Pithoragarh Travel Blog: पिथौरागढ़ जिसे प्रकृति ने अपने हाथों से सजाया है भाग -3

कल हम चम्पवात से बाहर निकल गए थे! चम्पवात जिला मुख्यालय से वैसे लोहाघाट १३ किलोमीटर दूर है लेकिन कल हमने जहाँ यात्रा को विराम दिया था वहां से ८ किलोमीटर की दूरी है लोहाघाट की! अब तक हमारे दोनों तरफ देवदार के वृक्षों की एक भरी पूरी शृंखला शुरू हो गयी थी ! देवदार एक दम सीधा सधा पेड़ आसमान को छूने का असफल प्रयास करता हुआ साथ ही साथ कहीं-कहीं झुरमुट में बुरांश के छोटे छोटे पेड़ इन विराट वृक्षों की छत्रछाया में पल रहे थे!

बुरांश में गर्मियों के समय फूल आते हैं चटक लाल! पूरे वन की आभा को स्वयं तक सीमित कर लेते हैं! बुरांश के फूलों से शरबत बनता है और गर्मियों में इसका सेवन कर आप स्वयं को तरोताज़ा महसूस करेंगे और पेट की समस्याओं के लिए इसका नियमित सेवन रामबाण! इन्हीं पेड़ों के साथ बाँझ(ओक) के वृक्ष, ओक के वृक्ष जहाँ भी होते हैं वहां पानी बहुतायत होता है! ओक अपनी जड़ो से पानी का संरक्षण करते हैं!

सात आठ किलोमीटर का सफर यदि आप बंद आँखों से भी कर लेंगे तो यहाँ सड़क के दोनों तरफ चल रहे पेड़ आपकी साँसों में इतनी ऊर्जा और खुशबू भर देंगे की आप वर्षों बरस इस गंध को नहीं भूल पाएंगे! मन तो नहीं करेगा इन वादियों से बाहर निकलने का नहीं किन्तु आगे बढ़ते रहना जीवन का नियम है और हमारी नियति! देखते देखते हम लोहाघाट के छोटे किन्तु समृद्ध बाजार से गुजरने लगेंगे! हवा में चूल्हे में जलती लकड़ी और पकौड़ों की मिश्रित गंध से आपको रुकने के मजबूर कर सकती है लेकिन आप रुकिएगा मत क्योंकि यहाँ से पेट भरने का मतलब आगे परेशानी क्योंकि इस यात्रा का सबसे जटिल पड़ाव आगे आने वाला है! तो यात्रियों अपनी पेटी बांध लीजिये!

आगे कई छोटे छोटे कई कस्बे झुरमुटों में कभी पास तो कभी दूर किसी पहाड़ी ढलान पर आप को समय समय पर दिख जाएंगे इसके बाद शुरू होती है घाट की उतराई! यहाँ तक आते हवा में ऊष्मता आने लगेगी नीचे झांकने का प्रयास करेंगे तो मीलों ढलान के अलावा अभी कुछ नहीं दिखेगा! मेरा विशेष आग्रह है की इस समय आपको केवल सामने वाले शीशे की और ही देखना चाहिए वरना खाया पीया बाहर आने में विलम्ब नहीं लगेगा!

घाट की उतराई में आप जैसे जैसी नीचे उतरेंगे गर्मी महसूस होने लगेगी ! नीचे तलहटी पर आपको जलप्रवाह दिखने लगेगा. गंगा और उसकी सहायक नदियों का संगम होता है घाट पर! काली नदी का गंगा से संगम का दृश्य सबसे मनोहारी लगता है! मांस खाने के शौकीन लोगों यहाँ भुटवा ‘बकरे का मीट’ का स्वाद ले सकते हैं! घाट से एक दूसरा रास्ता निकलता है जो अल्मोड़ा को पिथोरागढ़ से जोड़ता है! नदियों के दोनों पाटों को लोहे के पूल से जोड़ा गया है! एयर यहाँ आपको एक सुरक्षा चौकी भी है जो आने जाने वाली गाड़ियों की जानकारी अंकित करते हैं ख़ास कर शाम ५ बजे के बाद जाने वाले वाहनों की!

और हाँ एक बात बताना में भूल ही गया कि जब आप इस लोहे के पुल को पार करें तो कुछ सिक्के नदी में अवश्य दाल दें वैसे आपको कई लोग ऐसा करते दिख जाएंगे! वह इसलिए की पहाड़ी मान्यताओं के अनुसार घाटों पर मशान, भूत प्रेत का निवास होना माना जा सकता है उनको इस तरह से दान दे कर उनके प्रकोप से बचा जा सकता है वैसे खिचड़ी चढ़ाने की प्रथा भी है घाटों में! किन्तु मेरे हिसाब से यह मामला सम्मान का लगता है नदियां हमें जीवनदानी जल देती है और उनको लाँघ कर हम उनके अपमान से उऋण होने के लिए ऐसा करते हों!

खैर घाट के पहले जितनी जटिल उतराई थी आगे उतनी ही जटिल चढाई भी आने वाली है! घाट से पिथौरागढ़ ३० किलोमीटर हैं और इसके ठीक आधे पर गुरना! गुरना पहुंचने में आधे से पैंतालीस घंटे का समय लगेगा क्योंकि पहाड़ों में ३० से ४० किलोमीटर की गति काफी है! गुरना में माता का एक मंदिर है और जहाँ माता हो वहां शेर न हो, हो ही नहीं सकता! दिन के समय तो नहीं लेकिन रात को यदि आप यात्रा करते है तो आपको किसी मोड़ पर दिख ही जाएगा! मैं इस बात का गवाह हूँ जब एक दिन रात्रि-कालीन यात्रा के दौरान बीच सड़क पर मैंने अपनी आँखों से देखा क्या शानदार जानवर है? आंखें अंदर झाँक कर हड्डियों में भी सिहरन दौड़ा दे! गुरना में माता के मंदिर के सामने बिना माथा टेके आगे बढ़ने का ख्याल भी दिल में मत रखियेगा!

कहा जाता है कि माता के मंदिर की स्थापना से पहले इस क्षेत्र में दुर्घटनाएं बहुत होती थी लेकिन अब न के बराबर! मंदिर से कुछ मीटर दूर एक जल धारा है उसका शीतल जल घाट की चढ़ाई और उतराई का सारा दर्द उतर देगा! गुरना से पिथौरागढ़ १४ किलोमीटर रहता है केवल आधे घंटे का सफर जिसका जिक्र मैं अपने अंतिम भाग में करूँगा धन्यवाद क्रमशः …
#SanjeevJoshi

संजीव जोशी

मौन हुआ न जाने क्यों? शोर हुआ ना जाने क्यों? जान नहीं पाया अब तलक, कौन हूं मैं, कौन हूं?