इतिहास के इस झरोखे में ही दिल्ली की दरगाहें भी नायाब पहलू लेकर बैठी नजर आती हैं. इस आर्टिकल में, हम आपको दिल्ली की 5 मशहूर दरगाहों ( Famous Dargah in Delhi ) के बारे में बताएंगे.
Famous Dargah in Delhi – देश की राजधानी दिल्ली में समूचे भारत की तस्वीर दिखाई देती है. ऐतिहासिक मंदिरों की श्रृंखला, दिल्ली के ऐतिहासिक दरवाज़े, भारत पर राज़ करने वाली हुकूमतों के किले यहां दिखाई देते हैं. इतिहास के इस झरोखे में ही दिल्ली की दरगाहें भी नायाब पहलू लेकर बैठी नजर आती हैं. इस आर्टिकल में, हम आपको दिल्ली की 5 मशहूर दरगाहों ( Famous Dargah in Delhi ) के बारे में बताएंगे.
बता दें कि दिल्ली में कम से कम 22 सूफी संतों के धार्मिक स्थल हैं. हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया की दरगाह जहां सबसे लोकप्रिय है. यह शुक्रवार की अपनी कव्वाली और फिल्मों की शूटिंग की वजह से भी मशहूर हो चुकी है. इसकी अलावा मटका पीर, कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी जैसी कुछ और भी दरगाहें हैं जो खासी मशहूर हैं. आज हम आपको दिल्ली में स्थित 5 ऐसी दरगाह ( Famous Dargah in Delhi ) के बारे में बताएंगे जिसकी कहानी अपने आप में अनूठी है. आप यहां कुछ समय शांति से बिता सकते हैं और यादों को हमेशा के लिए सहेज सकते हैं.
ख्वाजा कुतबुद्दीन बख्तियार काकी की दरगाह कुतुब साहिब की दरगाह के नाम से मशहूर है. इस ऐतिहासिक कुतुब साहिब की दरगाह पर सभी धर्मों के लोग सजदा करते हैं. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के तहत आने वाले इस ऐतिहासिक स्मारक के कई रोचक किस्से हैं. महरौली स्थित इस दरगाह के आसपास आयातकार अहाता है जिसे कई शासकों ने अलंकृत किया था. दिल्ली की ये दरगाह भी खासी चर्चित ( ( Famous Dargah in Delhi ) ) है.
इसकी पश्चिमी दीवार में कई रंगीन टाइल लगे हुए हैं. इस दीवार के बारे में कहा जाता है कि इसे औरंगजेब ने जड़वाया था. ख्वाजा को विभिन्न शासक बड़ा सम्मान देते थे और उनमें से बहुत से बादशाहों की कब्र इनके आसपास बनाई गई हैं.
इसके बगल में ही आपको ज़फ़र महल दिखाई देता है. आखिरी मुगल शासक बहादुर शाह ज़फ़र ने इस किले को बनावाया था. वे अक्सर यहां कुछ दिन गुज़ारते भी थे. बहादुर शाह ज़फ़र की तमन्ना था कि वे इसी महल में दफ़्न हों, हालांकि इतिहास को कुछ और ही मंज़ूर था और ऐसा हो न सका. यहां जो दफन किए गए शासकों में बहादुर शाह प्रथम, शाह आलम, अकबर द्वितीय शामिल हैं.
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हजरत ख्वाजा नसीरुद्दीन रोशन चिराग देहलवी की दरगाह चिराग दिल्ली के बीआरटी गलियारे के पास है. यहां जाने के लिए आपको गांव की संकरी गलियों से गुजरना पड़ता है. इस सफर के बाद आप नसीरुद्दीन महमूद चिश्ती निज़ामी के अंतिम विश्राम स्थल में प्रवेश करेंगे. ये निज़ामुद्दीन औलिया के एक अनुयायी थे. नसीरुद्दीन महमूद 14 वीं शताब्दी के दौरान दिल्ली में रहते थे.
जब तुगलक वंश का संस्थापक ग़यासुद्दीन तुगलक, तुगलकाबाद किले का निर्माण कर रहे थे, तो उसने आदेश दिया कि राजमिस्त्री कहीं और काम नहीं कर सकते. उसी समय, गियासपुर (वर्तमान निज़ामुद्दीन) में काम हो रहा था, जहां राजमिस्त्री रात में काम करते थे. इससे सुल्तान नाराज हो गया और उसने क्षेत्र की तेल की आपूर्ति काट दी, ताकि राजमिस्त्री के काम करने के दौरान कोई दीपक न जलाया जा सके. ऐसा कहा जाता है कि नसीरुद्दीन महमूद ने तब तेल के बजाय पानी से दीपक जलाकर चमत्कार कर दिया.
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हज़रत शाह कलीम -उल्ला जहानाबादी ताजमहल के वास्तुकार उस्ताद अहमद लाहौरी के पोते थे. वह एक श्रद्धेय सूफी संत थे और उन्होंने मुगल सम्राट शाहजहां के संरक्षण का आनंद लिया. उसे ‘जहानाबादी’ नाम दिया गया है क्योंकि वह नए बने मुगल राजधानी, शाहजहानाबाद या जहानाबाद में रहते थे.
उनका मक़बरा पुरानी दिल्ली के मीना बाज़ार में जामा मस्जिद और लाल किले के बीच है. यह एक साधारण तीर्थस्थल है जहां हर साल उनकी पुण्यतिथि को मनाने के लिए एक उर्स आयोजित किया जाता है.
निज़ामुद्दीन बस्ती औलिया को समर्पित दरगाह के लिए जाना जाता है, लेकिन गांव के दूर के छोर पर एक और आधुनिक दरगाह है जो कुछ हद तक एक छिपी हुई मणि जैसी है. मकबरा हजरत इनायत खान का है, जो 20 वीं सदी के शुरुआती सूफी संत थे. यह सूफीवाद को यूरोप और पश्चिम में ले गए.
उनका मंदिर एक शांतिपूर्ण बगीचे के बीच में एक मामूली परिसर में स्थापित है. शुरू में सिर्फ एक छोटा मकबरा था जो वर्षों से ध्यान हॉल और एक पुस्तकालय के साथ एक बड़ी इमारत में बदल चुका है. परिसर में हिंदुस्तानी संगीत अकादमी, हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के दिल्ली घराने की मौजूदगी देखी जा सकती है. दरगाह में हर शुक्रवार शाम को कव्वाली का आयोजन किया जाता है. यह दरगाह कव्वाली के लिए लोकप्रिय है.
बीबी फातिमा की दरगाह महिला सूफी संत को समर्पित है. शहर की अधिकांश प्रमुख दरगाहें, जिनमें हजरत निजामुद्दीन औलिया भी शामिल है, ये महिलाओं को गर्भगृह में प्रवेश से रोकती हैं. महिलाएं परिसर में प्रवेश कर सकती हैं, लेकिन मुख्य कक्ष में प्रवेश करने की अनुमति नहीं है, जहां पूज्य संत को दफनाया गया था. बीबी फातिमा की दरगाह, काका नगर के पास एक रिहायशी इलाके में है. यह शांत, प्राचीन जगह सभी के लिए खुली रहती है. यहां पर महिला पुरुष किसी के भी आने की मनाही नहीं है.
बीबी फातिमा सैम के बारे में बहुत कम लोग जानते हैं. वह सूफ़ीवाद के लिए कहां से आई या किस वजह से आई, इस बारे में शायद ही कोई जानकारी है. हम क्या जानते हैं कि वह 13 वीं शताब्दी के दौरान दिल्ली में रहती थी और वर्तमान समय में पाकिस्तान में दफन किए गए सूफी संत, बाबा फरीद की दत्तक बहन थी. दरगाह दिन और रात में हर समय खुला रहती है.
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