Likhi Chhaj Travel Blog : जानें, लिखी छाज का इतिहास, कला और रहस्य से भरी गुफाएं
Likhi Chhaj Travel Blog : भारत का इतिहास केवल ग्रंथों और शिलालेखों में ही नहीं, बल्कि गांवों-कस्बों के लोककथाओं, स्मारकों और प्राचीन धरोहरों में भी जीवित है। मध्य प्रदेश का मुरैना जिला ऐसी ही ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहरों का भंडार है। यहां के प्राचीन किले, गुफाएं, मंदिर और स्मारक न केवल वास्तुकला का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करते हैं, बल्कि यह भी प्रमाणित करते हैं कि यह भूमि प्राचीन काल से ही मानवीय सभ्यता और संस्कृति का केंद्र रही है। इन्हीं स्थलों में से एक है लिखी छाज, ये ऐतिहासिक, धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। लिखी छाज की ख्याति केवल इसके स्थापत्य और प्राचीन महत्व से ही नहीं, बल्कि पांडवों से जुड़ी जनश्रुतियों के कारण भी है। महाभारत काल से संबंध रखने वाली इस जगह को आज भी श्रद्धा और आस्था के साथ देखा जाता है।
मध्य प्रदेश के उत्तरी भाग में स्थित मुरैना जिला, चंबल नदी के किनारे बसा है। चंबल घाटी का यह क्षेत्र कभी अपने बीहड़ों, डकैतों और कठिन जीवनशैली के लिए प्रसिद्ध था, लेकिन इसके पीछे की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहरों ने इसे एक अनोखा रूप दिया है।
मुरैना के आसपास का क्षेत्र शैव, वैष्णव और जैन धर्म की प्राचीन स्थापत्य कला का केंद्र रहा है। यहां स्थित Bateshwar Temple Complex, Padavali, और Mitawali के 64 योगिनी मंदिर आज विश्व प्रसिद्ध हैं। इन्हीं की श्रृंखला में लिखी छाज का नाम भी आता है, जो इतिहास और लोककथाओं का अद्भुत संगम है।
“लिखी छाज” नाम अपने आप में विशिष्ट है। “छाज” शब्द का अर्थ है छतरीनुमा छज्जा या गुफा का ऊपरी हिस्सा। कहा जाता है कि यहां की चट्टानों और गुफाओं पर अनेक प्रकार की लिखाई और चित्रकारी देखने को मिलती है, जिस कारण इसे “लिखी छाज” कहा जाने लगा। यह स्थल मुरैना जिले के बीहड़ों और चंबल घाटी के नजदीक स्थित है। यहां की चट्टानी संरचनाएं और गुफाएं देखने में प्राचीन कालीन शिल्पकला की गवाही देती हैं।
लिखी छाज का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है इसका पांडवों से जुड़ा होना। लोककथाओं और जनश्रुतियों के अनुसार, महाभारत काल में जब पांडव अज्ञातवास में थे, तब उन्होंने भारत के विभिन्न हिस्सों में विचरण किया। इसी कड़ी में वे चंबल घाटी के बीहड़ों में भी आए और कुछ समय के लिए लिखी छाज में ठहरे।
कहा जाता है कि पांडवों ने यहां गुफाओं में निवास किया, भोजन बनाया और यज्ञ-हवन भी किया। आज भी स्थानीय लोग बताते हैं कि यहां की कुछ गुफाओं में उस समय की आकृतियां, चिह्न और शिलालेख मौजूद हैं, जिन्हें पांडवों के समय से जोड़ा जाता है।
इसके अलावा, पास ही के क्षेत्रों में भी पांडवों से जुड़ी कई कथाएं प्रचलित हैं। मुरैना और चंबल क्षेत्र की यह परंपरा इस तथ्य को और मजबूत करती है कि महाभारतकालीन घटनाएं केवल ग्रंथों तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि इन स्थलों में जीवित भी रहीं।
लिखी छाज केवल धार्मिक मान्यताओं से ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि ऐतिहासिक और पुरातात्विक दृष्टि से भी इसका महत्व अद्वितीय है।
