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Feroz Shah Kotla Fort in Delhi – हर तरफ दिखी खामोशी, खूबसूरती देखने वाला कोई नहीं!

Feroz Shah Kotla Fort  – फिरोजशाह कोटला का किला… ये किला मुझे हमेशा से बेहद पसंद रहा है. जब आईटीओ पर मेरा ऑफिस था, तब जब भी शाम की शिफ्ट होती थी, तब अक्सर वक्त से पहले पहुंचकर कुछ देर यहां बैठता था. तब इसकी टिकट भी 10 रुपये की थी. मैं यहां किताबें पढ़ा करता था. आज कई साल बाद जब यहां दोबारा जाना हुआ, ऐसा लगा जैसे कुछ बदला ही नहीं है. वही, इक्का-दुक्का लोग, वही इमारत, वही खामोशी… हां, अशोक स्तंभ तक जाने वाले रास्ते को अब बंद कर दिया गया है. इस ब्लॉग में, मैं आपको अगस्त 2021 के महीने में फिरोजशाह कोटला किले ( Feroz Shah Kotla Fort ) की अपनी यात्रा के बारे में बताउँगा. यह ब्लॉग आपके बेहद काम का होने वाला है. अगर आप फिरोजशाह कोटला के किले ( Feroz Shah Kotla Fort ) जाना चाहते हैं, तो यह आर्टिकल आपके लिए एक टूर गाइड ( Feroz Shah Kotla Fort Tour Guide ) का भी काम करेगा.

पढ़ें- Feroz Shah Kotla Fort – लाल किले से पुराना है दिल्ली का ये किला, यहां होती हैं जिन्न और रूहों की इबादत!

शनिवार की एक सुबह मैंने जामा मस्जिद ( Jama Masjid ) जाने का फैसला किया था. जामा मस्जिद मेट्रो स्टेशन ( Jama Masjid Metro Station ) पहुंचा, 2 घंटे का वक्त मस्जिद में बिताया. बारिश भी हुई. यहां से काम निपटा तो सोचा, अब क्या किया जाए. समझ में आया कि नजदीक ही अपनी फेवरिट जगह फिरोजशाह कोटला का किला है, क्यों न वहां चल दिया जाए. मैंने कदम फटाफट बस स्टैंड की ओर बढ़ा दिए. राह चलते ही खीरा खाया. उमस भरी गर्मी में मुंह का मास्क भी पसीने से तरबदर हो चुका था. बस आई तो राहत की सांस ली. आराम से 5 रुपये की टिकट लेकर एक्सप्रेस बिल्डिंग के बस स्टैंड पहुंच गया.

फिरोज़शाह कोटला का किला

एक्सप्रेस बिल्डिंग बस स्टैंड पर उतरते ही सामने मुझे फिरोजशाह कोटला का किला ( Feroz Shah Kotla Fort ) दिखाई दे रहा था. सबकुछ वैसा ही था, 2012 जैसा. वही खामोशी, वही इक्का दुक्का लोग, कुछ नहीं बदला था. जब किले के नजदीक बने टिकट काउंटर पर गया तो पता चला कि फिरोजशाह कोटला किले ( Feroz Shah Kotla Fort ) के लिए टिकट का वह काउंटर बंद कर दिया गया था. अब आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (एएसआई) भी क्या करे. थोड़े से लोग तो आते हैं किले में, उसके लिए 2 स्टाफ तो वह भी नहीं यहां हमेशा बिठाए रख सकता. अब यहां आने वाले लोगों को प्रवेश द्वार के नजदीक बने बार कोड से टिकट लेनी होती है. एक व्यक्ति की टिकट 20 रुपये है. मैंने ये काम तो फटाफट कर दिया. अंदर गार्ड को पेमेंट डन वाली स्क्रीन दिखाई, लेकिन वह तो कमाल का एक्सपर्ट था. न जाने कहां स्क्रॉल किया कि एएसआई लिखा हुआ पोर्शन आ गया. मैंने कहा- भई वाह.

टिकट दिखाकर अंदर चलने को हुआ. बैग की चेकिंग में मेरा मॉनपॉड उन्होंने देखा. गार्ड ने कहा कि मैं इसे लेकर नहीं जा सकता, मुझे मोनोपॉड को वहीं रखना होगा. जिस रजिस्टर में मेरा नाम दर्ज हुआ था, उसी के सामने उन्होंने मोनोपॉड लिखा. अब, मैं चल दिया किले के अंदर. अंदर धीमी धीमी बारिश हो रही थी. इन फुहारों ने आसमान को और किले दोनों को खूबसूरत बना दिया था. किसी कोने में गुड़हल के लाल फूल खिलखिला रहे थे. हरी घास देखकर यकीन ही नहीं हुआ कि ये दिल्ली में ही हैं. बेहद शांति का अहसास. कमाल का पल था दोस्तों. आप भी ज़रूर आएं घूमने.

