Himalayan Tour

Brahmakamal – उत्‍तराखंड में अब भी खिलखिला रहे ब्रह्मकमल, ऐसा है इस फूल का जादू

Brahmakamal- समुद्रतल से 12 हजार फीट से लेकर 15 हजार फीट तक उगने वाला देवपुष्प ब्रह्मकमल इन दिनों चमोली और रुद्रप्रयाग जिलों के उच्च हिमालयी क्षेत्र में छठा बिखेर रहा है.

उत्तराखंड में करीब 14500 फीट की ऊंचाई पर स्थित इस हिमालयी क्षेत्र में सबसे अधिक दुर्लभ ब्रह्मकमल और नीलकमल खिलते हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि इस बार यहां लंबे समय तक बारिश होने से ब्रह्मकमल अक्टूबर में भी खिले हुए हैं. तस्वीर के बैकग्राउंड में बर्फ से ढंकी नंदाघूंघटी और त्रिशूल पर्वत हैं.

मान्यता है कि भगवान शिव को खुश करने के लिए ब्रह्माजी ने ब्रह्मकमल की रचना की थी. जनश्रुति के अनुसार शिव मां नंदा देवी के साथ यात्रा कर रहे थे, तब नंदा देवी ने अपना वाहन बाघ यहीं छोड़ा था. इसलिए इस जगह को बघुवाशा भी कहा जाता है। हर 12 साल में नंदा देवी राजजात यात्रा इस मार्ग से निकलती है. अब यह यात्रा 2024 में होनी है.

20 km steep climb in 27 km journey

रूपखंड से बघुवाशा पहुंचने में तीन दिन लगते हैं. 27 किमी की यात्रा में 20 किमी की खड़ी चढ़ाई है/ ऑक्सीजन की कमी महसूस होती है. सालभर तापमान 0 डिग्री, सर्दियों में माइनस 20 डिग्री तक चला जाता है. यहां कस्तूरी मृग, भालू, हिम तेंदुए भी मिलते हैं.

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Shree Vishnu offered 1000 Brahmakamal to Bholenath

मान्यता है कि जब भगवान विष्णु हिमालयी क्षेत्र में आए तो उन्होंने भगवान भोलेनाथ को एक हजार ब्रह्मकमल अर्पित किए. लेकिन, किसी कारण एक पुष्प कम पड़ गया. तब भगवान विष्णु ने पुष्प के रूप में अपनी एक आंख भोलेनाथ को ब्रह्मकमल दी तभी से भोलेनाथ का एक नाम ‘कमलेश्वर’ व विष्णु जी का ‘कमल नयन’ पड़ा. बदरीनाथ के धर्माधिकारी भुवन चंद्र उनियाल बताते हैं कि एक अन्य आख्यान के अनुसार, यक्षराज एवं भगवान नारायण के खजांची कुबेर के सेवक हेममाली शिव पूजन के लिए इसी फूल को लेने कैलास गए थे. लेकिन, विलंब के चलते वह इसे शिव को अíपत नहीं कर पाए। तब कुबेर ने हेममाली को शापित कर अलकापुरी से निकाल दिया.

58 types of Brahmakamal

हालांकि इसका नाम ब्रह्मकमल  है पर यह तालों या पानी के पास नहीं बल्कि ज़मीन में होता है. ब्रह्मकमल 3000-5000 मीटर की ऊँचाई में पाया जाता है. ब्रह्मकमल उत्तराखंड का राज्य पुष्प  है. और इसकी भारत में लगभग 61 प्रजातियां पायी जाती हैं जिनमें से लगभग 58 तो अकेले हिमालयी इलाकों में ही होती हैं.

ब्रह्मककल का वानस्पतिक नाम सोसेरिया ओबोवेलाटा है. यह एसटेरेसी वंश का पौंधा है. इसका नाम स्वीडन के वैज्ञानिक डी सोसेरिया के नाम पर रखा गया था. ब्रह्मकमल को अलग-अगल जगहों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है जैसे उत्तरखंड में ब्रह्मकमल, हिमाचल में दूधाफूल, कश्मीर में गलगल और उत्तर-पश्चिमी भारत में बरगनडटोगेस नाम से इसे जाना जाता है.

ब्रह्मकमल भारत के उत्तराखंड, सिक्किम, अरूणाचल प्रदेश, कश्मीर में पाया जाता है. भारत के अलावा यह नेपाल, भूटान, म्यांमार, पाकिस्तान में भी पाया जाता है. उत्तराखंड में पिण्डारी, चिफला, रूपकुंड, हेमकुण्ड, ब्रजगंगा, फूलों की घाटी, केदारनाथ आदि जगहों में इसे आसानी से पाया जा सकता है.

