी थी। ऊपर 12वें डेक पर पर कुछ आराम कुर्सियां बिछी हुई थी। उन पर लेट कर चाँद तारों को देखना एक अविस्मरणीय अनुभव था। उस दिन चाँद में मुझे एक अलग ही आभा नज़र आयी। वहीँ पास ही एक बैंड बहुत ही सुरीली धुनें बजा रहा था।

मुझे ऐसा लग रहा था कि जैसे मैं किसी और ही दुनिया में हूँ। मुझे रह रह कर टाइटैनिक फिल्म याद आ रही थी। ये क्रूज भी वैसा ही भव्य था। बिलकुल सपने सरीखा। रात के करीब 2.30 बज रहे थे पर मेरी आँखों में नींद नहीं थी।  लेकिन फिर लगा कि अब सोना ही बेहतर है क्योंकि मुझे सुबह सन राइज भी तो देखना था।

सुबह सन राइज देखने के लिए मैं जल्दी ही उठ कर अपने रूम की खिड़की के पास बैठ गयी। दूर नीला समुन्दर, कही कोई वीरान टापू और अम्बर में उमड़ते घुमड़ते बादल। तभी उनके बीच में से हल्का सा सूरज झाँका।

मैंने जीवन में पहली बार सोकर उठते ही इतना सुन्दर नज़ारा देखा था। तभी मुझे अपने घर की सुबह याद आ गयी। जब भी सुबह उठ कर बालकनी में जाओ तो सामने वाले अंकल हमेशा ब्रश करते, गला खकारते या दाढ़ी बनाते नज़र आते हैं।

ओफ्फो, मुझे भी न जाने क्या क्या याद आ जाता है। मन में आया कि काश जीवन की और कुछ सुबहें इतनी ही खूबसूरत हो।

मेरे कमरे में लगे टीवी में कुल 13 चैनल थे जिनमें तीन चैनल तो क्रूज के ही थे जिनमें एक चैनल पर हवाई जहाज की तरह नक़्शे में क्रूज की पोजीशन और उसकी मलक्का पोर्ट से दूरी दिखाई जा रही थी। बाकी दो चैनल्स पर स्टार क्रूज के विज्ञापन लगातार चल रहे थे।

टीवी में सिर्फ एक ही भारतीय चैनल था जिसका नाम था ‘ज़ी वरियासी’। इस पर हिंदी सीरियल और हिंदी गाने बज रहे थे।     

क्रूज पर दिन भर ढेर सारी एक्टिविटीज और प्रतियोगिताएँ होनी थी। नियत समय पर क्रूज ने मलक्का पोर्ट पर लंगर डाल दिया। वहां से समुन्दर का किनारा दूर था। कुछ एक्स्ट्रा पैसे देकर पूरे दिन के लिए मलक्का द्धीप घूमने भी जाया जा सकता था।

इसके लिए क्रूज से फेयरी द्वारा पहले मलक्का पोर्ट जाकर फिर वहां से आगे जाना होता। लेकिन क्रूज पर ही इतना कुछ करने को था कि कहीं बाहर जाने की ज़रूरत ही नहीं थी। सारा दिन वहां कैसे निकल गया पता ही नहीं चला। क्रूज पर कुछ भारतीयों को वाहियात हरकते देखकर मन कुछ कसैला भी हो गया था।  

खैर, अब शाम होने लगी थी और मुझे डूबता सूरज देखना था। शाम करीब पौने सात बजे क्रूज सिंगापोर वापिस रवाना हो चुका था और क्षितिज पर सूरज डूब रहा था और मुझे लग रहा था कि जैसे हाथो से रेत की तरह फिसलता समय काश यहीं रुक जाये।

रात को भी वहां ढेर सारे प्रोग्राम्स थे। आज वहां बॉलीवुड नाईट थी जिसमे हिंदी फ़िल्मी गाने बज रहे थे। कुल मिला कर वहां क्रूज पर एक मिनी इंडिया बसा हुआ था। रात वहां केक पार्टी भी थी जहाँ मैंने भी खूब मज़े उड़ाए। आज फिर देर रात मैं क्रूज के बारहवें डेक पर लेटी रात की खूबसूरती निहारती रही।   

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