इस घाटी ( Parvati Valley Tour ) का प्लान बनाते वक्त मैंने कैसे तैयारी की और कैसे मैं पार्वती वैली पहुंचा और कैसे हमारे सफर की शुरुआत हुई, आपको ये पूरी जानकारी इस ब्लॉग में मिलेगी...
मैं बहुत दिनों से पार्वती वैली ( Parvati Valley Tour ) का सफर करना चाह रहा था. पहली बार इस घाटी ( Parvati Valley Tour ) का नाम तब सुना था जब मेरा दोस्त सचिन यहां गया था. सचिन ने दिल्ली के कश्मीरी गेट बस अड्डे से Himachal Pradesh Transport Corporation की रोडवेज बस से Bhunter तक की यात्रा की थी. Bhunter से उन्हें कोई दूसरा वाहन लेना पड़ा था. सचिन के मुंह से इस घाटी की तारीफ सुनकर मेरे दिल में यहां जाने की तमन्ना जग गई थी. अब साल 2021 मेरे लिए एक लॉन्ग वीकेंड लाया तो मैंने लगे हाथ पार्वती वैली का प्लान बना डाला. इस घाटी ( Parvati Valley Tour ) का प्लान बनाते वक्त मैंने कैसे तैयारी की और कैसे मैं पार्वती वैली पहुंचा और कैसे हमारे सफर की शुरुआत हुई, आपको ये पूरी जानकारी इस ब्लॉग में मिलेगी.
गुड फ्राइडे वाले वीकेंड के लिए मैंने तकरीबन दो महीने पहले ही प्लान करना शुरू कर दिया था. कभी ओरछा का ख्याल आया तो कभी राजस्थान के शेखावटी का. मुझे रहस्यों और कहानियों से ज्यादा प्यार था इसलिए मेरी रिसर्च की सुई पार्वती वैली ( Parvati Valley Tour )आकर ही रुकी. इस घाटी में आपको मॉडर्न लाइफ, सांस्कृतिक जीवन, धर्म-अध्यात्म, अडवेंचर और रहस्य सबकुछ एक साथ मिल जाता है. कसौल-तोष गांव ( Kasol and Tosh Village ) अपनी लाइफस्टाइल के लिए फेमस हैं. इजरायली और इटैलियन ( Israeli and Italian ) भी दीवाने हैं इन जगहों के. मलाणा गांव ( Malana Village in Parvati Valley ) में आपको रहस्यों की अलग ही दुनिया मिलती है. खीरगंगा का ट्रैक ( Kheer Ganga Trek in Parvati Valley ) आपके दमखम की परीक्षा लेता है, मणिकर्ण का इतिहास ( History of Manikarn Sahib Gurudwara ) हिंदू और सिख धर्म की अमर कहानियां लिए बैठा है और पार्वती नदी ( Parvati River in Parvati Valley ) कल कल करके बह रही है, मानों वो ये कहती है कि आकर कुछ वक्त उसके पास भी बैठा जाए.
मेरी रिचर्स में मैंने ये जाना कि पार्वती वैली में वो सबकुछ है जो मेरे फ्लेवर का है. यही वजह रही कि मैंने इस घाटी को अपनी यात्रा के लिए चुना.
पार्वती वैली ( Parvati Valley Tour ) के सफर पर हम चार दोस्तों को साथ जाना था. मैं, रंजीत, विपिन और संजय. मैंने हम सभी के लिए पहले तो हिमाचल प्रदेश परिवहन निगम की बस से टिकट कराने का प्लान किया लेकिन जब मैंने ये देखा कि हिमाचल प्रदेश परिवहन निगम ( Himachal Pradesh Transport Corporation ) की कोई भी बस Kasol तक नहीं जाती है तो मैंने ऐसी बस की तलाश शुरू की जो हमें Kasol तक ले जाए. ऐसा करके मैं अपने पैसे भी बचा लेता और वक्त भी, जो हमारे लिए सबसे ज़रूरी था. यही सोचकर मैंने RedBus से Zing Bus की टिकट बुक की. ये टिकट एक अप्रैल को शाम 7 बजे मोरी गेट से थी. मैंने वापसी की टिकट बुक नहीं कराई थी. ऐसा इसलिए क्योंकि मुझे ये पता था कि आने का प्लान ऊपर नीचे हो सकता था.
पार्वती वैली के सफर ( Parvati Valley Tour ) में आपको ढेरों स्टे और कैंप्स मिलते हैं. हमें क्योंकि कसौल, मलाणा और खीरगंगा सभी जगहों पर जाना था इसलिए मैंने और दोस्तों ने पहले दिन का स्टे कसौल में ही करने का फैसला किया. मुझे चेक करते करते CHOJ Village में Parvati Hill Camps में स्टे मिला. हालांकि पहुंचने के बाद यहां भी एक विचित्र कहानी हुई. इसका ज़िक्र मैं एक दूसरे ब्लॉग में आपसे ज़रूर करूंगा. CHOJ Village के लिए आपको कसौल से थोड़ा आगे निकलना पड़ता है. एक किलोमीटर बाद आपको पार्वती नदी में एक पैदल पुल मिलता है. इस पुल को पार करके आप CHOJ Village पहुंच सकते हैं. CHOJ Village में एक से बढ़कर एक स्टे हैं. यहीं पर NOMADS HOSTELS भी है.
