17 साल बाद कांचीपुरम के एकाम्बरणाथर मंदिर में महाकुंभाभिषेक सम्पन्न, हजारों श्रद्धालु बने साक्षी
कांचीपुरम के प्रसिद्ध एकाम्बरणाथर मंदिर में आज 17 साल बाद महाकुंभाभिषेक की पवित्र परंपरा सम्पन्न हुई। इससे पहले यह पूजा वर्ष 2008 में हुई थी। हाल ही में केरल के श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर में भी जून 2025 में महाकुंभाभिषेक सम्पन्न हुआ था, जिसके बाद अब यह विशिष्ट धार्मिक अनुष्ठान कांचीपुरम में श्रद्धालुओं का केंद्र बना हुआ है।
एकाम्बरणाथर मंदिर पंचभूत स्थलों में से एक है और इसे ‘पृथ्वी तत्व’ का प्रतिनिधि माना जाता है। पिछले कई वर्षों से मंदिर में मरम्मत और संरक्षण का कार्य जारी था, जिसमें लगभग ₹29 करोड़ खर्च किए गए। खास बात यह है कि सभी संरचनात्मक मरम्मत कार्य मंदिर की मूल और प्राचीन शैली को बिना बदले किए गए।
महाकुंभाभिषेक की तैयारियां कई दिनों पहले ही शुरू हो गई थीं। भारत की विभिन्न पवित्र नदियों से जल लाकर यागशाला में कलशों (Kalasams) में रखा गया। वहीं वैदिक विधियों के अनुसार विशेष हवन, मंत्रोच्चारण और पूजा की गई।
मंदिरों में समय-समय पर की जाने वाली यह अत्यंत पवित्र और दुर्लभ पूजा उस क्षण को दर्शाती है जब मंदिर की पूरी संरचना मानो फिर से जीवंत हो उठती है। इसे मंदिर का पुनर्संस्कार भी कहा जाता है और यह तभी होता है जब नया मंदिर बनाया जाए या पुराने मंदिर का जीर्णोद्धार किया गया हो।
शुद्धिकरण और तैयारी
वेदज्ञ पंडितों द्वारा वेद पारायण, मंत्रोच्चारण और जड़ी-बूटियों से पूजा की जाती है।
कलशों में पवित्र जल, चंदन, औषधियां और अन्य शुभ सामग्रियां रखी जाती हैं।
देव ऊर्जा का आह्वान
हवन, मंत्रों और आगम ग्रंथों के पाठ के माध्यम से देवत्व ऊर्जा को कलशों में आहूत किया जाता है।
कई बार “कलाकार्शनम्” नामक रीति भी होती है, जिसमें मंदिर देवता की शक्ति को कलश में स्थानांतरित किया जाता है।
अंतिम अभिषेक — सबसे पवित्र क्षण
शुभ मुहूर्त में मंदिर के गोपुरम, विमाना, कलश और मुख्य गर्भगृह पर इन पवित्र कलशों का जल चढ़ाया जाता है।
इसी क्षण मंदिर को पुनः दिव्य ऊर्जा से संपन्न माना जाता है।
इस अनुष्ठान को देखने और इसका पुण्य प्राप्त करने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु मंदिर पहुंचे। वातावरण मंत्रों, शंखध्वनि और भक्ति से गूँज उठा।
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