Jhansi City in Uttar Pradesh : झांसी शहर में कहां कहां घूमें? कितना होता है खर्च? पूरी जानकारी
Jhansi City in Uttar Pradesh : नमस्कार दोस्तों, ट्रैवल जुनून के इस यात्रा ब्लॉग में आप सभी का स्वागत है. आज हम आपको बताएंगे उत्तर प्रदेश में स्थित ऐतिहासिक शहर झांसी के बारे में. झांसी ( Jhansi) की यात्रा की शुरुआत होती है यहां के ऐतिहासिक झांसी किले से… ये किला सिर्फ़ पत्थरों की विशाल दीवार नहीं है, बल्कि भारत (India) के स्वतंत्रता संग्राम की वीरता और साहस की गूंज भी यहां दिखाई देती है. 1613 में बुंदेला राजा वीर सिंह देव (Bundela King Veer Singh Dev) ने इस किले का निर्माण कराया, और तब से लेकर आज तक, ये किला हर कालखंड की कहानियों का साक्षी रहा है. यहां कदम रखते ही आपको महसूस होगा, कैसे हर गली, हर तोप और हर मंदिर में इतिहास की गूंज है… क्योंकि झांसी (Jhansi) केवल एक शहर नहीं, बल्कि वीर रानी लक्ष्मीबाई (Laxmibai) और उनके अदम्य साहस की धरती है।”
झांसी के किले का निर्माण 1613 ईस्वी में ओरछा (Orchha) के बुंदेला राजा वीर सिंह देव ने करवाया था. उस वक्त झांसी का नाम बलवंत नगर हुआ करता था. किले का निर्माण सामरिक दृष्टि से किया गया था ताकि आसपास के पूरे क्षेत्र पर निगरानी रखी जा सके.
इसके बाद यह किला लगभग 100 वर्षों तक मुग़लों के अधीन रहा। मुग़ल काल (Mughal Era) के बाद यह किला लगभग एक और शताब्दी तक मराठों के अधिकार में रहा। अंततः, मराठा शासन के पश्चात यह किला अंग्रेज़ों के कब्ज़े में चला गया।
झांसी किला झांसी रेलवे स्टेशन से लगभग 3 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है. यहां पहुंचने के लिए आप ऑटो-रिक्शा ले सकते हैं, जिसका किराया सामान्यतः ₹50 से ₹60 के बीच होता है. इसके अलावा आप बस से भी किले तक पहुंच सकते हैं। बस से आने पर आपको झांसी म्यूज़ियम बस स्टॉप पर उतरना होगा, जहां से किला लगभग 5 मिनट की पैदल दूरी पर है.
बात करें प्रवेश शुल्क तो भारतीय नागरिक: ₹25 और विदेशी पर्यटक: ₹300 है. 15 वर्ष से कम आयु के बच्चे: नि:शुल्क है. अगर आप अपने वाहन से झांसी किले पर आते हैं, तो इसके ठीक सामने पार्किंग मौजूद है. वहां पर शुरुआती चार घंटे का पार्किंग शुल्क 20 रुपए है. इसके बाद हर चार घंटे के लिए आपको 20 रुपए चुकाने होते हैं.
प्रारंभ में यह किला बुंदेला शासकों के अधीन रहा. 18वीं शताब्दी में झांसी मराठों के अधीन आई. पेशवा बाजीराव ने झांसी की जागीर रघुनाथ राव नेवालकर को दी. बाद में झांसी के राजा बने गंगाधर राव नेवालकर, जिनकी पत्नी थीं रानी लक्ष्मीबाई.
गंगाधर राव नेवालकर झांसी के अंतिम मराठा शासक थे. वे एक विद्वान, धर्मपरायण और संगीत प्रेमी राजा थे. उनके निधन (1853) के बाद अंग्रेजों ने डॉक्ट्रिन ऑफ लैप्स के तहत झांसी को हड़पने की कोशिश की, जिसका रानी लक्ष्मीबाई ने ज़ोरदार विरोध किया.
अब आते हैं किले की संरचना और इसकी जानकारी पर…
झांसी किला लगभग 15 एकड़ क्षेत्र में फैला हुआ है और ऐतिहासिक रूप से इसमें 10 प्रवेश द्वार (गेट) थे। किले के भीतर कई महत्वपूर्ण और दर्शनीय संरचनाएँ हैं, जिनका ऐतिहासिक महत्व बहुत अधिक है।
जैसे ही आप झांसी किले में प्रवेश करते हैं, दाहिनी ओर आपको कड़क बिजली तोप दिखाई देती है। कहा जाता है कि जब यह तोप दागी जाती थी, तो इसकी आवाज़ शेर की दहाड़ जैसी सुनाई देती थी। झांसी के किले में रखी कड़क बिजली तोप रानी लक्ष्मीबाई के पति राजा गंगाधर राव के जमाने में बनवाई गई थी।
झांसी के किले में रखी इस तोप की गिनती अपने जमाने की खूंखार तोपों में होती थी. इस तोप को जितना खतरनाक बनाया गया है. उतनी ही इस पर कलाकारी भी दिखाई गई है. इस तोप के आगे वाले हिस्से पर शेर बना हुआ है.ऐसा कह सकते हैं कि ये तोप सिंह की मुखाकृति से शोभित हो रही है.
आमतौर पर जो भी तोप पुराने जमाने में इस्तेमाल होती थी. उसमें गोला पीछे की तरफ से डाला जाता था. लेकिन, कड़क बिजली तोप में गोला उसके मुंहाने पर रखा जाता था . इस वजह से यह तोप और घातक हो जाती थी. जिस कारण इसकी मारक क्षमता में इजाफा होता था.
तोपची गुलाम गौस खां ने कड़क बिजली तोप के गोले से अंग्रेजों की हालत पतली कर दी थी. इसके साथ ही उन्होंने अंग्रेजों को किले में घुसने से भी रोका था.सैनिकों और इस तोप की मदद से ही रानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजों को दो सप्ताह तक किले में अंदर आने नहीं दिया.
