Mathura – Vrindavan Tour Blog : Banke Bihari Mandir के पास ऐसा था मेरा अनुभव

Mathura – Vrindavan Tour Blog – मथुरा ( mathura ) भारत का एक आध्यात्मिक शहर ( Spritual City ) है. इस ब्लॉग ( Tour Blog ) में, मैं आपको मथुरा – वृंदावन की अपनी यात्रा ( Mathura – Vrindavan Tour Blog ) के अनुभव के बारे में बताउंगा. यूं तो, मथुरा ( mathura ) दिल्ली के बेहद पास ही है लेकिन जब दो छोटे बच्चे आपके साथ हों, तो ये यात्रा भी बहुत बड़ी जैसी लगती है. मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ. मथुरा – वृंदावन की मेरी इस यात्रा ( Mathura – Vrindavan Tour ) में, मेरे साथ वाइफ के अलावा, 5 साल की मेरी बेटी और 10 महीने का मेरा बेटा भी था. इस यात्रा में, मेरे साथ कुछ ऐसा हुआ जिसकी मैंने कल्पना भी नहीं की थी. मेरे इस ब्लॉग ( Mathura – Vrindavan Tour Blog ) को पढ़कर शायद आपको अपनी यात्रा के लिए काफी मदद मिले. तो, आइए शुरू करते हैं मथुरा की यात्रा के इस ब्लॉग ( Mathura – Vrindavan Tour Blog ) को

मैंने दो वीक ऑफ को ध्यान में रखते हुए मथुरा की यात्रा ( Mathura – Vrindavan Tour ) को प्लान किया था. ये 2020 में, विदा हो रही सर्दियों का वक्त था. मार्च के पहले हफ्ते में, हमने मथुरा की यात्रा ( Mathura – Vrindavan Tour ) को प्लान किया था. सुबह की ताज एक्सप्रेस ने हमें समय से वहां पहुंचा दिया. मथुरा जंक्शन पर ही, हमने घर से पैक करके लाए खाने को खाकर एक तरह से ब्रेकफास्ट किया. अब ब्रेकफास्ट करके मथुरा रेलवे स्टेशन से बाहर आए और वृंदावन के लिए ऑटो लिया.

वृंदावन में, हमने हरमिलाप निकेतन में पहले से ही बुकिंग करा ली थी. ये धर्मशाला, ऑटो स्टैंड के पास ही है और आप यहां से पैदल चलकर बांके बिहारी मंदिर पहुंच सकते हैं. यही वजह है कि हमारी हर यात्रा में, यही धर्मशाला हमारी पहली चॉइस रहती है. इस बार तो, बगल में ही भागवत कथा भी चल रही थी, सो माहौल और भी भक्तिमय हो उठा था. हमने हरमिलाप धर्मशाला में सामान रखा, थोड़ा फ्रेश हुए और निकल गए बांके बिहारी मंदिर ( Bankey Bihari Mandir ) के लिए.

बांके बिहारी मंदिर ( Bankey Bihari Mandir ) में, बड़ी मुश्किल से दर्शन किए. आसपास भी घूमा और फिर दोपहर से पहले हम धर्मशाला वापिस भी आ गए. दोपहर का भोजन हमने धर्मशाला में ही किया. यहां बेहद अच्छे रेट में टेस्ट भोजन की भी सुविधा है. सो, उत्तम आहार करके हमने दोपहर में यहीं आराम का फैसला किया. हम चारों लोग सो गए. शाम लगभग 4 बजे आंख खुली तो हम फटाफट तैयार हुए और दोबारा चल दिए बांके बिहारी मंदिर ( Bankey Bihari Mandir ) के दर्शन के लिए.

यहां पर मैंने पेड़े लिए और रबड़ी का भी स्वाद लिया. मैं आसपास की दुकानों पर कुछ कुछ देखते जा रहा था, वाइफ भी लड्डू गोपाल के लिए वस्त्र लेने में जुटी हुई थी. ये सब हम दर्शन के बाद कर रहे थे. मेरी गोद में, मेरा बेटा था और बिटिया का हाथ मैंने पकड़ा हुआ था. बेटे से गुलाबी रंग की मंकी कैप पहनी थी. मुझे नहीं पता था कि यही मंकी कैप उसके लिए मुसीबत बनने वाली है. यहीं पर, बेटी को बाथरूम आया.

मुझे एक मिठाई की दुकान के पीछे की नाली दिखाई दी. मैं बेटी को लेकर वहां जाने लगा. इतने में, अचानक से ऐसा लगा कि किसी ने बेटे पर ज़ोर का झपट्टा मारा और वह मेरी गोद से सीधा ज़मीन पर गिर गया. वह लगभग 5 फ़ीट की ऊंचाई से ज़मीन पर गाल के बल गिर गया था. मैं तड़प उठा. कुछ समझ ही नहीं आया कि ये सब हुआ क्या. कुछ सेकेंड्स में, मैं जैसे ही संभला तो देखा कि एक बंदर ने बेटे की वो गुलाबी मंकी कैप छीन ली थी.

वाइफ़ ने भागकर बेटे को उठाया. उसके मुंह से खून निकलने लगा था. मंकी कैप, खींचने की वजह से, दांतों के बीच उसकी जीभ आ गई थी. जीभ चोटिल हो गई थी और उसी में से खून आने लगा था. वाइफ ने एक दुकान में जाकर उसे दूध पिलाया और चोट को देखा. कुछ लोग, पास में डॉक्टर को दिखाने के लिए कहने लगे. वाइफ ने अच्छी तरीके से बच्चे की स्थिति को देखा. मैंने डॉक्टर के लिए कहा तो उसने न कहा और फिर हम वापिस धर्मशाला की ओर बढ़ने लगे.

इससे पहले, मैंने कुछ पल रुककर उस बंदर को भी देखा. वो बंदर, कैप को नोच नोचकर उधेड़ रहा था. मेरी आंखों से आंसू छलछला पड़े थे. तभी मैंने वो जगह देखी जहां बेटा गिरा था. पास ही, गर्म तवा था जिसपर कोई छोले बना रहा था. आपने भी, ऐसी कई दुकानें वहां देखी होंगी. हालांकि, गलती मेरी भी थी. मुझे वृंदावन के बंदरों की कहानी पता थी और बंदरों के खतरे का आभास भी था. हालांकि, गलती ये रही कि मेरी सावधानी, चश्मे और पर्स तक ही सीमित रह गई. मुझे क्या पता था कि बंदर कुछ ऐसा कर जाएंगे. मुझे बंदर पर गुस्सा तो बहुत आ रहा था लेकिन तवे को देखकर मैंने ईश्वर का शुक्रिया भी कहा. सच में दोस्तों, ज़िंदगी में ऐसे कई मोड़ आते हैं जब हमारे हाथ में कुछ नहीं होता. आप संयोग के हाथ में होते हैं और यही संयोग ज़िंदगी की दिशा को तय करता है.

बंदर ने टोपी को उधेड़ दिया और एक कोने में फेंक दिया. हालांकि, वह अब भी मेरी पहुंच में नहीं थी. खैर, हम वापिस धर्मशाला आ चुके थे. यहां पर कुछ ही देर बाद, बेटा, अपनी बहन के साथ खिलखिलाने लगा था. वो खेल रहा था. माता-पिता को और क्या चाहिए. उनकी संतान खुश रहे, इससे बड़ा सुख क्या हो सकता है.

आज जब मैं इस ब्लॉग को लिख रहा हूं तो उद्देश्य यही है कि आप जब भी मथुरा या वृंदावन जाएं, अपने सामान से ज़्यादा छोटे बच्चों की सुरक्षा का ख्याल रखें. पशु तो बेज़ुबान हैं, जो सिखाया गया उसी तरीके से व्यवहार करेंगे लेकिन हमारी एक चूक मासूम बच्चों को भारी न पड़ जाए, इसका ध्यान ज़रूर रखें.