अब हमारा ये सफर अप्रैल के महीने में था इसलिए हमें ज्यादा कुछ सोचने की ज़रूरत नहीं थी. मैं कहीं भी जाता हूं तो सबसे पहले एक एक सामान को अपनी लिस्ट में जोड़ता हूं. ये लिस्ट मेरी दिनचर्या के ख्याल से शुरू होती है. जैसे- टूथब्रश, पेस्ट, शावरजेल, इत्यादि. पार्वती वैली के सफर पर, हमने सामान्य कपड़े ही पैक किए. हां, Tosh Village क्योंकि शिखर पर है और खीरगंगा भी बेहद ऊंचाई पर है इसलिए हमने लोशन, वैसलीन आदि ले लिए थे. इस ट्रिप के लिए मैंने खासतौर से पहली बार ट्रैकिंग शूज भी खरीदे. सामान्य कपड़ों के अलावा सर्दी की जुराबें भी मैंने रख ली थीं. इसके अलावा, व्लॉगिंग के लिए 4K शूट वाला मोबाइल, मिनी ट्रायपॉड, माइक, सेल, कैमरे की एक्सट्रा बैटरी भी मेरे पिटारे में थी.
दोस्तों, पार्वती वैली के लिए हफ्तों पहले से प्लान करते करते भी कुछ ऐसा हो गया जिससे हमारी ट्रिप खराब होते होते बची. दरअसल, हम चारों दोस्त दिल्ली के अलग अलग हिस्सों में रहते हैं. मैं रहता हूं गाजियाबाद में, संजय लोधी कालोनी में, रंजीत रोहिणी में और विपिन द्वारका में. अब हम चारों को एक ऐसी जगह मिलना था जिसे हम में से किसी ने देखा भी नहीं था. मैं घर से तो समय से निकल गया लेकिन बस के ऑपरेटर से ये भी नहीं पूछा कि मोरी गेट की लोकेशन क्या है. हालांकि, टिकट के मेसेज में ये पूरी जानकारी थी लेकिन नजदीकी मेट्रो स्टेशन जैसी कोई बात उसमें थी नहीं.
मैंने निकलकर जब बस ऑपरेटर के नंबर पर कॉल किया तो पता चला कि ये नंबर बस चलने से एक घंटे पहले यानी कि 6 बजे चालू होगा. अब क्या था, मैं तीनों दोस्तों को बताता चल रहा था और गूगल मैप देखता जा रहा था. गूगल मैप ने बताया कि कश्मीरी गेट से हम पैदल मोरी गेट पहुंच जाएंगे. हालांकि ये पैदल रास्ता इतना ज़्यादा वक्त लगा देगा, मैंने सोचा नहीं था. मैं 6 बजे से थोड़ा पहले कश्मीरी गेट पहुंच गया था. वहां से गेट नंबर 7 से बाहर आकर मैं मोरी गेट की तरफ बढ़ने लगा.
चलते चलते खबर मिली कि विपिन अभी घर से निकले ही नहीं थे. वो कैमरा भूल गए थे और उसे लेने वापस गए थे. उन्हें एयरपोर्ट लाइन से आना था. फिर मैंने रंजीत और संजू से संपर्क किया, वे लोग भी अभी टाइम लगाने वाले थे. मैंने रफ्तार और बढ़ा दी. भागते भागते भी मुझे मोरी गेट पहुंचने में 20 मिनट लग ही गए. वहां जिस बस काउंटर से बस पकड़नी थी वहां बैठे शख्स से मैंने बस को थोड़ा रोकने के लिए कहा- खैनी चबाते चबाते ही उसने कहा – बारात ही क्या, जो रुक जाएगी? अब मैं ऐसे आदमी से क्या कहता. बाईं तरफ से आती बस को देखकर मैं रुका. इतने में पीछे से उसी खैनी मास्टर ने कहा कि हां यही बस है, बैठ जाओ….
मेरी हार्ट बीट तेज हो गई थी. ऐसा लगा जैसे ट्रिप तो गई काम से. इतनी तैयारी भी काम न आई, अब क्या करें. राहत तब मिली जब दाहिनी तरफ देखने पर एक रिक्शे से संजू और रंजीत उतरते दिखाई दिए. हम तीनों बस के पास पहुंच गए. उसमें से एक शख्स बाहर आए. मैंने उन्हें विपिन की बात बताई, उन शख्स ने कहा कि कोई नहीं भाई, 10 बज जाएंगे लेकिन तुम्हारे दोस्त को लेकर जाएंगे. बस यही वो हौसला था जिसकी मुझे ज़रूरत थी और ये हौसला उस ऑपरेटर ने मुझे दे दिया था.
मैंने तुरंत विपिन को कॉल किया और कहा कि आप मजनूं का टीला पहुंचो, हम वहीं मिलेंगे. हम तीन दोस्त, मैं, रंजीत और संजू बस में बैठ गए. मैंने लैपटॉप खोलकर ऑफिस का पेंडिंग काम करना शुरू कर दिया. रंजीत, विपिन के साथ लगातार संपर्क में थे. बस 7 बजे मोरी गेट से चली थी और उसे मजनूं का टीला पहुंचते पहुंचे साढ़े 7 से थोड़ा ज्यादा वक्त ही लगा. मजनूं का टीला पर दूसरी राहत तब मिली जब जिंग ऑफिस के सामने बैठे विपिन ने हमें हाथ हिलाकर हेलो किया.
इसके बाद हम चार दोस्त मिले और चल दिए पार्वती वैली की अद्भुत यात्रा पर. इस यात्रा की हर जानकारी हम यूट्यूब वीडियो के माध्यम से अपने चैनल पर भी लेकर आ रहे हैं. आप ऊपर यूट्यूब आइकॉन पर क्लिक करके हमारे चैनल Travel Junoon पर भी जा सकते हैं.
अगर आप यात्रा से जुड़े हर अनुभव को पढ़ना चाहते हैं तो ब्लॉग से जुड़े रहिए. आगे आपको मलाणा गांव, कसौल की यात्रा, मणिकर्ण सहित पार्वती वैली के हर हिस्से के किस्से मिलेंगे.
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