अशोक स्तंंभ पिरामिड शैली की इमारत पर स्थित है

इसके बाद मैंने वह देखा जिसके लिए ये किला आजकल बदनाम है. प्रवेश द्वार से कुछ ही दूर आगे चलते ही वह दीवार दिखी जो दीये और अगरबत्ती की वजह से काली हो चुकी थी. यहीं पर किसी ने चूड़ियां तोड़कर रखी हुई थीं. ये सब मेरे समझ से बाहर था. कुछ देर रुका फिर आगे बढ़ दिया. यहां से बाईं ओर मुड़कर एक ऐसी जगह आती है जहां से एक रास्ता तो जाता है बावली की ओर और जो सीधा रास्ता है वह जाता है अशोक स्तंभ और जामी मस्जिद की ओर. जामी मस्जिद के बारे में कहा जाता है कि तैमूर ने दिल्ली फतह के बाद शुक्रवार को इसी मस्जिद में नमाज़ अदा की थी.

मैं पहले गया बावली वाले रास्ते में. कमाल की योजना रही होगी न दोस्तों! यमुना के किनारे बना किला और किले में बावली. इस बावली ( Feroz Shah Kotla Fort Baoli ) को दिल्ली की ऐतिहासिक बावलियों में शुमार किया गया है. यह चुनिंदा ऐसी बावलियों में है जो आज भी सही सलामत है. हालांकि, अब इसे आम जनता के लिए बंद कर दिया गया है लेकिन बाहर लगाए गए बोर्ड पर इसकी सम्पूर्ण जानकारी दी गई है. इसे पढ़कर, तस्वीरें देखकर और बाहर से ही सही लेकिन इस बावली से रूबरू होकर, आप इसकी भव्यता का अंदाज़ा लगा सकते हैं. कमाल की कारीगरी थी.

जामी मस्जिद

अब मैं हरी हरी घासों के बीच से चल दिया जामी मस्जिद और अशोक स्तंभ ( Feroz Shah Kotla Fort Ashoka Pillar ) की ओर. अशोक स्तंभ ( Ashoka Pillar ) पर पहुंचा तो देखा कि उसे तो बंद कर दिया गया है. पहले मैं वहां दीवारों पर चिट्ठियां देख चुका था. इन चिट्ठियों में लोगों ने अपनी तकलीफें बयां की थी. इस उम्मीद में कि भले जिन्नात उनकी समस्या खत्म करेंगे. हां, कपल्स भी वहां जाते थे. आम लोगों की हुड़दंगई की वजह से अशोक स्तंभ को भी नुकसान पहुंचने का खतरा था. इन्हीं सब वजहों से अब उसे बंद कर दिया गया है. अशोक स्तंभ या अशोक की लाट  ( Ashoka Pillar )  तक जाने के लिए बने दरवाजे पर अब ताला झूलता है. इसके चारों ओर बनी ग्रिल की भी मरम्मत करके उसे सही कर दिया गया है. तो, दोस्तों, इस बार अशोक स्तंभ नजदीक से देखने की हसरत तो पूरी नहीं हो सकी.

अब मैं पहुंचा जामी मस्जिद ( Jami Masjid ) पर. ये मस्जिद ( Jami Masjid ) अशोक स्तंभ के बराबर में ही है. इस मस्जिद में अब कुछ भी शेष नहीं है. खंजहर ही लगती है. इसे शाही घराने की औरतों के लिए बनवाया गया था. जामी मस्जिद ( Jami Masjid ) के अंदर इस तरह से बैठने की जगहें हैं कि औरतों को कोई दूसरा देख नहीं सकता था. यहां भी मैंने एक चिराग जलते देखा. कुछ पल यहां गुजारा, बारिश के बीच दिल्ली के खुलेपन का अहसास लिया. जब बाहर लौटने लगा तो मस्जिद के दरवाज़े पर एक मौलवी दिखाई दिए. वह कुछ बुदबुदा रहे थे. शायद कोई धार्मिक शब्द थे. मैं उनके पास बैठे तो वह रुक गए. मैंने उनसे इस किले के बारे में जो मान्यताएं लोगों में है, उसपर सवाल किया. उन्होंने कहा कि हां यहां जिन्नात हैं. यहां कोई लाइट नहीं जलती, अगर लाइट को दुरुस्त किया जाता है तो वह फुंक जाती है. किले में सिर्फ चिराग जलता है.

मैंने उनके पूछा कि क्या आपने जिन्न को देखा है, उन्होंने कहा कि हां… आमने-सामने मुलाकात हुई है. फिर उन्होंने किस्सा भी बता डाला. अब पता नहीं, इन सब बातों में कितनी सच्चाई है, या ये सब अफवाहें ही हैं. खैर, इन सब बातों से उलट, आप सिर्फ यहां ( Feroz Shah Kotla Fort ) की खूबसूरती को देखने और दिल्ली के अमर इतिहास को समझने के लिए यहां ज़रूर आएं. दिल्ली सल्तनत कभी यहीं से गुलजार हुआ करता था.

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