सफर में ‘Suffer’ से पड़ गया पाला, पत्रकार ने यूं बयां किया दर्द

साभार- संजीव जोशी

भइय्या बड़े दिन हो गए थे, सरकारी बसों में सफर किये। कुछ तूफानी करते हैं के कीड़े ने काट खाया और मैं ले आया उत्तर प्रदेश परिहवन की एसी सेवा जनरथ के तीन टिकट हल्द्वानी से दिल्ली के।

सुबह से बेटे के पंख निकले हुए थे पब्लिक ट्रांसपोर्ट में सफर के नाम पर उसे क्या पता था सफर तो था किंतु इंग्लिश वाला suffer।

खैर सुबह 10 बज कर 10 मिनट गाड़ी नियत समय पर निकली। बस में चढ़ने के साथ ही श्रीमती जी के चेहरे के हाव भाव बता रहे थे कि इस सफर में श्रीमती जी का मूड भी मुझे suffer करने वाला है। लेकिन उस तरफ से इतनी दिक्कत नही दिख रही थी जितनी कि बाहर होती तेज बारिश से।

पीछे से दूसरी पंक्ति वाली खिड़की की सीट जिसपर श्रीमती जी बैठी थी उसने तो जैसे आज न चुप होने की कसम खा रखी थी। किसी महिला के सामने कोई उससे ज्यादा बोले भला कैसे बर्दाश्त कर सकती थी! खिड़की श्रीमती जी को नई नई आवाजों से परेशान कर रही थी और श्रीमती जी की प्रश्नवाचक निगाहें मेरे चेहरे का ताप बढ़ा रही थी। 

तभी जुगाड़ टेक्नोलॉजी का ध्यान आया! फट से बिसलेरी की पानी के बोतल के ढक्कन से खिड़की के मुंह को बंद करने का प्रथम प्रयास किया लेकिन मात्र ढक्कन से बंद हो जाती तो उत्तरप्रदेश रोडवेज का नाम खराब नही हो जाता! आवाज कम हुई लेकिन अभी जुगाड़ टेक्नोलॉजी की जरूरत और थी। हम भी कहाँ हार मानने वाले थे ऊपर से लटकते परदे को घुसेड दिया खिड़कियों के सीसे के मध्य अब खिड़की पूर्णतया चुप थी लेकिन…

तब तक बारिश के पानी ने मन बना लिया था उस सफर को और suffer बनाने का, ac से निकलने वाली हवा के रास्ते बारिश के पानी ने अपना रास्ता और ठिकाना ढूंढ लिया, पहली बून्द सिर पर टपकी टप्प… फिर दूसरी फिर तो दो घंटे टिप टिप बरसा पानी। बेटे को मजा आ रहा था और अब तक पत्नी भी इस सफर के suffer को मन ही मन अपना चुकी थी।

इस पोस्ट को मैं बस से ही लिख रहा हूँ, अभी सब शांत है बारिश भी खिड़की भी इसलिए मौका मिल गया। हल्द्वानी से दिल्ली के 275 किलोमीटर के सफर में इस बस का भाड़ा है मात्र 563 रुपये लेकिन प्रकृति के हर रूप के दर्शन करा देती है। उत्तर प्रदेश की यह जनरथ सेवा। ऐसी बसों को सड़क पर निकाल कर लोगों से सुविधा के नाम पर लूट कर रहा है उत्तर प्रदेश परिवहन विभाग। 

आज के सफर पर जुगाड़ टेक्नोलॉजी की कुछ तस्वीरें शायद परिवहन विभाग तक पहुंच जाए।

ये अनुभव संजीव जोशी ने अपने फेसबुक वॉल पर शेयर किया है. संजीव जोशी को फॉलो करने के लिए क्लिक करें

News Reporter
मौन हुआ न जाने क्यों? शोर हुआ ना जाने क्यों? जान नहीं पाया अब तलक, कौन हूं मैं, कौन हूं?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

%d bloggers like this: