क्यों बंद हो गई Delhi की Ring Railway?
Delhi Ring Railway: Delhi में Metro और लोकल ट्रांसपोर्ट के बीच एक ऐसी रेलवे लाइन भी मौजूद है, जिसके बारे में आज बहुत कम लोग जानते हैं। इसे Delhi Ring Railway के नाम से जाना जाता है। कभी इसे Delhi के भविष्य के सार्वजनिक परिवहन नेटवर्क के तौर पर देखा गया था। इसका उद्देश्य दिल्ली के प्रमुख रेलवे स्टेशनों पर बढ़ते दबाव को कम करना और शहर के आसपास ट्रेनों की आवाजाही को आसान बनाना था। लेकिन समय के साथ यह नेटवर्क यात्रियों के बीच अपनी उपयोगिता खोता चला गया। आज इसके कई स्टेशन सुनसान नजर आते हैं, जबकि कुछ जगहों पर अतिक्रमण की समस्या भी देखने को मिलती है।
दिल्ली रिंग रेलवे की कहानी साल 1975 से शुरू होती है। उस समय दिल्ली की आबादी तेजी से बढ़ रही थी और नई दिल्ली, पुरानी दिल्ली तथा हजरत निजामुद्दीन जैसे प्रमुख रेलवे स्टेशनों पर ट्रेनों का दबाव लगातार बढ़ रहा था। खासतौर पर मालगाड़ियों की आवाजाही के कारण रेलवे नेटवर्क पर अतिरिक्त दबाव था।
इसी समस्या को दूर करने के लिए रेलवे ने एक ऐसी लाइन तैयार की, जिससे मालगाड़ियों को दिल्ली के प्रमुख और व्यस्त स्टेशनों पर जाए बिना शहर के एक हिस्से से दूसरे हिस्से तक पहुंचाया जा सके। लाजपत नगर से आदर्श नगर तक बनाई गई इस लाइन को शुरुआत में Delhi Avoiding Line कहा गया। यह सफदरजंग और पटेल नगर जैसे इलाकों से होकर गुजरती थी।
शुरुआत में इसका मुख्य उद्देश्य passenger transport नहीं, बल्कि freight trains को दिल्ली के busy railway stations से bypass कराना था।
दिल्ली रिंग रेलवे दिल्ली के कई प्रमुख इलाकों को जोड़ते हुए एक circular rail route बनाती है। इसका रूट हजरत निजामुद्दीन से शुरू होकर लाजपत नगर, सेवा नगर, लोधी कॉलोनी, सफदरजंग, सरोजिनी नगर, चाणक्यपुरी, इंद्रपुरी हॉल्ट, पटेल नगर, कीर्ति नगर, दया बस्ती, नारायणा विहार, शकूरबस्ती और आदर्श नगर जैसे इलाकों से होकर गुजरता है। इसके अलावा तिलक ब्रिज समेत कई अन्य स्टेशनों को भी यह नेटवर्क जोड़ता है। हालांकि, फिलहाल इस पूरे रूट पर नियमित passenger service संचालित नहीं होती और कई स्टेशन बंद या बेहद कम इस्तेमाल की स्थिति में हैं।
साल 1982 में Asian Games के आयोजन ने दिल्ली की इस रेलवे लाइन को एक नई पहचान दी। देश-विदेश से बड़ी संख्या में खिलाड़ी और दर्शक दिल्ली पहुंचने वाले थे। ऐसे में सरकार को एक ऐसे public transport network की जरूरत थी, जिससे लोगों को शहर के अलग-अलग हिस्सों में तेजी से पहुंचाया जा सके।
इसी दौरान इस लाइन पर passenger trains शुरू की गईं। करीब 24 passenger trains के संचालन के साथ इसका इस्तेमाल पहली बार suburban railway के तौर पर किया गया। चूंकि यह लाइन दिल्ली के Inner Ring Road के लगभग समानांतर चलती थी और शहर के चारों तरफ एक सर्कुलर रूट तैयार करती थी, इसलिए इसे Delhi Ring Railway नाम दिया गया।
Delhi Ring Railway लगभग 35 किलोमीटर लंबा circular rail network था। इसका रूट हजरत निजामुद्दीन से शुरू होकर दिल्ली के करीब 21 स्टेशनों को कवर करता था और फिर वापस हजरत निजामुद्दीन तक पहुंचता था। पूरे सर्किट को पूरा करने में करीब 90 से 120 मिनट का समय लगता था।
इसकी संरचना आज की दिल्ली मेट्रो की Pink Line से कुछ हद तक मिलती-जुलती है, जो दिल्ली के कई हिस्सों को रिंग के रूप में जोड़ती है।
1980 और 1990 के दशक को Delhi Ring Railway का Golden Period कहा जा सकता है। लोधी कॉलोनी, सफदरजंग, सरोजिनी नगर और चाणक्यपुरी जैसे इलाकों में बड़ी संख्या में सरकारी कर्मचारी रहते थे, जो रोजाना इस ट्रेन का इस्तेमाल करते थे। इसके अलावा students और local passengers के लिए भी यह एक सस्ता transport option था।
उस दौर में Ring Railway का किराया बेहद कम था। एक समय पूरे सर्किट की टिकट सिर्फ 1 रुपये में मिल जाती थी, जबकि बच्चों के लिए टिकट करीब 50 पैसे थी। Monthly Season Ticket और Student MST भी बेहद कम कीमत पर उपलब्ध थी। इसी वजह से हजारों लोग रोजाना इसका इस्तेमाल करते थे।
उस समय यह माना जाने लगा था कि Delhi Ring Railway आने वाले समय में दिल्ली के लिए Mumbai Local जैसी महत्वपूर्ण suburban rail service बन सकती है।
समय के साथ दिल्ली की आबादी और शहर का आकार तेजी से बढ़ा। शहर Outer Ring Road से आगे तक फैल गया, लेकिन Delhi Ring Railway का network उसी पुराने दायरे तक सीमित रहा।
नए इलाकों को जोड़ने के लिए पर्याप्त नए स्टेशन नहीं बनाए गए। कई existing stations तक पहुंचने के लिए भी बेहतर road connectivity विकसित नहीं हो सकी। इसके अलावा Ring Railway को DTC buses और अन्य public transport services के साथ प्रभावी तरीके से integrate नहीं किया गया।
कई stations मुख्य सड़कों से काफी अंदर स्थित थे। ऐसे में यात्रियों के लिए स्टेशन तक पहुंचना ही मुश्किल हो गया। धीरे-धीरे यह नेटवर्क लोगों की daily commuting needs से दूर होता चला गया।
Delhi Ring Railway के कमजोर होने की एक बड़ी वजह इसकी कम train frequency भी रही। ट्रेनों की संख्या धीरे-धीरे कम होती गई। अगर कोई passenger एक ट्रेन miss कर देता था तो अगली ट्रेन के लिए उसे काफी देर तक इंतजार करना पड़ सकता था।
इसके मुकाबले DTC buses दिल्ली के अलग-अलग हिस्सों तक ज्यादा आसानी से पहुंच रही थीं। ऐसे में लोगों के पास public transport के दूसरे विकल्प उपलब्ध होने लगे।
साल 2002 में Delhi Metro के आने के बाद दिल्ली के public transport system में बड़ा बदलाव आया। Metro trains की बेहतर frequency, modern stations, security और शहर के प्रमुख हिस्सों तक connectivity ने यात्रियों को आकर्षित किया।
धीरे-धीरे Ring Railway के कई passengers Metro की ओर चले गए। इससे पहले से कम passenger traffic वाली इस railway service पर दबाव और बढ़ गया।
Delhi Ring Railway के design की एक बड़ी समस्या यह भी थी कि यह मूल रूप से freight movement को ध्यान में रखकर बनाई गई थी। इसलिए कई मौकों पर मालगाड़ियों को प्राथमिकता दी जाती थी और passenger trains को इंतजार करना पड़ता था।
इससे trains में delays बढ़े और यात्रियों का भरोसा भी कम हुआ। जब किसी passenger को समय पर अपनी मंजिल तक पहुंचने के लिए दूसरे transport options ज्यादा सुविधाजनक लगने लगे, तो Ring Railway का इस्तेमाल और घटता चला गया।
कई Ring Railway stations पर समय के साथ encroachment की समस्या सामने आई। कुछ जगहों पर रेलवे की जमीन के आसपास अनधिकृत निर्माण और अव्यवस्थित गतिविधियों ने passenger experience को प्रभावित किया।
Daya Basti, Inderpuri Halt और Naraina Vihar जैसे कुछ इलाकों में infrastructure और security को लेकर भी समस्याएं बताई जाती रही हैं। इन कारणों से यात्रियों की संख्या में और गिरावट आई।
