What is a Glacier – कुदरत कैसे बनाती है इन्हें, जब ये फटते हैं तब मंज़र कैसा होता है

What is a Glacier – एक ग्लेशियर ( Glacier ) आखिर होता क्या है? ( What is a Glacier ) . हाल में, ये सवाल इसलिए उठना शुरू हो चुका है क्योंकि हाल में उत्तराखंड के चमोली जिले में ग्लेशियर टूटने ( Glacial lake outburst flood ) की घटना ने हर किसी को स्तब्ध कर दिया है.  भारत के उत्तराखंड ( Uttarakhand ) के चमोली ( Chamoli District ) जिले की नीति घाटी ( Niti Valley ) में ग्लेशियर ( Glacier ) टूटा और इसकी वजह से तपोवन बैराज (Tapovan Bairaj ) पूरी तरह से ध्वस्त हो गया. इससे, धौलीगंगा नदी ( Dhauliganga River ) में बाढ़ के हालात पैदा हो गए. चमोली जिले ( Chamoli District ) में इस ग्लेशियर के टूटने से ( Glacial lake outburst flood ) कई जिंदगियां खत्म हो गईं. पानी के भयानक सैलाब में कंकड़ और मिट्टी ने मिलकर तबाही का रूप ले लिया. इस घटना का वीडियो जिसने भी देखा सिहर उठा.

चमोली जिले ( Chamoli District ) की घटना के साथ ही, पूर्व में कभी हम हिमालय ग्लेशियर ( Himalaya Glacier ) की चर्चा सुनते हैं तो कभी सियाचिन ग्लेशियर ( Siachen Glacier ) पर बात करते हैं. इन सब जगहों के केंद्र बिंदु में जो एक चीज़ है वो ग्लेशियर ( Glacier ) ही है. हम ग्लेशियर से जुड़े तथ्य ( Facts about glacier ), ग्लेशियर से जुड़ी जानकारी ( information about glacier ) के साथ साथ, ग्लेशियर का हिलना ( movement of glaciers ), ग्लेशियर कैसे बनते हैं ( how are glaciers formed ), ग्लेशियर कहां पाए जाते हैं ( where are glaciers found ) की भी जानकारी लेंगे. आइए, इस आर्टिकल में हम जानते हैं कि ग्लेशियर ( Glacier ) होता क्या है और इसके टूटने से किस तरह की स्थिति पैदा होती है. आइए, ग्लेशियर ( Glacier ) को लेकर अपनी जानकारी बढ़ाते हैं.

क्या होता है ग्लेशियर | What is a Glacier

ग्लेशियर ( Glacier ), वास्तव में बर्फ की एक नदी ( River of Ice ) ही होती है और यह खतरनाक भी नहीं होती है. ये ग्लेशियर, बर्फ के एक हिस्से का रूप लिए होता है और ये बड़े हिमखंड होते हैं. ये अक्सर ही नदी की तरह दिखते हैं और बहुत धीमी गति से बहते रहते हैं. इन

ग्लेशियरों ( Glacier ) के बनने में कई साल लग जाते हैं. ये एक प्राकृतिक प्रक्रिया है. ये ऐसी जगहों पर बनते हैं जहां बर्फ़ गिरती तो है लेकिन भीषण सर्दी की वजह से वो गल नहीं पाती. ये बर्फ़ धीरे-धीरे ठोस होती चली जाती है. चूँकि इसका भार बहुत ज़्यादा होता है, इसलिए ये आगे जाकर पहाड़ों की वजह खिसकने लगती है.

ग्लेशियर ( Glacier ) दो प्रकार के होते हैं अल्पाइन ग्लेशियर ( Alpine Glacier ) या घाटी ग्लेशियर ( Valley Glacier ) या पहाड़ी ग्लेशियर ( Mountain Glacier ) और बर्फ की चादर. उत्तराखंड (Uttarakhand) की घटना का संबंध पहाड़ी ग्लेशियर ( Mountain Glacier ) प्रकार से है जो ऊंचे पर्वतों के पास बनते हैं और घाटियों की ओर बहते हैं. पहाड़ी ग्लेशियर ( Mountain Glacier ) ही सबसे ज्यादा खतरनाक माने जाते हैं

