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साभारः संजीव जोशी

देव-भूमि चहुँ और बिखरी नैसर्गिक सुंदरता आपको अपने मोहपाश में बांध लेगी, अनायास ही आपके मुँह से निकल पड़ेगा वाह! जन्नत है यहाँ! केवल लिखने की बात नही, मैं दावे से कह सकता हूँ एक बार जाएंगे तो मन वहीं छोड़ आएंगे।

वो बात अलग है कि घुमावदार सड़कों पर कई बार आपका पेट उमड़-घुमड़ कर आपके द्वारा खाया पिया बाहर निकाल दे और आप स्वयं को कोसें कि कहाँ आ गए? लेकिन टनकपुर से 150 किलोमीटर की पिथौरागढ़ की पहाड़ी यात्रा में कई बार ऐसे क्षण आएंगे की आपके चेहरे पर केवल हर्ष की लकीरें ही होंगी।

चाहे सूखी डांग से कुछ पहले से नीचे टनकपुर का विस्तारित रूप और टनकपुर को अपने नीले पानी से चीरते हुए शारदा नहर का चौड़ा पाट आपको आपकी पुतलियां फैलाने के बाध्य कर देगा! शारदा का इससे विस्तारित रूप आपको और कहीं नही दिखेगा। सुखी डांग को पार करते हुए आप यदि पहाड़ी यात्रा पहली बार कर रहे हो तो संभव हो कि आप कई बार ‘कै’ कर चुके होंगे और आप भूख भी महसूस कर रहे होंगे और ‘चल्थी’ से उठती हुई हवाओं में मिश्रित खाने की महक आपकी भूख को दौगुना करने के लिए काफी है। सड़क से लगी सात आठ दुकानों में बन रहा विशुद्ध गरमागरम पहाड़ी खाना देखने में साधारण लेकिन स्वाद ऐसा कि पेट भर जाए लेकिन मन नही। खाने के साथ दी जाने वाली चटनी प्याज और मूली के साथ मिलकर आपके जायके को और बडा देगी तथा आपकी यात्र की खुमारी को घटा!

यह यात्रा का पहला पड़ाव है क्योंकि आगे स्थिति और गंभीर होने वाली है। हर दस मीटर पर तीव्र मोड़ आपको आपकी सीट पर कभी भी स्थिर नही होने देगा और आपकी आंखें आपके साथ चल रही प्राकृतिक सौंदर्य के किसी भी दृश्य को अपनी समेटने के लिए पलकें झपकाना!

चल्थी से आगे बढ़ते हुए आपको कई चार पांच घर सुदूर तलहटियों में बिखरे बिखरे दिखाई देंगे लेकिन जो बड़ा पड़ाव आगे आने वाला है उसका नाम है चंपावत।

चंपावत अंग्रेजों के समय गर्मियों के मौसम में अंग्रजों का आराम गाह रहा है बांकी का यात्रा वृतांत क्रमशः।

आप लोगो को कैसा लगा टिप्पणी दीजिये ताकि आगे लिखने के लिए प्रेरित हो सकूं। #SanjeevJoshi क्रमशः…

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मौन हुआ न जाने क्यों? शोर हुआ ना जाने क्यों? जान नहीं पाया अब तलक, कौन हूं मैं, कौन हूं?

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