गणेश मंदिर, जैसा कि नाम से स्पष्ट है, भगवान गणेश को समर्पित है.यह किले के प्रवेश द्वार के पास बना हुआ है। माना जाता है कि रानी लक्ष्मीबाई यहां नियमित रूप से पूजा-अर्चना करने आती थीं.
गणेश मंदिर के पास बनी सीढ़ियों से ऊपर जाने पर भवानी शंकर नामक तोप दिखाई देती है। इस तोप का आगे का हिस्सा मगरमच्छ के आकार का है और पीछे की ओर हाथी की आकृति उकेरी गई है। मान्यता है कि यह तोप माँ भवानी की शक्ति से आशीर्वादित थी, इसी कारण इसका नाम भवानी शंकर पड़ा।
किले के प्रवेश द्वार की बाईं ओर की सीढ़ियाँ किले के भीतरी हिस्से में ले जाती हैं। यहाँ तोपची गुलाम गौस खान और मोती बाई, तथा घुड़सवार खुदा बख्श की कब्रें स्थित हैं। ये तीनों 4 जून 1858 को ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के विरुद्ध युद्ध में शहीद हुए थे।
कब्रों के पास ही पंचमहल स्थित है। यह मूल रूप से पाँच मंज़िला इमारत है, लेकिन सामने से देखने पर इसकी तीन ही मंजिलें नजर आती हैं. इसकी दो मंजिले एक तरह से अंडर ग्राउंड हैं. रानी लक्ष्मीबाई इसका निचला फ्लोर और बैठकों के लिए इस्तेमाल करती थीं, जबकि वे पहली मंज़िल के एक कोने के कमरे में निवास करती थीं।
पंचमहल के पास ही काल कोठरी या कारागार कक्ष स्थित है। इसका निर्माण मराठों द्वारा किया गया था। बाद में अंग्रेज़ों ने इसमें एक और मंज़िल जोड़ दी और इसे जेल के रूप में ही उपयोग किया।
पंचमहल के पास ही वह स्थान है जहाँ आज भारतीय तिरंगा झंडा फहराया जाता है।
यह झांसी किले का सबसे प्रसिद्ध हिस्सा है। यहीं से रानी लक्ष्मीबाई ने अपने दत्तक पुत्र को साथ लेकर घोड़े पर सवार होकर छलांग लगाई थी, ताकि अंग्रेज़ों द्वारा किले की घेराबंदी के बाद वे बचकर निकल सकें।
किले के भीतरी हिस्से के प्रवेश द्वार के दाहिने छोर पर एक रास्ता नीचे की ओर जाता है, जो रानी के अमोद बाग तक पहुँचता है। बाद में अंग्रेज़ों ने इस स्थान का इस्तेमाल शस्त्रागार के रूप में किया।
रानी के अमोद गार्डन के सामने स्थित हैंगिंग टॉवर का इस्तेमाल राजा गंगाधर राव के शासनकाल में अपराधियों को फाँसी देने के लिए किया जाता था।
हैंगिंग टॉवर के पास से एक रास्ता नीचे की ओर जाता है, जो शिव मंदिर तक पहुँचता है। इस मंदिर का निर्माण नरोशंकर (1742–1757) के शासनकाल में हुआ था। इसकी स्थापत्य शैली में बुंदेला और मराठा शैली की झलक मिलती है। यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है और महाशिवरात्रि के अवसर पर यहाँ बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं। मंदिर में प्रवेश से पहले जूते उतारना अनिवार्य है।
झांसी किले के इतिहास को दर्शाने वाला एक घंटे का लाइट एंड साउंड शो प्रतिदिन शाम को हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं में आयोजित किया जाता है।
टिकट शुल्क
भारतीय वयस्क: ₹50
विदेशी वयस्क: ₹300
छात्र: ₹15
झांसी किले से बाहर आने पर तलहटी में स्थित है जनरल बिपिन रावत पार्क. ये पार्क उत्तर प्रदेश के झांसी शहर में स्थित एक महत्वपूर्ण स्मारक स्थल है। ये भारत के पहले चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) और थल सेना प्रमुख रहे जनरल बिपिन रावत को समर्पित है। ये स्थान न केवल हरियाली और विश्राम का केंद्र है, बल्कि देश की सैन्य परंपरा और शौर्य को सम्मान देने वाला स्थल भी है।
पार्क के अंदर बच्चों और युवाओं के लिए कई तरह की एडवेंचर एक्टिविटीज उपलब्ध कराई गई हैं. यहां रोपवे, आर्मी ट्रेनिंग की तर्ज पर प्लास्टिक की रस्सियों से बनाया गया अपर बेस और शूटिंग स्टॉल जैसी ऐक्टिविटीज लोगों को खासा आकर्षित करती हैं. बच्चे इन एडवेंचर गेम्स में हिस्सा लेकर उत्साह और रोमांच का अनुभव करते हैं.
एडवेंचर एक्टिविटी के लिए बनाए गए रस्सियों के जाल पर लोगों का पूरा भरोसा बना हुआ है. इन गतिविधियों को इस तरह डिजाइन किया गया है कि बच्चे और युवा बिना किसी डर के इसमें हिस्सा ले सकें. रोप आधारित एडवेंचर गेम्स खास तौर पर बच्चों को काफी पसंद आते हैं और यही इस पार्क की सबसे बड़ी पहचान बन चुके हैं.
इस पार्क का एंट्री टिकट 10 रुपए है. अंदर झूलों के लिए भी टिकटें लगती हैं.
जिस मार्ग पर झांसी का किला स्थित है. यहां आपको कई पार्क मिलते हैं. इन पार्क में डॉक्टर वृंदावन लाल वर्मा पार्क, महारानी लक्ष्मीबाई पार्क भी है.
झांसी में हमारी यात्रा का अगला पड़ाव था झांसी म्यूजियम. बुंदेलखंड क्षेत्र ऐतिहासिक,पौराणिक और आध्यात्मिक रूप से संपन्न है.इस क्षेत्र में कई धरोहर हैं.झांसी का राजकीय संग्रहालय बुंदेलखंड की ऐसी ही धरोहरों को संजोए हुए है.झांसी किले के पास स्थित यह संग्रहालय पर्यटकों के लिए एक बड़ा आकर्षण का केंद्र है.हर रोज यहां 200 से अधिक पर्यटक आते हैं.यह संग्रहालय उत्तर प्रदेश के पूरे बुंदेलखंड क्षेत्र का एकमात्र संग्रहालय है.यहां ललितपुर, महोबा, चित्रकूट, बांदा, हमीरपुर, जालौन जिलों की ऐतिहासिक धरोहरें भी इसी संग्रहालय में संरक्षित हैं.
झांसी संग्रहालय में आपको 4 लाख वर्ष पुराने औजार और मूर्तियां देखने को मिल जाएंगी.इसके साथ ही यहां मुगल और बुंदेल काल के हथियार भी संरक्षित हैं.उस समय की तलवार, ढाल, चाकू, तोप जैसे शस्त्र यहां संग्रहित है.जैन धर्म से जुड़ी मूर्तियां भी संग्रहालय में रखी हुई हैं.यहां पुराने सिक्कों को भी संग्रहित करके रखा गया है.मुगलकालीन सिक्कों के अलावा ब्रिटिश और यूरोपियन देशों के सिक्के भी आपको यहां देखने को मिल जाते हैं.
संग्रहालय सप्ताह में 6 दिन खुला रहता है.सुबह 11 से शाम 5 बजे तक संग्रहालय खुला रहता है.सोमवार को संग्रहालय बंद रहता है.इसके अलावा महीने के दूसरे रविवार और सरकारी अवकाश पर भी संग्रहालय बंद रहता है.
झांसी म्यूजियम एक इंटरैक्टिव म्यूजियम है. यहां आप क्विज का आंसर दे सकते हैं, स्क्रीन को स्क्रॉल करके अलग अलग कालखंडों के सिक्कों के बारे में जान पाते हैं और थ्री डी हैलिकॉप्टर राइड से बुंदेलखंड की यात्रा भी करते हैं…
ये म्यूजियम भी झांसी किले से पैदल दूरी पर स्थित है, लेकिन आप वहां से ई-रिक्शा लेकर भी यहां आ सकते हैं…
झांसी म्यूजियम के बाद हमारी यात्रा का अगला और बेहद रोमांचक पड़ाव था झांसी स्पेस म्यूजियम. ये स्थल भी एक तरह से झांसी म्यूजियम के सामने ही स्थित है. यह झांसी का नया, आधुनिक और विज्ञान से भरपूर संग्रहालय है, जिसे झांसी स्मार्ट सिटी परियोजना के तहत विकसित किया गया है. रानी लक्ष्मीबाई पार्क में स्थित यह स्पेस म्यूजियम बच्चों, छात्रों, युवाओं और विज्ञान में रुचि रखने वाले हर व्यक्ति के लिए आकर्षण का केंद्र बन चुका है. यहां हर दिन बड़ी संख्या में दर्शक अंतरिक्ष के रहस्यों को समझने आते हैं. इस म्यूजियम में बच्चों की टिकट 25 रुपए और व्यस्कों की टिकट 50 रुपए है.
झांसी स्पेस म्यूजियम को भारतीय दृष्टिकोण से अंतरिक्ष विज्ञान को समझाने के उद्देश्य से तैयार किया गया है. संग्रहालय में प्रवेश करते ही सबसे पहले आपको भारत के महान वैज्ञानिक आर्यभट्ट से परिचय कराया जाता है, जो अंतरिक्ष और खगोल विज्ञान की बुनियादी जानकारी देते हैं. आगे बढ़ने पर आपको ब्रह्मांड की उत्पत्ति, ब्लैक होल, ग्रह-नक्षत्र, तारों की संरचना और यूनिवर्स के काम करने के तरीकों से जुड़े सवालों के जवाब मिलते हैं.
यह म्यूजियम पूरी तरह डिजिटल और इंटरैक्टिव तकनीक पर आधारित है. यहां 3D मॉडल, एनिमेशन और विज़ुअल शो के माध्यम से समुद्र की गहराइयों के रहस्य, ज्वालामुखियों की उत्पत्ति, पृथ्वी के अंदर की गतिविधियाँ और अंतरिक्ष में होने वाली घटनाओं को बेहद रोचक तरीके से समझाया जाता है. इंटरैक्टिव स्क्रीन के ज़रिये दर्शक खुद जानकारी एक्सप्लोर कर सकते हैं, जिससे सीखने की प्रक्रिया और भी दिलचस्प हो जाती है.
स्पेस म्यूजियम का सबसे खास आकर्षण है 20 मिनट की वर्चुअल स्पेस जर्नी । इस अनुभव में आपको पृथ्वी से निकलकर मिल्की-वे गैलेक्सी और उससे भी आगे की यात्रा कराई जाती है। इस दौरान ऐसा महसूस होता है मानो आप वास्तव में अंतरिक्ष में सफर कर रहे हों. यह अनुभव खासतौर पर बच्चों और युवाओं में विज्ञान के प्रति जिज्ञासा और रुचि को बढ़ाता है.
झांसी स्पेस म्यूजियम न केवल मनोरंजन करता है, बल्कि शिक्षा और अनुसंधान की भावना को भी मजबूत करता है. यहां अंतरिक्ष विज्ञान से जुड़ी जटिल बातें आसान भाषा और दृश्य माध्यमों से समझाई जाती हैं, जिससे हर आयु वर्ग के लोग इसे आसानी से समझ सकें.
