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Cliff Jumping in Rishikesh – क्लिफ जंपिंग से मुझे मिली डर पर जीत

Cliff Jumping, एडवेंचर टूर की कैटिगरी में एक ऐसा नाम है जिसे हम में से लगभग सभी लोगों ने ही किया होगा. हम में से सभी ऐसे भी होंगे जो कभी अपना पहला अनुभव भुला नहीं सकेंगे. मेरी भी कहानी ऐसी ही है. मैंने ऋषिकेश की अपनी यात्रा में, 2016 में लाइफ में पहली बार Cliff Jumping की थी. हालांकि, इसका एक्सपीरियंस और इससे पहले का मेरा अनुभव भी कम रोमांचक नहीं है.

दरअसल, साल 2009 में, मैं पहली बार ऋषिकेश टूर पर गया था. उस समय मैं कॉलेज में था और भारतीय विद्या भवन के हर साल होने वाले स्टडी टूर के साथ, मैं बतौर छात्र वहां गया था. उस साल, मैंने पहली बार रिवर राफ्टिंग की थी. उस राफ्टिंग में, मैं इतना डर गया था कि एक रैपिड में, मेरा पैडल ही हाथ से छूट गया था. मेरी उस चूक के बाद, गाइड ने राफ्टर को एक कोने में लगाया था और गंगा में तैरते हुए दूसरे किनारे पर जाकर पैडल को लेकर आया था.

नवंबर के उस महीने में, वो बेचारा ठंड से कांपने लगा था. मुझे उसपर बहुत दया आई थी. मेरी एक गलती से उस गाइड ने कितनी तकलीफ सही थी. खैर, अब उस बात को 7 साल बीत चुके थे. यादें अब भी ताजा ही थीं लेकिन समय बदल चुका था. हालांकि इस बीच, मैंने न तो दोबारा राफ्टिंग ही की थी और क्लिफ जंपिंग ( Cliff Jumping ) तो आज तक मैंने नहीं की थी.

2009 में, मैं एक छात्र बनकर ऋषिकेश आया था लेकिन 2016 में, मैंने उसी एजुकेशन टूर में बतौर फैकल्टी बनकर आया था. इस स्टडी टूर में, हर ग्रुप को एक दिन राफ्टिंग और एडवेंचर स्पोर्ट्स के लिए जाना होता था. हर ग्रुप के साथ, एक फैकल्टी मेंबर भी रहता था. स्टडी टूर के पांचवें दिन, एक ग्रुप के साथ मुझे वहां जाना पड़ा.
इस टूर में, बच्चे बेहद अडवेंचरस थे. राफ्टिंग के दौरान तो वो राफ्टर में आगे बैठने के लिए झगड़ा करने लगे थे. एक समय तो ऐसा आया जब वो सभी नदी में छपाक छपाक जंप भी करने लगे थे. वहीं, मैं था जो राफ्टर पर ही दुबका रहा.

अब बारी आई, सबसे अडवेंचरस काम की. ये थी क्लिफ जंपिंग (Cliff Jumping) . सभी स्टूडेंट्स, क्लिफ पर दनादन चढ़ गए. लड़कियां इसमें सबसे आगे रहीं. वो कूदीं भी तो बेहद अजीबोगरीब ढंग से. कोई अपने पेरेंट्स को आईलवयू बोलकर तो किसी ने सहेली को गले लगाया और फिर छलांग लगाई.

सभी छात्र जंपिंग करते, फिर दोबारा करते. मैं नीचे खड़ा सभी को देख रहा था. मुझे पानी से फोबिया भी था. इसकी वजह कुछ हादसे थे और बचपन की एक ऐसी घटना थी जब मैं गांव के ट्यूबवेल में डूबते डूबते बचा था. डर इतना था कि दादी के साथ जब नदी नहाने जाता था तो किनारे पर लोटे से पानी भर भर कर मग की तरह नहाता था.

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ऋषिकेश में उस दिन मैं डरा डरा सा खड़ा था कि इतनें में दोनों छात्र, खुशिल और मुकुल, भागे भागे मेरे पास आए और पकड़कर मुझे ऊपर ले गए. सच मानो दोस्तों, काटो तो खून नहीं, वाला हाल था मेरा तो.

क्लिफ जंपिंग (Cliff Jumping) से पहले ही, मैं जहां खड़ा था वो जगह मुझे हिमालय की चोटी नजर आने लगी थी. अभी चंद मिनट पहले ही, नीचे से वही जगह मुझे बेहद छोटी नजर आ रही थी. कमाल का अनुभव था वो भी. अब बारी आई कूदने की. मुकुल कहता, अरे कूदो सर… और तुरंत ही मुझे धक्का देने लगता. मैंने उससे रुकने के लिए कहा.

इधर मुकुल, उधर खुशिल और पीछे से और बच्चों को दबाव. कूदिए सर, कूदिए… आपमें बड़ा दम है. अब मरता क्या न करता. मैं कूदने की सोचकर आगे बढ़ा, इतने में न जाने किसने पीछे से धक्का भी दे दिया. छपाक से पानी में. कुछ सोचने का टाइम मिलता इससे पहले ही डुबकी मारकर मैं ऊपर आ चुका था. कमाल की चीज़ है ये लाइफ जैकेट भी.

मैं खुद को पानी की सतह पर देख रहा था. खुशी इतनी बढ़ी की भागा भागा ऊपर आया और दोबारा जंब कर लिया. जो वीडियो आप देख रहे हैं, वो सेकेंड टाइम जंप का है. तो दोस्तों, उस दिन सच में मैंने खुद के डर पर जीत पाई थी.

ऋषिकेश टूर में, सुबह की असेंबली में सभी बच्चे अपने अनुभवों को शेयर करते हैं. अगले दिन खुशिल और मुकुल अपने अनुभवों को शेयर करने आए. उन्होंने क्लिफ जंपिंग (Cliff Jumping) के अनुभव को शेयर किया. उनके बाद मैंने कहा- कल इन्हीं दोनों की वजह से मैंने खुद के डर पर विजय पाई. ऐसा कहने की देर थी कि दोनों बच्चों के लिए तालियां बज उठीं.

 

Cliff Jumping का पूरा वीडियो यहां देखें

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