एक रात ऋषिकेश में बिताने के बाद हम कनातल ( kanatal tour blog ) पहुंचे थे. ऋषिकेश से आगे पहाड़ के किसी भी इलाके की ये मेरी पहली यात्रा थी
Kanatal Tour Blog – एक रात ऋषिकेश में बिताने के बाद हम कनातल ( kanatal tour blog ) पहुंचे थे. ऋषिकेश से आगे पहाड़ के किसी भी इलाके की ये मेरी पहली यात्रा थी. इस kanatal tour blog में, आप हम दोस्तों की यात्रा की जानकारी पढ़ेंगे और साथ ही जानेंगे कि कनातल सहित किसी भी टूरिस्ट डेस्टिनेशन में कैसे आप कम बजट में स्टे पा सकते हैं. kanatal tour blog मेरी पहली पहाड़ी यात्रा का अंश है. इस ब्ल़ॉग ( kanatal tour blog ) में आप कनातल स्टे का मेरा एक्सपीरियंस पढ़ेंगे. ऋषिकेश से आगे बढ़ते ही मैं एक अलग अहसास को अनुभव कर पा रहा था. देवभूमि में ऐसा लग रहा जैसे पहाड़ आपकी मां है और आप उसकी गोद में झूला झूल रहे हों. पहली बार मैंने देखा कि जिस उत्तराखंड में पहाड़ों पर हादसे की खबरें मैं पढ़ता सुनता रहता हूं, वहां की सड़के उम्मीद से ज्यादा बेहतर हैं. मैं पहली बार पहाड़ के घुमावदार रास्तों पर चीर के पेड़ों के जंगलों से गुजर रहा था.
कनातल ( kanatal tour blog ) पहुंचने के लिए, हम गाने सुनते, गाते, रुकते, खाते पीते चले जा रहे थे. मैं एक प्रेम का एहसास स्वतः पैदा कर पा रहा था, जो मेरे और पहाड़ के बीच पैदा हो रहा था. रास्ते में गहरी खाइयों को देखकर मन में डर भी पैदा हुआ लेकिन स्नेह के जागृत होने से वह डर भी पता नहीं कब छूमंतर हो गया. कनातल में हम दोपहर के लगभग 2 बजे पहुंचे. रास्ते में चंबा, नौंगाव के पास के दिलचस्प नजारे देखने लायक थे. सीढ़ीनुमा खेत, एंडवेंचर स्पोर्ट्स एक्टिविटी, स्थानीय लोग, घर सब कुछ ऐसा था कि आप घंटों उनके साथ बिता सकते थे.
हम कनातल ( kanatal tour blog ) में चंबा-मसूरी रोड पर एक जगह रुके. कनातल समुद्री तल से 2590 मीटर की ऊंचाई पर है. यहां क्लब महिंद्रा का गेस्ट हाउस था और उसके ठीक सामने था एक घना जंगल. यहां लोग कैंपिंग के लिए आते थे. वन विभाग के इस जंगल में जाने के लिए आपको टिकट लेना होता है. हमने भी इस जंगल में प्रवेश किया. दिल्ली से दूर इस जगह पर हम चारों तरफ पेड़ से ही घिरे हुए थे. ये भाव हैरत से भरा था. कहीं, पेड़ों से गिरकर पुल का रूप लिया हुआ था. कहीं पर ऊंचाई से छनकर आ रही सूरज की किरणें आपकों किसी फिल्मी गाने की याद दिला रही थीं. लेकिन अचानक से यहां ठंड बढ़ गई. हमने सोचा कि अचानक से ऐसा हुआ क्यों? घड़ी में देखा तो दोपहर के साढ़े 3 बजे थे.
हम फटाफट बाहर की तरफ भागे. स्थानीय लोगों ने बताया कि जरा सी सूरज की रोशनी कम हुई नहीं कि यहां ठंड बढ़ जाती है. लोग तो वहां मई के महीने में भी भारी जैकेट, कोट और शॉल ओढ़कर काम में जुटे हुए थे. ठंड के अहसास से हम में से कुछ लोगों को याद आया कि उन्होंने ठंड के कपड़े तो कैरी ही नहीं किए. मई के महीने में ऐसी ठंड का उन्हें अंदाजा तक नहीं था.हम सभी ने आपस में जुगाड़ कर एक दूसरे संग कपड़े शेयर किए. किसी ने चादर ओढ़ी तो किसी ने 2-2 जींस पहन लीं. हम सभी अब भूखे थे. हमने ऐग मैगी और पराठे ऑर्डर किए. ऑर्डर देकर हम रेस्टोरेंट से बाहर बैठकर धूप सेंकने लगे. धूप सेंकते सेंकते भी तेज हवाएं ऐसी चलीं कि ठंड और बढ़ गई. हम भागकर अंदर आए. अंदर आने के बाद हम सभी ने भरपेट खाना खाया.
अब एक बड़ी चुनौती हमारे सामने थी. सवाल ठहरने का मुंह बाए खड़ा था. सामने क्लब महिंद्रा का गेस्ट हाउस था. लेकिन वहां ठहरने का बजट हमारा था नहीं. मैंने अपने परिचित पुंढीर जी को फोन मिलाया. पुंढीर जी ऋषिकेश में बीटीसी सदस्य हैं. उन्होंने बताया कि तकरीबन 10 किलोमीटर पीछे एक बाजार है, हमें वहां ठहरने के लिए कमरा मिल जाएगा. मैंने साथियों को इसकी जानकारी दी. सभी सामान पैक कर वहां जाने की तैयारी करने लगे. इतने में राकेश-विपिन, जो मूलतः गढ़वाल के ही हैं, उन्होंने स्थानीय दुकानदा रों से होम स्टे के बारे में जानकारी लेनी शुरू कर दी थी. दोनों दौड़े दौड़े आए और बताया कि एक दुकानदार, जिसके होटेल से हमने खाना खाया था, उसने बताया कि उसके दो कमरे पीछे नए बने हैं.
हम चाहें तो उसमें रह सकते हैं. हमें इसके लिए किराया सिर्फ ढाई सौ रुपए देना होगा, यानि दो कमरों के 500. राकेश-विपिन की ये बात सुनकर हम सभी के चेहरे खिल गए. लेकिन क्योंकि हमारे साथ एक लड़की भी थी इसलिए हमने पहले कमरे को देखने की शर्त रखी. दुकानदार, जो दिखने में बिल्कुल मेरे बड़े पिताजी यानि ताऊ की तरह था, वह हमें घर के पीछे बने दो कमरों में लेकर गया. कमरे सचमुच नए बने थे और रंग रोगन भी अभी हुआ ही था. वॉशरूम भी अच्छी अवस्था में था. घर में महिलाएं भी बहुत थीं. वो दरअसल, एक कुनबे के लोग थे, जो गांव से आकर यहां रोजी रोटी के लिए बसे थे. महिलाओं से हमने 2 शॉल भी मांगी और उन्होंने बेझिझक हमें वो दे दी. घर के बच्चे बेहद प्यारे थे. सभी बेहद प्यारे… आंखे नीली, गाल लाल…
हमने 500 रुपये की पेमेंट तुरंत कर दी और सामान लेकर कमरे में रख दिया. वो कमरा कुछ ऐसा था जैसा आप फिल्मों में देखते होंगे. सामने पहाड़ों की श्रृंखला और नीचे दूर तलक दिखाई देने वाली गहराई. बस बनावट से वो एक छोटे घर जैसा था, वर्ना होटलों को मात दे रहा था. एक कमरे में इशिता और बाकी में हम 5 रुके. ड्राइवर ने गाड़ी में ही सोने का फैसला लिया. कुछ साथियों ने, जो नॉन वेज के दीवाने हैं, चिकन खाने की सोची. वह पास की दुकान से मीट ले आए और वहीं घर में उसे बनवाया. मैं क्योंकि वेजिटेरियन था, इसलिए मैंने वेज खाना ही खाया. मुझे देखकर कई साथी कहने लगे कि तुम कभी फॉरेन कंट्रीज में मत जाना. मैंने सवाल किया क्यों? उन्होंने कहा कि वहां तुम्हें खाने के लिए वेज नहीं मिलेगा और मिलेगा तो भी इतना महंगा कि खा नहीं पाओगे.
मैंने तपाक से जवाब दिया कि मैं दाल चावल लेकर जाऊंगा और वहां पका लूंगा. सभी ने ये सुनकर ठहाकों के साथ मेरे हाथ जोड़ लिए… कनातल ( kanatal tour blog ) में हमने 2 मई 2017 की रात बिताई. रात को पहाड़ दिन की खामोशी से ज्यादा चुप लगता है. कहीं कहीं रोशनी दिखाई देती है. मन में सवाल -उठता है कि आखिर कैसे इन घरों में लोग रहते होंगे. एक एक सामान, स्कूली शिक्षा, कॉलेज के लिए कितनी मेहनत ये लोग करते होंगे. पानी की समस्या सो अलग. फिर भी कितने मृदुभाषी, स्नेहता से भरे प्यारे लोग हैं ये…? दिल्ली में तो सब एक बटन पर हाजिर रहता है, यहां की जिंदगी कितनी अलग है.
हम छत पर तस्वीरें क्लिक करने लगे थे. आपस में बात करते करते हम सभी अंदर आ गए. अंदर गद्दों में दुपककर हम बीते दिनों की याद करने लगे. कॉलेज, फिर प्रोफेशनल लाइफ और आज ये साथ में हो रही पहली यात्रा… गिले शिकवे भी सामने आए लेकिन दोस्ती उनपर हावी हो गई. पहाड़ पर मई के महीने में ठिठुरकर बिताई गई ये रात वाकई अतुलनीय थी.
(लेखक दिल्ली में पत्रकार हैं)
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