इस आधुनिक स्पेस म्यूजियम का उद्घाटन वर्ष 2024 में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी द्वारा किया गया था. आज यह म्यूजियम झांसी की पहचान को एक नए, वैज्ञानिक और आधुनिक आयाम से जोड़ रहा है.
स्पेस म्यूजियम के परिसर में ही स्थित है मेजर ध्यानचंद म्यूजियम. मेजर ध्यानचंद म्यूज़ियम झांसी में स्थित एक विशेष खेल संग्रहालय है, जो भारत के महान हॉकी खिलाड़ी मेजर ध्यानचंद के जीवन, उपलब्धियों और खेल-यात्रा को समर्पित है। यह म्यूजियम खास तौर पर हॉकी और भारतीय खेल इतिहास को समझने के लिए बनाया गया है और देश–विदेश से आने वाले खेल प्रेमियों के लिए एक महत्वपूर्ण आकर्षण है। मेजर ध्यानचंद का झांसी से रिश्ता जन्म, शिक्षा और जीवन के शुरुआती वर्षों से जुड़ा हुआ है। मेजर ध्यानचंद का जन्म 29 अगस्त 1905 को उत्तर प्रदेश के प्रयागराज (इलाहाबाद) में हुआ था, लेकिन उनका बचपन और शिक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा झांसी में बीता। उनके पिता सुभेदार सैमेस्वर सिंह ब्रिटिश भारतीय सेना में कार्यरत थे और उनकी पोस्टिंग झांसी में रही, इसी कारण ध्यानचंद का परिवार लंबे समय तक झांसी में रहा।
स्थान
यह संग्रहालय रानी लक्ष्मीबाई पार्क, सिविल लाइन्स, झांसी के भीतर स्थित है। यह स्थान झांसी किला, झांसी का राजकीय संग्रहालय और अन्य प्रमुख पर्यटन स्थलों के काफी नज़दीक है, जिससे पर्यटक एक ही यात्रा में कई ऐतिहासिक और सांस्कृतिक स्थल देख सकते हैं।
मेजर ध्यानचंद म्यूजियम खेल प्रेमियों, छात्रों, शोधकर्ताओं और उन सभी लोगों के लिए है जो भारतीय हॉकी के स्वर्णिम इतिहास और मेजर ध्यानचंद के योगदान को जानना चाहते हैं। यहां आने वाला हर दर्शक न सिर्फ एक खिलाड़ी का जीवन देखता है, बल्कि भारत के खेल गौरव को भी महसूस करता है।
यहां क्या देखें || Who is this museum for?
संग्रहालय में मेजर ध्यानचंद से जुड़ी कई दुर्लभ और महत्वपूर्ण वस्तुएं देखने को मिलती हैं. यहां उनके ओलंपिक पदकों और खेल से जुड़ी व्यक्तिगत वस्तुओं का प्रदर्शन किया गया है.डिजिटल डिस्प्ले और आधुनिक प्रदर्शनी तकनीक के माध्यम से उनकी पूरी खेल-यात्रा को दर्शाया गया है. साइक्लोरामा और इंटरैक्टिव डिस्प्ले के ज़रिये हॉकी के इतिहास और खेल की तकनीक को अनुभवात्मक रूप से समझाया जाता है. बच्चों और युवाओं के लिए होलोग्राफिक सेल्फी ज़ोन और खेल आधारित डिजिटल गेम्स भी उपलब्ध हैं. इसके अलावा नेशनल हॉकी स्टेडियम की एक प्रतिकृति भी यहां देखी जा सकती है, जो दर्शकों को उस दौर की झलक देती है जब मेजर ध्यानचंद ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का नाम रोशन किया.
यह म्यूजियम विश्व का दूसरा और भारत व एशिया का पहला ऐसा संग्रहालय माना जाता है, जो पूरी तरह हॉकी खेल को समर्पित है।
यह म्यूजियम दोपहर 12 बजे से शाम 8 बजे तक खुला रहता है। हर सोमवार को संग्रहालय बंद रहता है. टिकट व्यवस्था लगभग इस प्रकार है—
5 वर्ष तक के बच्चों के लिए प्रवेश निःशुल्क है.
6 से 12 वर्ष के बच्चों के लिए लगभग 25 रुपये का टिकट है.
12 वर्ष से अधिक आयु वालों के लिए टिकट लगभग 50 रुपये है.
स्कूल ग्रुप और विदेशी पर्यटकों के लिए अलग शुल्क निर्धारित है.
विशेष महत्व
मेजर ध्यानचंद को हॉकी का जादूगर कहा जाता है। उन्होंने भारत को कई ओलंपिक स्वर्ण पदक दिलाए और भारतीय हॉकी को विश्व मंच पर पहचान दिलाई. उनका जन्मदिन 29 अगस्त को राष्ट्रीय खेल दिवस के रूप में मनाया जाता है. इस संग्रहालय में उनके जीवन और उपलब्धियों को आधुनिक तकनीक और आकर्षक प्रस्तुति के माध्यम से दिखाया गया है, जिससे युवा पीढ़ी खेलों के प्रति प्रेरित हो सके.
यात्रा सुझाव
चूंकि यह संग्रहालय रानी लक्ष्मीबाई पार्क के भीतर स्थित है, इसलिए यहां आने वाले पर्यटक झांसी का राजकीय संग्रहालय, रानी लक्ष्मीबाई की प्रतिमा और झांसी किला भी एक ही दिन में आसानी से देख सकते हैं. यह म्यूजियम झांसी की ऐतिहासिक और खेल विरासत को समझने के लिए एक आदर्श स्थान है.
रानी महल झांसी का एक ऐतिहासिक महल है जिसे रानी लक्ष्मीबाई की अवधि के साथ गहरा संबंध मिला है। रानी महल झांसी के किले से 700 मीटर की दूरी पर स्थित है. यह महल पुराने शहर में स्थित है और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम तथा 1857 के विद्रोह से जुड़ी कई महत्वपूर्ण घटनाओं का साक्षी रहा है.
