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Gumla Tour : फॉरवर्ड प्रेस हिंदी के संपादक नवल किशोर कुमार की एक यात्रा

नवल किशोर कुमार

Gumla Tour : 2016 में फारवर्ड प्रेस के प्रबंध संपादक प्रमोद रंजन  के साथ मैंने छोटानागपुर की यात्रा की थी। उस यात्रा के दौरान हमदोनों गुमला जिले के बिशुनपुर प्रखंड के कई असुर समुदाय बहुल गांवों में गए थे। वहां अनिल असुर, सुषमा असुर जैसे मित्र मिले जो आज भी हमारे साथी हैं। वहां हमलोगों ने बॉक्साइट के खदानों को करीब से देखा और यह समझने की कोशिश की कि कैसे पूंजीवादी व्यवस्था आदिवासियों से उनके जल-जंगल-जमीन को हड़प रही है और कैसे आदिवासी समाज के लोग उनके द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे हैं। अपनी ही जमीन पर मजदूरी करने को मजबूर लोग।

झारखंड के असुर समुदाय की परंपराओं और संस्कृति से जुड़े तथ्य फारवर्ड प्रेस द्वारा प्रकाशित पुस्तक ‘महिषासुर : मिथक और परंपराएं’ में संकलित है। उस यात्रा के बाद वर्ष 2017 में प्रमोद रंजन  के नेतृत्व में एफपी टीम दिल्ली से कन्याकुमारी तक गयी। इससे संबंधित अनिल वर्गीज द्एक लेख ‘राजस्थान से कर्नाटक वाया महाराष्ट्र’ इसी पुस्तक में संकलित है।

पिछले वर्ष प्रमोद रंजन हिमाचल के पांगी और किन्नौर के इलाके में गए। वहां भी उन्होंने दलित-बहुजनों की संस्कृति और परंपराओं के अलावा बाहरी विचारधाराओं के बढ़ते प्रभाव को भी करीब से देखा।
इस बार प्रमोद रंजन पूर्वोत्तर की यात्रा कर रहे हैं। करीब एक महीने की इस यात्रा में वे पहले भूटान और बाद में आसाम, अरूणाचल प्रदेश, मिजोरम, मेघालय और नागालैंड जाएंगे। वे पिछले कुछ वर्षों से अपनी एक अनूठी यात्रा-योजना ‘एफपी ऑन द रोड’ के तहत दिल्ली से ड्राइव कर देश के विभिन्न राज्यों में जाते हैं। इस क्रम में अब तक फारवर्ड प्रेस की टीम 13 राज्यों का भ्रमण कर चुकी है। इनमें झारखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, उड़ीसा, हरियाणा, मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल शामिल हैं। पूर्वोत्तर भारत की यह यात्रा इसी क्रम में है, जो जून, 2019 के अंत तक चलेगी। 

पूर्वोत्तर भारत की इस यात्रा की तैयारी के क्रम में मैं उनके साथ रहा। इस दरम्यान हमारे सामने दो चुनौतियां थीं। पहली तो यह कि पूर्वोत्तर के राज्यों में जाया कहां जाए। हम न तो वहां का भूगोल समझते हैं और न ही संस्कृति। पहले भूटान जाएं या फिर पहले पूर्वोत्तर के राज्यों में यात्रा की जाय और अंत में लौटते समय भूटान। भूटान में ही जाने के लिए इनर लाइन परमिट कैसे बन सकता है? यह सवाल भी हमारे सामने था। गूगल पर खोजबीन के बाद यह जानकारी भी मिली कि अरूणाचल, मिजोरम और नागालैंड में भी भारतीय नागरिकों को इनर लाइन परमिट जरूरी है।एक बार मैंने प्रमोद रंजन जी से कहा भी कि किसी ट्रेवेल एजेंट से मदद ली जाय। वह हंसे और उन्होंने कहा कि यदि किसी ट्रेवेल एजेंट से ही मदद लेनी पड़े तो हम यात्री किस बात के। फिर हमलोगों ने तय किया कि हम पूर्वोत्तर जाने के सूत्र भी तलाशेंगे और उन स्थानों का भी पता करेंगे जहां दलित-बहुजनों के सवाल और जवाब दोनों हमारे सामने होंगे।

प्राथमिक जिम्मेवारी मैंने ली। पहले चरण में दिल्ली में भूटान राजदूतावास से संपर्क किया। वहां अपेक्षित सहयोग नहीं मिला सिवाय इसके कि आप भूटान जाएं और सीमा पर ही आपको इनर लाइन परमिट जारी कर दिया जाएगा। अन्य सहायता के लिए भूटान के पर्यटन विभाग का ऑनलइन पता (वेब पोर्टल का एड्रेस) बता दिया गया।

नागालैंड भवन का वाकया दिलचस्प है। वहां जानकारी मिली कि ज्योति कलश स्थानीय आयुक्त हैं। पहले दिन जब उनसे मिला तो उन्होंने कहा कि नागालैंड क्यों जाना चाहते हैं। मेरा जवाब था कि हम लोग वहां के समाज और संस्कृति को समझना चाहते हैं। इस पर उन्होंने कहा कि सबकुछ तो इंटरनेट पर उपलब्ध है। जाने से क्या लाभ। पहले तो लगा कि आईएएस अधिकारी होने के बावजूद ज्योति कलश इतनी समझ नहीं रखते हैं कि परंपराओं और संस्कृतियों को इंटरनेट के सहारे बैठे-बैठे नहीं जाना जा सकता है। उनसे निराशा हाथ लगी। लेकिन वहीं जानकारी यह मिल गयी कि नागालैंड जाने के लिए यहीं से इनर लाइन परमिट बनवाया जा सकता है।

वापस ऑफिस पहुंचकर प्रमोद रंजन जी को ज्योति कलश का हाल सुनाया। वे फिर हंसे और कहा कि पहले यह पता करिए कि ज्योति कलश हैं कहां के। गूगल पर खोजा तो तीसमारखां टाइप प्राणी लगे ज्योति कलश। पहले इंजीनियरिंग, फिर एमबीए और एनएसडी से प्रशिक्षित कलाकार भी। कई भोजपुरी फिल्मों में काम कर चुके हैं। रंगमंच पर भी उनकी सक्रियता बनी रहती है। साथ ही यह जानकारी भी मिली कि वे हमारे (मेरे और प्रमोद जी के) गृह जिले पटना के रहने वाले हैं और यह वह भी कंकड़बाग के। प्रमोद रंजन जी ने पूछा कि अब आपको जवाब मिल गया कि ज्योति कलश ने आपसे वो बातें क्यों कही। हंसने की बारी मेरी थी।

पूर्वोत्तर की राह दिल्ली में तलाश लेने की हमारी कोशिश उस समय रंग लायी जब हमलोग अरूणाचल प्रदेश भवन पहुंचे। वहां पर्यटन अधिकारी सुश्री मोयोंग एडांग से मुलाकात हुई। उन्होंने करीब डेढ़ घंटे तक अरूणाचल प्रदेश के विभिन्न इलाकों के बारे में जानकारी दी। यह भी सुझाया कि वहां की जनजातियों की संस्कृति और परंपराओं को समझने के लिए हमें किन जगहों पर जाना चाहिए। ऐसा ही व्यवहार मणिपुर के अपर स्थानीय आयुक्त एल. एच. नगथिंगशिम ने किया। उन्होंने मणिपुर के बारे में विस्तार से बताया। हालांकि उन्होंने हमें चेताया भी कि जून के महीने में खूब बरसात होती है और यह आदर्श समय नहीं है। लेकिन उन्होंने हमें प्रोत्साहित भी किया कि हम मणिपुर जरूर जाएं।

अरूणाचल प्रदेश भवन से हमें जानकारी मिली कि वहां के लिए इनर लाइन परमिट ऑनलाइन बनता है। इसे टेक्नोलॉजी का कमाल ही कहिए कि नागालैंड और मिजोरम में ऑफलाइन के बावजूद हमें हाथों-हाथ परमिट मिल गए जबकि ऑनलाइन व्यवस्था के बावजूद अरूणाचल प्रदेश के लिए परमिट हेतु हमें पांच दिनों का इंतजार करना पड़ा।

दिल्ली के पॉश इलाके चाणक्यपुरी में विभिन्न प्रांतीय सरकारों के भवनों में जाने के क्रम में हमलोगों ने यह देखा कि किसी भी राज्य के स्थानीय आयुक्त संबंधित राज्यों के निवासी नहीं हैं। जैसे नागालैंड के ज्योति कलश बिहार के निवासी हैं। मेघालय के संपथ कुमार पूर्वोत्तर के नहीं बल्कि दक्षिण भारतीय हैं। इस संबंध में प्रमोद रंजन जी का कहना था कि पूर्वोत्तर के राज्यों का हिंदू-करण किया जा रहा है। आप इसे भारतीयकरण भी कहिए। दोनों एक ही बात है।

बहरहाल, प्रमोद रंजन जी एक महीने की यात्रा के लिए 22 मई को निकले थे.
(नवल किशोर कुमार फ़ारवर्ड प्रेस के हिंदी संपादक हैं)

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