1. गुफाएं और चित्रकारी – यहां की गुफाओं में बने चित्र, आकृतियाे और लिखाई मानव सभ्यता के प्राचीन काल की झलक देती हैं। कुछ शोधकर्ताओं का मानना है कि यहाँ की कला पाषाण युग या उत्तर वैदिक काल तक की हो सकती है।
2. शिलालेख– कुछ गुफाओं में ऐसे चिह्न मिले हैं जो लिपि जैसे प्रतीत होते हैं। यद्यपि इन पर अभी विस्तृत शोध की आवश्यकता है।
3. स्थापत्य कला– यहां की संरचनाओं से यह स्पष्ट होता है कि प्राचीन काल में भी लोग गुफाओं को काटकर निवास और धार्मिक कार्यों के लिए उपयोग करते थे।
लिखीछाज की गुफाओं में बने चित्रों और उनके अर्थों को पूरी तरह से समझना आज भी एक रहस्य है, जिससे यह स्थान पुरातात्विक शोध के लिए महत्वपूर्ण है
इस स्थल को राज्य संरक्षित स्मारक घोषित करने के लिए 2013 में गजट नोटिफिकेशन भी किया गया था, हालांकि अंतिम अधिसूचना अब तक पूरी नहीं हो पाई है।
लिखी छाज को धार्मिक दृष्टि से भी बहुत महत्व दिया जाता है। यहां आने वाले श्रद्धालु इसे पांडवों की तपोस्थली मानकर पूजा-अर्चना करते हैं।
पांडवों की उपस्थिति* की मान्यता के कारण यहां श्रद्धा का भाव गहरा है।
चंबल क्षेत्र में लिखी छाज को “धार्मिक आस्था का केंद्र” भी माना जाता है।
यहां स्थानीय लोग विशेष अवसरों पर मेलों और धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन भी करते हैं।
लिखी छाज से जुड़ी अनेक लोककथाएं प्रचलित हैं, जिनमें से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं
1. भीम का पराक्रम – कहा जाता है कि भीम ने यहां एक विशाल पत्थर को उठा कर दूर फेंका था, जो आज भी क्षेत्र में “भीम शिला” के नाम से प्रसिद्ध है।
2. अर्जुन की साधना – अर्जुन ने यहां धनुर्विद्या का अभ्यास किया था। स्थानीय लोग बताते हैं कि कुछ गुफाओं की आकृतियां उस साधना से जुड़ी हैं।
3. द्रौपदी का विश्राम – माना जाता है कि द्रौपदी ने यहाँ कुछ समय के लिए विश्राम किया और पास के कुएँ से जल ग्रहण किया।
लिखी छाज केवल पुरातात्विक स्थल ही नहीं, बल्कि स्थानीय समाज की सांस्कृतिक धरोहर भी है। यहां के लोग इसे अपनी परंपराओं और लोककथाओं से जोड़कर देखते हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों में पांडवों से जुड़ी कथाएँ पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुनाई जाती हैं।
उत्सवों और मेलों के दौरान लोग यहाँ एकत्र होकर धार्मिक अनुष्ठान करते हैं।
यह स्थल लोकगीतों और लोकनाट्यों का भी हिस्सा रहा है।
आज के समय में लिखी छाज पर्यटन की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। मुरैना आने वाले पर्यटक यहाँ की गुफाओं और प्राचीन धरोहरों को देखने अवश्य आते हैं।
लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि लिखी छाज को अभी तक वैसा संरक्षण और पहचान नहीं मिल पाई है, जैसा अन्य ऐतिहासिक स्थलों को मिला है।
उचित प्रबंधन और प्रचार-प्रसार के अभाव में यह स्थान अभी भी उपेक्षित है।
गुफाओं की चित्रकारी और शिलालेख समय और मौसम की मार से क्षतिग्रस्त हो रहे हैं।
यदि इसे संरक्षित किया जाए तो यह भारत की धरोहर सूची में एक महत्वपूर्ण स्थान पा सकता है।