आज धरती ( Earth ) का दसवां हिस्सा ग्लेशियर ( Glacier ) की बर्फ ( Ice ) से ढका है. ग्लेशियर ( Glacier ) वहां बनते हैं जहां बर्फ हर साल जमा होती रहती है और उसके बाद पिघलने ( Ice Melting ) लगते हैं. बर्फबारी होने के बाद यहां जमा हुई बर्फ दबने लगती है और उसका घनत्व ( Density ) बढ़ता जाता है. वह हल्के क्रिस्टल ( Crystal ) से ठोस ( Solid ) बर्फ के मजबूत गोले में बदलने लगती है. नई बर्फ इसे और नीचे दबाने लगती है और कठोर होने के साथ साथ घनी हो जाती है. इसे फिर्न ( Fern ) भी कहते हैं. इस प्रक्रिया में, ठोस बर्फ की विशाल मात्रा जमा हो जाती है. इस दबाव से वह बिना अधिक तापमान के ही पिघलने लगती है और अपने ही वजन से बहने लगती है और हिमनद का रूप लेकर घाटियों ( Valleys ) के ओर बहने लगती है.

कुछ ग्लेशियर, किसी फुटबॉल के मैदान के आकार के भी होते हैं. ये इनका बेहद छोटा रूप होता है. वहीं, कुछ ग्लेशियर बहुत विशाल हो जाते हैं और इनका ये विशाल रूप दर्जनों किलोमीटर या सैकड़ों किलोमीटर लंबा होता है. अमेरिका के नेशनल स्नो एंड आइस डेटा सेंटर ( National Snow and Ice Data Centre ) के मुताबिक़ पूरी दुनिया के कुल भूमि क्षेत्र के 10 फ़ीसदी हिस्सों पर अभी ग्लेशियर हैं. ऐसा आकलन है कि ये ग्लेशियर आइस एज ( Ice Age ) के आख़िरी बचे अवशेष हैं. आइस एज ( Ice Age ), वह दौर था जब धरती की कुल भूमि का 32 फ़ीसदी और समुद्र का 30 फ़ीसदी हिस्सा बर्फ़ से ढका हुआ था. इसी आइस एज पर सुपरहिट एनिमेशन मूवी ( Ice Age Animation Movie ) भी आ चुकी है.

ग्लेशियर का फटना या टूटना क्या होता है | What is Glacier Outburst

ग्लेशियर, सालों तक बर्फ के बहुत ज़्यादा जमा होने और उसके एक जगह इकट्ठा होने से बनते हैं. 99 फीसदी ग्लेशियर, आइस शीट ( Ice Sheet ) के रूप में होते हैं. इन आइस शीट को, महाद्वीपीय ग्लेशियर भी कहा जाता है. ज़्यादातर यह रुवीय क्षेत्रों या बहुत ऊंचाई वाले पहाड़ी क्षेत्रों में होते हैं. हिमालयी क्षेत्रों में भी ऐसे ही ग्लेशियर पाए जाते हैं. किसी भू-वैज्ञानिक हलचल ( गुरुत्वाकर्षण, प्लेटों के नजदीक आने, या दूर जाने ) की वजह से जब इसके नीचे गतिविधि होती है तब यह टूटता है. इसे आप धरती पर आने वाले, भूकंप के ही एक रूप की तरह समझ सकते हैं. कई बार ग्लोबल वार्मिंग की वजह से भी ग्लेशियर के बर्फ पिघल कर बड़े-बड़े बर्फ के टुकड़ों के रूप में टूटने लगते हैं. इसी प्रक्रिया को ग्लेशियर का फटना या टूटना कहते हैं. इसे काल्विंग या ग्लेशियर आउटबर्स्ट भी कहा जाता है.

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ऐसा कई बार होता है जब बेहद भारी बर्फबारी से पहाड़ी नदियां या झीलें जम जाती हैं और ग्लेशियर नदी के प्रवाह को रोक देते हैं. इस वजह से भी कोई झील बड़े ग्लेशियर का रूप ले लेती है. इस झील के फटने की आशंका बढ़ जाती है. एक हिंदी वेबसाइट की जानकारी के मुताबिक, वाडिया इंन्स्टीट्यूट ऑफ हिमालयन ज्योलॉजी ( Wadia Institute of Himalayan Geology ) ने हिमालयी क्षेत्रों में ऐसी कई झीलों का पता लगाया है जहां ग्लेशियर फटने का खतरा मंडरा रहा है.

वैसे, ज्यादातर ग्लेशियर ( Glacier ) सिर्फ कुछ सेंटिमीटर प्रति दिन की रफ्तार से बहते हैं लेकिन कुछ एक दिन में 50 मीटर की स्पीड से भी बहते हैं. इसी तरह ये ग्लेशियर खतरनाक बन जाते है. इन्हें निगलने वाले ग्लेशियर ( Galloping Glacier ) भी कहा जाता है. ग्लेशियर और भी विनाशक तब बन जाते हैं जब इसमें पानी मिल जाता है. पानी का साथ मिलते ही ग्लेशियर टाइडवॉटर ग्लेशियर ( Tidewater Glacier ) बन जाते हैं. ग्लेशियर का हिस्सा पानी में तैरता है. ये हिस्सा कई मीटर ऊंचा भी हो सकता है. बर्फ के बड़े बड़े टुकड़े ( Icebergs ) पानी में तैरने लगते हैं. इस प्रक्रिया को काल्विंग ( Calving ) कहा जाता है जो बहुत प्रचंड रूप ले लेती है. धौलीगंगा नदी ( Dhauliganga River) की बाढ़ ( Flood ) इसी वजह से आम नदियों के बाढ़ से ज्यादा खतरनाक होती है.

ग्लेशियर के फटने या टूटने के बाद क्या होता है | What happened after Glacier outburst

पहाड़ी ग्लेशियर ( Mountain Glacier ) कई बार खतरनाक हो जाते हैं. वैसे तो ग्लेशियर घाटी ( Valley ) की ओर धीरे-धीरे बहते हैं, लेकिन कुछ ग्लेशियरों में पूरी की पूरी बर्फ ( Ice ) पहले एकदम से नहीं बहती, बल्कि हिमस्खलन ( Avalanche ) का रूप ले लेती हैं जिसमें बहुत ही ज़्यादा मात्रा में बर्फ घाटी में गिरने लगती है. चिमोली ( Chamoli ) की नीति घाटी ( Niti Valley ) में यही हुआ. यह विशाल मात्रा की बर्फ का एक साथ बहते हुए आना आसपास की सभी चीजों को ढक लेता है. ये सैलाब कई फीट ऊंचा होता है. इसकी जद में आने वाली चीज़ें और ज़िंदगियां कई बार, इस सैलाब की वह से बनने वाले 80 से 100 फीट मलबे के नीचे जम जाती हैं और इस वजह से उनकी तलाश नामुमकिन हो जाती है. इतना ही नहीं, बहने के दौरान बर्फ के अलग अलग हिस्से अलग गति से बहते हैं. ऊपरी हिस्से में कई तरह की दरारें आ जाती हैं जो आसानी से फट जाती है. ये पर्वतारोहियों ( Mountaineers ) के लिए बेहद खतरनाक होती है.

ग्लेशियर ( Glacier ) अपने आप में उतने खतरनाक ( Dangerous ) नहीं होते जितने तरनाक उन्हें हालात बना देते है. धीमी गति से बहने के बावजूद ये काफी शक्तिशाली होते हैं. एक बड़े पत्थर ( boulder ) की तरह अपने सामाने आने वाली हर चीज को तहस नहस कर देते हैं. उनके आगे जंगल, पहाड़, पहाड़ों के किनारे के विशाल पत्थरों के खंड कुछ भी नहीं होते. ये जमीन पर गहरी आकृतियां ( Landscape ) बना जाते हैं. ये अपने साथ, बड़ी मात्रा में पानी का एक ज्वालामुखी ( Volcano ) लेकर आगे बढ़ते हैं और इसीलिए बेहद विनाशकारी हो जाते हैं.

ग्लेशियर के फ़ायदे क्या हैं | Good things about Glacier

ग्लेशियर ( Glacier ) कई तरह से कारगर भी होते हैं. वे शुद्ध पानी ( Fresh Water ) के बहुत बड़े और विश्वसनीय स्रोत होते हैं. ये जहां से गुज़रते हैं वहां बहुत ही उपजाऊ मिट्टी ( Fertile Soil ) दे जाते हैं. इनकी जमाई रेत और छोटे पत्थरों से कंक्रीट और एस्फॉल्ट बनता है. हालांकि, इनकी सबसे ज्यादा उपयोगिता नदियों के स्रोत ( Source of Rivers ) के तौर पर जानी जाती है. गंगा नदी का प्रमुख स्रोत गंगोत्री ( Gangotri Glacier ) हिमनद ही है. यही नदी, भारत और बांग्लादेश में साफ पानी और बिजली का प्रमुख स्रोत है. साथ ही, खेती में भी इसका विस्तृत इस्तेमाल होता है.

ये ग्लेशियर ( Glacier ), विश्व के मीठे पानी ( fresh water ) का सबसे बड़ा भण्डार हैं और पृथ्वी की धरातलीय सतह पर पानी के सबसे बड़े भण्डार भी यही मानी जाती हैं.