इतिहास और महत्व || History and significance
निर्माण: रानी महल का निर्माण रघुनाथ-II ने 18वीं सदी (लगभग 1769 – 1796) में करवाया था.
रानी लक्ष्मीबाई का आवास: 1853 से 1857 तक रानी लक्ष्मीबाई इसी महल में रहती थीं, जब अंग्रेजों ने झांसी को अपने “डॉक्ट्रिन ऑफ़ लैप्स” के तहत कब्ज़ा कर लिया था.
स्वतंत्रता संग्राम: 1857 के विद्रोह के समय यह महल योजना, बैठकें और रणनीति के केंद्र के रूप में इस्तेमाल हुआ.
आर्किटेक्चर (स्थापत्य)
रानी महल एक दो-मंज़िला, खुला-आंगन वाला महल है जिसमें कई आकर्षक बिंदु हैं:
म्यूज़ियम और संग्रह || Museum and Collection
आज रानी महल को एक ऐतिहासिक संग्रहालय में बदला गया है:
पर्यटन और यात्रा जानकारी || Tourism and travel information
स्थान: रानी महल मनिक चौक, झांसी नगर में स्थित है और यह झांसी किले से कुछ ही दूरी पर है।
खुला समय: लगभग सुबह 10:00 बजे से शाम 5:00 बजे तक। रविवार और सप्ताह के दिन खुला रहता है; सोमवार को बंद हो सकता है।
प्रवेश शुल्क: भारतीयों के लिए ₹25 के बीच, और विदेशी पर्यटकों के लिए अधिक (लगभग ₹200) शुल्क लागू होता है।
क्यों देखें?
यात्रा सुझाव || Travel Tips
रानी महल को आप झांसी किला, राजकीय संग्रहालय और मेजर ध्यानचंद म्यूज़ियम के साथ एक ही दिन में देख सकते हैं। यह झांसी के ऐतिहासिक प्रमुख आकर्षणों में से एक है।
दाऊ के समोसे || Dau’s Samosas
अगर यात्रा करते करते आपको भूख लग गई हो, तो आप आ जाइए रानी महल से 400 मीटर दूर छनियापुरा में स्थित दाऊ के समोसे की दुकान पर… झांसी में दाऊ के समोसे अपने आप में एक छोटा लेकिन बेहद प्रसिद्ध और लोकप्रिय स्ट्रीट फूड स्टॉल है। यहाँ आने वाले लोग झांसी के असली और स्वादिष्ट समोसे का अनुभव लेने के लिए आते हैं। यह स्थान स्थानीय लोगों और पर्यटकों के बीच दोनों ही तरह से जाना जाता है। यहां आपको रायते और कढ़ी में समोसे दिए जाते हैं…
सैयर दरवाज़ा, झांसी — इतिहास और महत्व || Sair Gate, Jhansi — History and Significance
दाऊ के समोसे खाकर जब आप आगे बढ़ते हैं, तो इसी संकरे रास्ते पर 300 मीटर की दूरी पर स्थित है सैयर दरवाज़ा. सैयर दरवाज़ा झांसी शहर का एक प्राचीन और ऐतिहासिक प्रवेश द्वार है, जो झांसी की रियासत और किलेबंदी वाले नगर-विन्यास का अहम हिस्सा रहा है। यह दरवाज़ा उस दौर की याद दिलाता है जब झांसी चारों ओर से मजबूत दीवारों और दरवाज़ों से सुरक्षित एक संगठित नगरी थी।
इतिहास || History
सैयर दरवाज़े का निर्माण बुंदेला शासकों के समय में किया गया माना जाता है। बाद में मराठा काल, विशेष रूप से झांसी के शासक राजा गंगाधर राव और रानी लक्ष्मीबाई के समय यह दरवाज़ा शहर की सुरक्षा व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था।
1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान झांसी जब अंग्रेज़ी सेना के निशाने पर था, तब सैयर दरवाज़ा भी उन मार्गों में शामिल था जहाँ से शहर में आवागमन और सैन्य गतिविधियाँ नियंत्रित की जाती थीं। यह दरवाज़ा झांसी के आम जनजीवन, व्यापार और सैनिक आवक-जावक का साक्षी रहा है।
गंगाधर राव की छतरी || Gangadhar Rao’s Umbrella
सैयर गेट से ढाई किलोमीटर दूर लक्ष्मी ताल के नजदीक बनी हुई है गंगाधर राव की छतरी. गंगाधर राव की छतरी झांसी के मराठा कालीन इतिहास से जुड़ा एक महत्वपूर्ण स्मारक है, जो झांसी के अंतिम शासक राजा गंगाधर राव नेवलकर की स्मृति में बनाया गया था। राजा गंगाधर राव का निधन 21 नवम्बर 1853 को हुआ था। उनकी मृत्यु के बाद झांसी के इतिहास में एक बड़ा मोड़ आया, क्योंकि इसी घटना के बाद अंग्रेजों ने “डॉक्ट्रिन ऑफ लैप्स” लागू कर झांसी को अपने अधीन करने का प्रयास किया। गंगाधर राव की मृत्यु के कुछ ही समय बाद, उनकी स्मृति में यह छतरी बनवाई गई, जिसे सामान्यतः 1853 के बाद, 19वीं सदी के मध्य का स्मारक माना जाता है। ऐतिहासिक स्रोतों में इसके निर्माण का सटीक वर्ष स्पष्ट रूप से दर्ज नहीं है, लेकिन यह तय माना जाता है कि इसका निर्माण रानी लक्ष्मीबाई के काल में, उनके पति की स्मृति को चिरस्थायी बनाने के उद्देश्य से हुआ।