एक समय जिस network पर 24 passenger trains चलती थीं, उसकी स्थिति इतनी खराब हो गई कि कई stations पर पूरे दिन में बेहद कम passengers पहुंचते थे।
साल 2020 तक Delhi Ring Railway की passenger service बेहद सीमित हो चुकी थी। इस route पर केवल एक passenger train के संचालन की बात सामने आई, जो New Delhi और Shakurbasti के बीच चलती थी। Lockdown के बाद यह service भी दोबारा नियमित रूप से शुरू नहीं हो सकी।
हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि पूरी railway line खत्म हो गई। यह infrastructure आज भी मौजूद है और इसका इस्तेमाल मालगाड़ियों तथा कुछ अन्य railway services के लिए किया जाता है।
साल 2010 के Commonwealth Games से पहले Ring Railway के कुछ stations को upgrade करने की कोशिश की गई थी। करीब 3 करोड़ रुपये की लागत से Chanakyapuri, Sarojini Nagar, Inderpuri Halt, Lajpat Nagar, Sewa Nagar, Lodhi Colony और Safdarjung जैसे सात stations का redevelopment किया गया था।
हालांकि, केवल stations के redevelopment से passenger demand में अपेक्षित बदलाव नहीं आया। Connectivity और train frequency जैसी मूल समस्याएं बनी रहीं।
Delhi Ring Railway को लेकर सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या इसे future में फिर से passenger service के लिए revive किया जा सकता है। फिलहाल इस पर नियमित passenger service नहीं चल रही है, लेकिन railway infrastructure पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है।
कुछ urban planners के मुताबिक अगर इस network को Delhi Metro, DTC Bus Network, Namo Bharat और NCR Rail Services के साथ बेहतर तरीके से integrate किया जाए तो यह दिल्ली के traffic congestion और pollution को कम करने में उपयोगी हो सकता है।
दिल्ली जैसे शहर में पहले से मौजूद railway infrastructure को modernize करके इस्तेमाल करना नई railway line बनाने की तुलना में अलग तरह का विकल्प हो सकता है। इसके लिए stations को विकसित करने, last-mile connectivity बढ़ाने और train frequency में सुधार करने की जरूरत होगी।
Delhi Ring Railway के future को लेकर Master Plan for Delhi 2041 में इसके redevelopment और revival की दिशा में बात की गई है। हालांकि, इस योजना को जमीन पर लागू करना कई factors पर निर्भर करेगा।
आज दिल्ली में Metro, Regional Rapid Transit System और अन्य modern transport projects पर तेजी से काम हो रहा है। ऐसे में Ring Railway को दोबारा passenger network के रूप में विकसित करना कितना व्यावहारिक होगा, यह भविष्य में तय होगा।
Delhi Ring Railway की कहानी दिल्ली के बदलते transport system की कहानी भी है। जिस railway network को कभी शहर के लाखों लोगों के लिए affordable और fast transport का माध्यम बनाने का सपना देखा गया था, वह धीरे-धीरे अपनी passenger utility खो बैठा।
आज भी इसकी tracks और कई stations दिल्ली के बीच मौजूद हैं, लेकिन passenger service के लिहाज से यह network लगभग इतिहास बन चुका है। अगर इसे आधुनिक transport network के साथ सही तरीके से integrate किया जाए तो शायद दिल्ली की यह पुरानी railway line एक बार फिर शहर के public transport system में अपनी भूमिका निभा सके।
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