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Medicinal properties of Brahmakamal

इस फूल के कई औषधीय उपयोग भी किये जाते हैं. इस के राइज़ोम में एन्टिसेप्टिक होता है इसका उपयोग जले-कटे में उपयोग किया जाता है. यदि जानवरों को मूत्र संबंधी समस्या हो तो इसके फूल को जौ के आटे में मिलाकर उन्हें पिलाया जाता है. गर्मकपड़ों में डालकर रखने से यह कपड़ों में कीड़ों को नही लगने देता है. इस पुष्प का इस्तेमाल सर्दी-ज़ुकाम, हड्डी के दर्द आदि में भी किया जाता है. इसे सुखाकर कैंसर रोग की दवा के रुप में इस्तेमाल किया जाता है. इससे निकलने वाले पानी को पीने से थकान मिट जाती है. साथ ही पुरानी खांसी भी काबू हो जाती है.

भोटिया जनजाति के लोग गांव में रोग-व्याधि न हो, इसके लिए इस पुष्प को घर के दरवाजों पर लटका देते हैं. इस फूल की संगुध इतनी तीव्र होती है कि इल्का सा छू लेने भर से ही इसकी महक को लम्बे समय तक महसूस किया जा सकता है और कभी-कभी इस की महक से मदहोशी भी छाने लगती है.

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इस फूल की धार्मिक मान्यता भी बहुत हैं. ब्रह्मकमल का अर्थ है ‘ब्रह्मा का कमल’. यह माँ नन्दा का प्रिय पुष्प है. इससे बुरी आत्माओं को भगाया जाता है. इसे नन्दाष्टमी के समय में तोड़ा जाता है और इसके तोड़ने के भी सख्त नियम होते हैं जिनका पालन किया जाना अनिवार्य होता है. यह फूल अगस्त के समय में खिलता है और सितम्बर-अक्टूबर के समय में इसमें फल बनने लगते हैं. इसका जीवन 5-6 माह का होता है.

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ब्रह्म कमल को हिमालयी फूलों का सम्राट भी कहा गया है. यह कमल आधी रात के बाद खिलता है इसलिए इसे खिलते देखना स्वप्न समान ही है. एक विश्वास है कि अगर इसे खिलते समय देख कर कोई कामना की जाए तो अतिशीघ्र पूरी हो जाती है. ब्रह्मकमल के पौधे में एक साल में केवल एक बार ही फूल आता है जो कि सिर्फ रात्रि में ही खिलता है. दुर्लभता के इस गुण के कारण से ब्रह्म कमल को शुभ माना जाता है.

Mythological mention of Brahmakamal

इस पुष्प की मादक सुगंध का उल्लेख महाभारत में भी मिलता है जिसने द्रौपदी को इसे पाने के लिए व्याकुल कर दिया था. राज्य पुष्प ब्रह्म कमल बदरीनाथ, रुद्रनाथ, केदारनाथ, कल्पेश्वर आदि ऊच्च हिमालयी क्षेत्रों में पाया जाता है. किवदंति है कि जब भगवान विष्णु हिमालय क्षेत्र में आए तो उन्होंने भोलेनाथ को 1008 ब्रह्म कमल चढ़ाए, जिनमें से एक पुष्प कम हो गया था. तब विष्णु भगवान ने पुष्प के रुप में अपनी एक आंख भोलेनाथ को समर्पित कर दी थी. तभी से भोलेनाथ का एक नाम कमलेश्वर और विष्णु भगवान का नाम कमल नयन पड़ा.

एक और किवदंती के अनुसार ब्रह्म कमल के कारण एक बार भीम का गर्व चूर हुआ था. कहते हैं जब द्रोपदी ने भीम से ब्रह्म कमल लाने की जिद की तो भीम बद्रिकाश्रम पहुंचे. लेकिन बदरीनाथ से तीन किमी पीछे हनुमान चट्टी में हनुमान जी ने भीम को आगे जाने से रोक दिया. हनुमान ने अपनी पूंछ को रास्ते में फैला दिया था. जिसे उठाने में भीम असमर्थ रहा. यहीं पर हनुमान ने भीम का गर्व चूर किया था. बाद में भीम हनुमान जी से आज्ञा लेकर ही बदरीकाश्रम से ब्रह्मकमल लेकर गए.

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