यूपी में है दामादों का गांव, जहां लड़की नहीं दामाद किए जाते हैं विदा

आज भी देश के अधिकतर हिस्सों में लड़कियां शादी के बाद ससुराल चली जाती हैं. ये रिवाज़ कई सालों से चलता आ रहा है. शादी करके लड़की अपनी सारी ज़िंदगी अपने ससुराल में बिताती है. वहीं हमारे देश का एक कोना ऐसा भी है जहां शादी के बाद लड़की ससुराल नहीं जाती, बल्कि दामाद लड़की के घर जाकर बस जाते हैं. ये छोटा सा गाँव उत्तरप्रदेश के कौशांबी में बस है. वैसे तो गांव का नाम हिंगुलपुर है. लेकिन इसे दामादों का पुरवा यानी कि दामादों के गांव ( Village of sons in law ) के तौर पर ही जाना जाता है.

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भारत का ये एक ऐसा गांव है जो दामादों के गांव ( Village of sons in law ) के नाम से जाना है. बात करते हैं कि आख़िर क्यों पड़ा ये नाम. दरअसल जब गांव के आसपास कारखाना शुरू किया जाता था तब वहां कामगारों की जरूरत पड़ती थी. जिसके चलते गांव के लोग अपने दामादों को बुलवा लिया करते थे, तब से ही इस गाँव का नाम दामादों का गाँव ( Village of sons in law ) रख दिया गया.

दामादों वाले इस गांव की और भी कई खासियतें हैं. जिसकी वजह से ये गाँव अपनी अलग पहचान रखता है. गांव में आने वाले सभी दामादों को रोजगार मिल सके, इसका सारा बंदोबस्त गांववाले मिलकर ही करते हैं. इस गांव के आसपास स्थित जिलों जैसे कानपुर, फतेहपुर, प्रतापगढ़, इलाहाबाद और बांदा के दामाद यहां रह रहे हैं. गाँव में 18 से 70 साल की उम्र तक की शादीशुदा अपने पतियों के साथ बसी हुई हैं. यही वजह है कि यहां एक ही घर में दामादों की कई पीढ़ियां बसी हुई हैं.

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दशकों पहले गांव के बड़े-बुजुर्गों ने लड़की की शादी कर देने के बाद उसे मायके में ही रखने का फैसला किया. इस गांव में मुस्लिम बहुल आबादी के इस तरीके को अल्पसंख्यकों ने भी अपना लिया. इसी कारण गांव की बेटियां जैसे ही शादी करने के लायक होती हैं. उनके रिश्ते की बात करते समय ये एक अहम शर्त होती है. ये अनूठा कदम यूपी में बढ़ते हुए कन्या भ्रूण हत्या और दहेज हत्या के अपराधों को रोकने के लिए उठाया गया. कन्या भ्रूण हत्या और दहेज हत्या में किसी वक्त बहुत आगे रहे यूपी के इस गांव ने अपनी बेटियों को बचाने के लिए अनूठा तरीका अपनाया.

दशकों पहले गांव के बुजुर्गों ने लड़की को शादी के बाद मायके में ही रखने का फैसला किया. गांव में मुस्लिम बहुत आबादी के इस तरीके को अल्पसंख्यकों ने भी अपना लिया. गांव की बेटियां जैसे ही शादी के लायक होती हैं. उनके रिश्ते की बात में ये एक अहम शर्त होती है. अपनी बेटियों को सुरक्षित रखने के लिए गांव के लोगों ने बेटियों को मायके में ही रखने का फैसला किया.

Anchal Shukla

मैं आँचल शुक्ला कानपुर में पली बढ़ी हूं। AKTU लखनऊ से 2018 में MBA की पढ़ाई पूरी की। लिखना मेरी आदतों में वैसी शामिल है। वैसे तो जीवन के लिए पैसा महत्वपूर्ण है लेकिन खुद्दारी और ईमानदारी से बढ़कर नहीं। वो क्या है किमैं लोगों से मुलाक़ातों के लम्हें याद रखती हूँ,मैं बातें भूल भी जाऊं तो लहज़े याद रखती हूँ,ज़रा सा हट के चलती हूँ ज़माने की रवायत से,जो सहारा देते हैं वो कंधे हमेशा याद रखती हूँ।कुछ पंक्तिया जो दिल के बेहद करीब हैं।"कबीरा जब हम पैदा हुए, जग हँसे हम रोयेऐसी करनी कर चलो, हम हँसे जग रोये"