भारतीय स्थापत्य परंपरा में छतरी एक विशेष प्रकार की स्मारक संरचना होती है, जिसे किसी राजा, शासक या प्रतिष्ठित व्यक्ति की समाधि या स्मृति स्थल के रूप में बनाया जाता है। छतरी प्रायः ऊँचे चबूतरे पर बनाई जाती है, जिसमें पत्थर के खंभों पर टिकी गुंबदनुमा छत होती है। उत्तर और मध्य भारत, विशेषकर राजस्थान, मालवा, बुंदेलखंड और मराठा क्षेत्रों में छतरियाँ स्मारक स्थापत्य का एक अहम हिस्सा रही हैं। ये संरचनाएँ मृत्यु के बाद सम्मान, श्रद्धा और स्मरण का प्रतीक मानी जाती हैं, न कि केवल दफन या दाह स्थल।
गंगाधर राव की छतरी भी मराठा और बुंदेलखंडी स्थापत्य शैली का सुंदर उदाहरण है। इसका निर्माण अपेक्षाकृत सादगीपूर्ण है, लेकिन इसमें राजसी गरिमा स्पष्ट दिखाई देती है। पत्थर के मजबूत स्तंभ, संतुलित गुंबद और ऊँचा चबूतरा इसे एक स्मारकीय रूप देते हैं। यह छतरी केवल एक वास्तु संरचना नहीं है, बल्कि उस ऐतिहासिक दौर की मूक साक्षी है, जब झांसी एक स्वतंत्र रियासत थी और रानी लक्ष्मीबाई एक साधारण विधवा नहीं, बल्कि भविष्य के संघर्ष की तैयारी कर रही थीं।
ऐतिहासिक दृष्टि से गंगाधर राव की छतरी का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है, क्योंकि यही वह बिंदु है जहाँ से रानी लक्ष्मीबाई के संघर्ष की कहानी वास्तव में शुरू होती है. पति की मृत्यु, दत्तक पुत्र दामोदर राव को उत्तराधिकारी मानने से अंग्रेजों का इंकार और झांसी पर अधिकार करने का प्रयास—इन सभी घटनाओं की जड़ इसी काल में है। इस तरह, गंगाधर राव की छतरी झांसी के इतिहास में केवल एक स्मारक नहीं, बल्कि 1857 के स्वतंत्रता संग्राम की पृष्ठभूमि को समझने की एक अहम कड़ी है।
लक्ष्मी मंदिर || Laxmi Temple
गंगाधर राव की छतरी के ठीक बाद स्थित लक्ष्मी जी का ऐतिहासिक मंदिर झांसी के इतिहास, आस्था और रानी लक्ष्मीबाई के जीवन से गहराई से जुड़ा हुआ स्थल माना जाता है। श्री लक्ष्मी मंदिर केवल एक धार्मिक स्थान नहीं है, बल्कि झांसी रियासत के उस कठिन दौर की स्मृति भी है, जब राजा गंगाधर राव की मृत्यु के बाद रानी लक्ष्मीबाई पर व्यक्तिगत शोक और राजनीतिक संकट दोनों एक साथ आ पड़े थे। मान्यता है कि पति के निधन के बाद रानी लक्ष्मीबाई यहाँ नियमित रूप से पूजा-अर्चना करने आती थीं और माँ लक्ष्मी से झांसी की रक्षा, राज्य की समृद्धि और न्याय के लिए शक्ति मांगती थीं।
यह मंदिर माँ लक्ष्मी, अर्थात धन, वैभव और सौभाग्य की देवी को समर्पित है। मराठा परंपरा में लक्ष्मी पूजा का विशेष महत्व रहा है और शासक वर्ग राज्य की स्थिरता और समृद्धि के लिए माँ लक्ष्मी की आराधना को अनिवार्य मानता था। इसी परंपरा के तहत गंगाधर राव की छतरी के समीप इस मंदिर की स्थापना या इसका विशेष महत्व विकसित हुआ। माना जाता है कि यह स्थान शाही परिवार के लिए आध्यात्मिक संबल का केंद्र था, जहाँ राज्य से जुड़े महत्वपूर्ण निर्णयों से पहले पूजा की जाती थी।
स्थापत्य की दृष्टि से यह मंदिर सरल लेकिन गरिमामय है। इसमें मराठा और स्थानीय बुंदेलखंडी शैली की झलक मिलती है। मंदिर का आकार बहुत विशाल नहीं है, लेकिन इसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि इसे विशिष्ट बनाती है। गर्भगृह में स्थापित माँ लक्ष्मी की प्रतिमा श्रद्धा और विश्वास का केंद्र रही है। आसपास का वातावरण आज भी शांति और गंभीरता का अनुभव कराता है, मानो यह स्थान अतीत की घटनाओं को मौन रूप से सहेजे हुए हो।
ऐतिहासिक रूप से यह मंदिर इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि गंगाधर राव की मृत्यु के बाद यहीं से रानी लक्ष्मीबाई के जीवन का नया अध्याय शुरू होता है। एक ओर वे पति के वियोग में थीं, दूसरी ओर अंग्रेजों द्वारा झांसी हड़पने की साजिश चल रही थी। ऐसे समय में यह लक्ष्मी मंदिर रानी के लिए आस्था, धैर्य और मानसिक शक्ति का केंद्र बना। बाद में यही रानी लक्ष्मीबाई अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध संघर्ष का प्रतीक बनीं।
आज यह मंदिर और गंगाधर राव की छतरी मिलकर झांसी के इतिहास की एक भावनात्मक और आध्यात्मिक श्रृंखला बनाते हैं—जहाँ एक ओर शोक और स्मृति है, तो दूसरी ओर विश्वास और संकल्प। झांसी आने वाला कोई भी इतिहास-प्रेमी यदि इस स्थान पर ठहरकर इन दोनों स्मारकों को देखता है, तो उसे 1857 से पहले की झांसी की पीड़ा, शक्ति और संघर्ष की भावना को गहराई से समझने का अवसर मिलता है।
श्री लक्ष्मी मंदिर और गंगाधर राव की छतरी के बीच में बना है नवग्रह मंदिर. आप इस मंदिर के प्रांगण में भी कुछ वक्त बिता सकते हैं. पीछे लक्ष्मी ताल स्थित है और यहां पर गणपति और दुर्गा प्रतिमाओं का विसर्जन किया जाता है.