लिखी छाज मुरैना का एक अद्भुत और अनूठा स्थल है, जहां इतिहास, धर्म, संस्कृति और लोककथाएँ एक साथ मिलती हैं। यह केवल पांडवों की स्मृति और जनश्रुतियों का प्रतीक नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता और प्राचीन कला का भी प्रमाण है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि इस धरोहर को संरक्षित किया जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ भी अपने अतीत से जुड़ सकें और गर्व कर सकें कि उनके क्षेत्र में इतनी महान धरोहरें विद्यमान हैं।
लिखी छाज हमें यह सिखाता है कि हमारा इतिहास केवल किताबों तक सीमित नहीं, बल्कि गाँवों की मिट्टी, चट्टानों और गुफाओं में भी जीवित है। पांडवों से जुड़ी यह स्मृति हमें सदैव याद दिलाती है कि यह भूमि केवल वीरता की ही नहीं, बल्कि संस्कृति और अध्यात्म की भी प्रतीक रही है।
लिखी छाज (Likhii Chhaj) मुरैना ज़िले के पहाड़गढ़ क्षेत्र में स्थित एक ऐतिहासिक और पुरातात्विक स्थल है। यह स्थल प्राचीन गुफाओं और चित्रकला के लिए प्रसिद्ध है, जो मानव सभ्यता के प्रारंभिक काल की झलक प्रस्तुत करता है। अब आपको बताते हैं यहां कैसै पहुंचे।
सड़क मार्ग से कैसे पहुंचे लिखी छाज || How to reach Likhi Chhaj by road
ग्वालियर से मुरैना: ग्वालियर शहर से मुरैना लगभग 40 किलोमीटर दूर है। ग्वालियर से मुरैना तक बस या टैक्सी द्वारा आसानी से पहुंचा जा सकता है।
मुरैना से पहाड़गढ़: मुरैना से पहाड़गढ़ की दूरी लगभग 58 किलोमीटर है। यहाँ से स्थानीय परिवहन या टैक्सी द्वारा लिखी छाज तक पहुंचा जा सकता है।
स्थानीय मार्ग: पहाड़गढ़ क्षेत्र में स्थित लिखी छाज तक पहुंचने के लिए स्थानीय मार्गों का उपयोग किया जाता है। मार्ग की स्थिति और मौसम के अनुसार यात्रा की योजना बनाएं।
रेल मार्ग से कैसे पहुंचे लिखी छाज || How to reach Lakhi Chhaz by train
नजदीकी रेलवे स्टेशन: मुरैना रेलवे स्टेशन, ये मुरैना शहर में स्थित है।
ग्वालियर रेलवे स्टेशन: ग्वालियर रेलवे स्टेशन भी नजदीकी प्रमुख रेलवे स्टेशन है।
रेल यात्रा: इन स्टेशनों से मुरैना तक ट्रेन द्वारा पहुंचा जा सकता है। मुरैना से पहाड़गढ़ तक स्थानीय परिवहन या टैक्सी द्वारा आगे की यात्रा की जा सकती है।
हवाई मार्ग से कैसे पहुंचे लिखी छाज || How to reach Likhi Chhaj by air
नजदीकी हवाई अड्डा: ग्वालियर एयरपोर्ट (GWL), जो मुरैना से लगभग 40 किलोमीटर दूर है।
हवाई यात्रा: प्रमुख शहरों से ग्वालियर के लिए फ्लाइट लेकर, ग्वालियर एयरपोर्ट से मुरैना तक टैक्सी या बस द्वारा पहुंचा जा सकता है।
यात्रा टिप्स || Travel Tips
स्थानीय गाइड: लिखी छाज तक पहुँचने के लिए स्थानीय गाइड की सहायता लेना फायदेमंद हो सकता है, क्योंकि मार्ग जंगली और कम ज्ञात हो सकते हैं।
समय का चुनाव: मानसून के मौसम में रास्ते फिसलन भरे हो सकते हैं, इसलिए यात्रा के लिए सुखद मौसम का चुनाव करें।
सामान: ट्रैकिंग के लिए उपयुक्त जूते, पानी, और अन्य आवश्यक सामान साथ रखें।
यदि आप लिखी छाज की यात्रा की योजना बना रहे हैं, तो स्थानीय पर्यटन कार्यालय या गाइड से संपर्क करके मार्ग और अन्य जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
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