पहुज डैम || Pahuj Dam
लक्ष्मी मंदिर और गंगाधर राव की छतरी से 11 किलोमीटर से कुछ ज्यादा दूरी पर स्थित है पहुज डैम. ये डैम रेलवे क्रॉसिंग के नजदीक है, इसलिए यहां आपको संभलकर आना होगा. पहुज डैम, झांसी जिले का एक महत्वपूर्ण जलस्रोत और शांत प्राकृतिक स्थल है, जो पहुज नदी पर बनाया गया है. यह डैम झांसी क्षेत्र की सिंचाई व्यवस्था, जल संरक्षण और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में अहम भूमिका निभाता है. शहर की ऐतिहासिक पहचान के बीच पहुझ (पहुज) डैम एक ऐसा स्थान है, जो झांसी के प्राकृतिक पक्ष को सामने लाता है और लोगों को भीड़-भाड़ से दूर शांति का अनुभव कराता है.
पहुज नदी बुंदेलखंड क्षेत्र की एक प्रमुख नदी है, जो मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के हिस्सों से होकर बहती है. इसी नदी पर झांसी के पास बनाए गए पहुज डैम का मुख्य उद्देश्य सिंचाई रहा है. बुंदेलखंड का क्षेत्र वर्षा की अनिश्चितता और जल संकट के लिए जाना जाता है, ऐसे में यह डैम आसपास के गांवों और कृषि भूमि के लिए जीवनरेखा की तरह काम करता है. इसके माध्यम से खेतों तक पानी पहुंचाया जाता है, जिससे फसलों की पैदावार और किसानों की आजीविका को सहारा मिलता है.
भौगोलिक और पर्यावरणीय दृष्टि से पहुज डैम का क्षेत्र काफी आकर्षक है. चारों ओर फैला जल, उसके किनारे की हरियाली और दूर तक दिखता खुला आकाश इसे एक प्राकृतिक विश्राम स्थल बना देता है. बरसात और सर्दियों के मौसम में यहां का दृश्य विशेष रूप से सुंदर हो जाता है, जब जलस्तर बढ़ा हुआ होता है और आसपास का इलाका हरियाली से भर जाता है. स्थानीय लोग यहां अक्सर सुबह-शाम घूमने, बैठने और प्रकृति के बीच समय बिताने आते हैं.
हालाँकि पहुज डैम किसी बड़े पर्यटन स्थल के रूप में विकसित नहीं हुआ है, फिर भी यह स्थानीय पर्यटन और ग्रामीण जीवन से गहराई से जुड़ा हुआ है। यह स्थान झांसी के इतिहास से जुड़े किलों और स्मारकों से अलग, एक शांत और साधारण अनुभव देता है, जहाँ बुंदेलखंड की असली ग्रामीण और प्राकृतिक झलक दिखाई देती है। फोटोग्राफी और प्रकृति प्रेमियों के लिए यह जगह खास तौर पर आकर्षक हो सकती है।
कुल मिलाकर, पहुज डैम झांसी का वह पक्ष दिखाता है जहाँ इतिहास के साथ-साथ जीवन और प्रकृति का संतुलन दिखाई देता है। यह डैम न सिर्फ पानी का स्रोत है, बल्कि बुंदेलखंड की जिजीविषा और जल-संरक्षण की आवश्यकता को भी दर्शाता है। झांसी आने वाला कोई भी व्यक्ति यदि शहर की भीड़ और ऐतिहासिक स्थलों से हटकर कुछ समय प्रकृति के बीच बिताना चाहता है, तो पहुज डैम उसके लिए एक सुकून भरा अनुभव बन सकता है।
अगली सुबह हम पहुंचे सिद्धेश्वर महादेव मंदिर. झांसी के राजकीय इंटर कॉलेज के पास स्थित प्राचीनतम सिद्धेश्वर मंदिर की महिमा भी भोलेनाथ की महिमा अपरंपार है.भगवान शिव का यह मंदिर ना सिर्फ झांसी बल्कि पूरे बुंदेलखंड में प्रसिद्ध है.
सिद्धेश्वर महादेव मंदिर, झांसी शहर के प्राचीन और श्रद्धेय शिव मंदिरों में गिना जाता है। यह मंदिर केवल पूजा-स्थल ही नहीं, बल्कि झांसी के धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक जीवन का भी महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार यह मंदिर झांसी नगर के बसने से भी पहले अस्तित्व में था और सदियों से यहाँ निरंतर शिव-पूजा होती आ रही है।
यह मंदिर भगवान शिव के “सिद्धेश्वर” स्वरूप को समर्पित है। “सिद्धेश्वर” का अर्थ होता है—सिद्धियां प्रदान करने वाले शिव. मान्यता है कि यहाँ सच्चे मन से की गई आराधना से भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं. इसी कारण यह मंदिर विशेष रूप से संकट, रोग, परीक्षा, विवाह और संतान-कामना से जुड़े भक्तों की आस्था का केंद्र रहा है. सावन मास, महाशिवरात्रि और प्रदोष व्रत पर यहाँ विशेष भीड़ देखी जाती है.
स्थापत्य की दृष्टि से सिद्धेश्वर महादेव मंदिर (Siddheshwar Mahadev Temple) सरल लेकिन प्राचीन शैली का प्रतीक है. मंदिर का गर्भगृह अपेक्षाकृत छोटा है, जहां स्वयंभू शिवलिंग स्थापित माना जाता है. यही स्वयंभू स्वरूप इसकी प्राचीनता और धार्मिक महत्व को और बढ़ा देता है। मंदिर परिसर में पारंपरिक शिव मंदिरों की तरह नंदी, जलाधारी और पूजा-अनुष्ठान के लिए निर्धारित स्थान भी हैं. समय-समय पर मरम्मत और पुनर्निर्माण के बावजूद इसकी मूल आध्यात्मिक पहचान बनी हुई है.
ऐतिहासिक रूप से यह मंदिर झांसी के बुंदेला और मराठा काल से जुड़ा माना जाता है. कहा जाता है कि झांसी के शासक और आम नागरिक, दोनों ही यहां नियमित दर्शन के लिए आते थे. रानी लक्ष्मीबाई (Rani Lakshmibai) के काल में भी यह मंदिर नगर के प्रमुख शिवालयों में शामिल था, जहां धार्मिक अनुष्ठान और पर्वों का आयोजन होता था. इस प्रकार यह मंदिर झांसी के राजकीय और जनजीवन—दोनों का साक्षी रहा है.
आज सिद्धेश्वर महादेव मंदिर झांसीवासियों के लिए आस्था, परंपरा और निरंतरता का प्रतीक है. आधुनिक शहर के बीच स्थित होने के बावजूद मंदिर का वातावरण भक्तिमय और शांत रहता है. यह स्थान यह दर्शाता है कि झांसी केवल वीरता और संघर्ष की भूमि ही नहीं, बल्कि गहरी धार्मिक चेतना और आध्यात्मिक विरासत वाला नगर भी है. झांसी आने वाला कोई भी व्यक्ति यदि शहर की आत्मा को समझना चाहता है, तो सिद्धेश्वर महादेव मंदिर का दर्शन उसके लिए एक महत्वपूर्ण अनुभव बन सकता है.
झांसी पहुंचने का सबसे अच्छा तरीका रेलवे है क्योंकि भारतीय रेलवे की व्यापक कनेक्टिविटी यात्रियों को देश के लगभग हर कोने से झांसी तक आने की सुविधा देती है. सी का अपना रेलवे हेड – झांसी जंक्शन रेलवे स्टेशन है, जो दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, बैंगलोर और कोलकाता जैसी प्रमुख शहरों से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है. स्टेशन पहुंचने के बाद आप टैक्सी किराए पर ले सकते हैं या बस पकड़कर अपने जगह तक जा सकते हैं.
सड़क मार्ग से झांसी पहुंचना भी आसान ऑप्शन है, खासकर उन लोगों के लिए जो पड़ोसी शहरों और राज्यों से यात्रा कर रहे हैं। खजुराहो, उदयपुर, कानपुर, भोपाल, जयपुर, इंदौर और ग्वालियर जैसी पड़ोसी जगहों से नियमित रूप से निजी और सरकारी बसें चलती हैं। इसके अलावा, इच्छुक यात्री स्वयं ड्राइव करके भी झांसी पहुंच सकते हैं.
झांसी का नजदीकी हवाई मार्ग ग्वालियर एयरपोर्ट है. एयरपोर्ट का नाम है Rajmata Vijayaraje Scindia Airport Gwalior. ग्वालियर एयरपोर्ट और झांसी के बीच की दूरी लगभग 112 किमी है. मध्य प्रदेश के चार प्रमुख एयरपोर्टों में से एक होने के कारण ग्वालियर एयरपोर्ट से देश के लगभग सभी बड़े शहरों जैसे दिल्ली, मुंबई, चेन्नई और कोलकाता के लिए उड़ानों की सुविधा उपलब्ध है। एयरपोर्ट से झांसी पहुँचने के लिए टैक्सी सेवाओं का उपयोग किया जा सकता है
झांसी में ठहरने के कई ऑप्शन अवेलेबल हैं. हम जहां रुके वो जगह थी द लोटस. ये होटल ओरछा के नजदीक है. यहां का स्टाफ भी बेहतरीन है और कमरे भी शानदार हैं. आप इस होटल को भी ऑप्शंस में शामिल कर सकते हैं. दोस्तों अगर बात करें झांसी में होने वाले खर्च की, तो यहां आपको एक अच्छा होटल 15 सौ रुपए प्रति नाइट के शुल्क पर मिल जाता है, ऑनलाइन रेट में थोड़ा अंतर दिखाई दे सकता है. यानि ऑनलाइन रेट थोड़ा ज्यादा हो सकता है. आप यहां एक टाइम में यानि अगर बात करें लंच की, तो 400 रुपए में दो लोग अच्छे से लंच कर सकते हैं. यहां ऑटो, ई रिक्शा के लिए ज्यादा शुल्क नहीं लगता है, और किसी भी स्थल की सबसे बड़ी बात वहां के लोग होते हैं, तो हम बता दें कि यहां के लोग बहुत ही सपोर्टिव और टूरिस्ट फ्रेंडली हैं.
और अगर आपको झांसी, ओरछा और दतिया की यात्रा में वाहन की जरूरत हो या कोई और भी मदद चाहिए हो तो आप बेफिक्र होकर रविंद्र यादव जी से संपर्क कर सकते हैं. ये एक बेहतरीन शख्स हैं. इनका नंबर है- 7007595898.
और दोस्तों… इस तरह हमारी झांसी की यात्रा खत्म होती है—जहां इतिहास, साहस, संस्कृति और स्वाद सभी का संगम देखने को मिलता है।
झांसी हमें याद दिलाता है कि वीरता केवल युद्ध में नहीं, बल्कि हर उस कहानी में भी होती है, जो पीढ़ियों तक प्रेरणा देती है।
तो अगली बार जब आप उत्तर प्रदेश आए, झांसी की इन गलियों, किलों और स्मारकों की गहराई में खो जाइए…
क्योंकि यहाँ हर पत्थर, हर मंदिर और हर स्मारक, हमें हमारे अतीत की कहानियां सुनाता है।”
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